तुम्हें मांसाहारी बनना है तो बनो–अनवर सुहैल

तुम्हें मांसाहारी बनना है तो बनो
लेकिन मत खाओ हलाल मांस
इन म्लेच्छों का हलाल किया मांस वर्जित है अब से
इस मांस को हम अपवित्र घोषित करते हैं
इससे बेशक होगा तुम शाकाहारी ही बने रहो

तुम जो इनकी दुकानों से खरीदते हो मांस
तो पाते हैं मुसल्ले स्थाई रोज़गार
इसी की कमाई से गूंजती है अज़ान की आवाजें
‘मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम’ की सदायें
हमारे नगरों  के चौक-चौराहों पर
टोपी खपकाए ये मियाँ
ईद-बकरीद और जुम्मा की नमाज़ में
छेंक लेते हैं कैसे पूरी सड़क जैसे इनके बाप की हो

ये जो हमारे चौक-चौराहों पर
आये दिन टाँग दी जाती हैं
चाँद-तारे वाली हरी-हरी झंडियाँ
कि ऐसा आभाष होता है जैसे
ये कोई पाकिस्तानी नगर तो नहीं
धीरे-धीरे पूरे देश में छा जायेंगी हरी झंडियाँ
यदि यूँ ही बिकता रहा हलाल मांस
अगर यूँ ही चलते रहे 786 मार्का टायर पंक्चर की दुकानें
अगर यूँ ही रौनक रहे गरीब-नवाज़ बिरयानी होटल
अगर यूँ ही चलते रहे असलम भाईनुमा गैरेज
तुम्हें मालुम हो कि इन्हीं कमाईयों से फूटते हैं आये दिन
फिदाईन बम हमारे आस-पास

तुम्हें मांसाहारी बनना है तो बनो
क्योंकि मांसाहार लड़ने की ताकत देता है
क्योंकि मांसाहार खून-खराबे से डर मिटाता है
क्योंकि मांसाहार उत्तेजना बढाता है
क्योंकि मांसाहार आबादी बढाता है
शाकाहारी हो तुम
तभी तो हुए जा रहे हो
अपने ही देश में अल्पसंख्यक धीरे-धीरे
ये ओबीसी क्या होता है भाई
अरे सब शुद्र हैं, दलित हैं जो भी सवर्ण नहीं हैं
इन्हें कहो कि इतना हुनरमंद बनें
क्यों मुसल्लों को मुल्क में तरक्की करने देते हो
ये दरजी, धुनिये, टीन-कनस्तर के कारीगर हैं
इसके लिए नहीं चाहिए कोई डिग्री-डिप्लोमा
कोई बड़ी पूँजी या फिर लाईसेंस
अब भी वक्त है संभल जाओ
अपने लोगों को प्रेरित करो
कि खोलें झटका मांस की दुकानें
सही कहते हैं लोग कि शाकाहारी अल्पसंख्यक हैं आज

ये मुसल्ले बड़ी आसानी से
लगा लेते हैं चौक-चौराहों पर
अंडे, मुर्गी या फिर बिरयानी के ठेले
एक बात है कि इनके मसालों से
बिरयानी बनती बड़ी लज़ीज़ है
तो क्यों नहीं सीखते हुनर इन मुसल्लों से
और देते टक्कर इनके जमे-जमाए कारोबार को
ये कमजोर होंगे
तो देश मजबूत होगा…..

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