भैया का आँगन–डॉ० श्रीमती तारा सिंह

भैया का आँगन–डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

हाड़-मांस  कंपा  देने  वाली  पौष  की  ठिठुरती रात में,रोज की तरह आज भी बुधना अपने छोटे-छोटे बच्चों को ,एक कोने में छाती से चिपकाये, सिकुड़ा-सिमटा सुबह का इंतजार कर रहा था, तभी उसका तीन साल का बेटा, बुधना जाग गया । चाँदनी रात थी, चाँद पूरे शबाब पर था । घर के टूटे ठाट से जब बुधना की नजर चाँद पर पड़ी, तो खिलखिलाकर हँस पड़ा और पिता का मुँह छूते हुए बोल पड़ा,’ बाबू ! बाबू ! देखो न,ऊपर क्या चमक रहा है ?

पिता वीरेन्द्र ने अनमना सा मुँह बनाकर कहा,’हाँ,हाँ, ठीक है, मगर तुम सो जाओ । काफ़ी ठंढ़ है और रात भारी है; लेकिन बुधना को नींद कहाँ, जो वह सोता । वह तो चाँद को आसमां से उतार कर अपने हाथ में पाना चाहता था । पिता के लाख मना करने पर भी, एक ही रट लिये था, मुझे वह चमकता हुआ खिलौना चाहिये । मुझे ला दो न ! जब वीरेन्द्र से उसकी जिद्द नहीं संभाली गई, तब बुधना के गाल पर एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा—–’ तुमको कब से कह रहा हूँ, सो जा, तू सोता क्यों नहीं ?’

तभी बुधना की माँ जो अलाव तापते-तापते कब नींद में आ गई, उसे पता भी नहीं था । मगर वीरेन्द्र की झल्लाहट भरी तेज आवाज उसकी नींद खोल गई । उसने आँख मलते हुए पति से पूछा,’क्या हुआ,क्यों चिल्ला रहे हो ?’

वीरेन्द्र अपनी आवाज और ऊपर करता हुआ बोला— इसे चाँद चाहिये ।

पत्नी कमला,आँख मलती हुई बोली—’ तो उसे समझा दो न; इसके लिए मारने की क्या जरूरत है,बच्चा है, उसे क्या पता, जो वह चाह रहा,उसे पाना कभी संभव नहीं है ? वीरेन्द्र पत्नी से,क्रोधित हो बोला–’ बहुत समझाया,पर यह मानता कहाँ है ? आज इसे क्या हो गया है,क्यों यह ऐसी जिद्द करता है’ ?

पत्नी ,वीरेन्द्र की ओर देखती हुई, ठीक है, इसे मैं बहलाती हूँ ; तुम सो जाओ ।’ पत्नी कमला,बुधना को गोद में लेकर बहला ही रही थी कि बुधना की नजर मुखिया के महल पर पड़ी ,जो रंग-विरंगी बिजलियों से सराबोर, चाँद से भी ज्यादा प्यारा दीख रहा था ।

बुधना एक बार फ़िर रोते हुए चिल्ला उठा, माँ, माँ ! देखो वह क्या है, मुझे वहाँ ले चलो न । कमला ने बहुत समझाया ,’ बेटा सो जाओ, जब तुम बड़े होवोगे, तब खुद से चले जाना ; मैं नहीं जा सकती । लेकिन उसे पता कहाँ था, गरीबी के झरोखे से चाँदी के महल को देखना गुनाह है ; मैले हो जायेंगे । वह रोता रहा, और न जाने कब माँ के आँचल की गरमी ने नींद लगा दी, सो गया । सुबह उठा, तो देखा, न चाँद था, न ही रंगीला वह महल ।

बीतते दिनों के साथ,बुधना बड़ा हो गया । एक दिन अपनी पत्नी कमला से, वीरेन्द्र ने बातों-बातों में कहा,’ मैं अकेला मजदूरी कर,कैसे इतने जनों का पेट भरूँगा । तुम तो बीमार ही रहती हो, दिन-काल ठीक नहीं, इसलिए विद्या (बेटी) को किसी के घर रखना ,मैं उचित नहीं समझता हूँ  । क्यों न हम बुधना से कहें, समझदार है, वह हमारी मजबूरी को समझता है’ । ।

पत्नी कमला, बुधना की ओर देखती हुई बोली -—अभी तो बच्चा है, 8-10 साल के बच्चे से क्या काम होगा ?”

वीरेन्द्र —मुखिया जी के यहाँ पशुओं को दाना-पानी लगाने के लिए ,एक बच्चा नौकर चाहिये । मुखिया का मैनेजर आज मुझको बुलाकर पूछ रहा था । ’ पत्नी कमला—ठीक है, उसके बचपन के सपने भी पूरे हो जायेंगे ।’

वीरेन्द्र ने पत्नी से पूछा,’कौन सा स्वप्न ?’

कमला— आँखें पोछती हुई, याद है तुमको, जब वह तीन साल का था, तब चाँद के साथ, मुखिया का घर देखने के लिए रात भर रोया था ।

वीरेन्द्र —हाँ, हाँ, याद है, और मैंने उसे थप्पड़ भी मारा था ।

कमला— बीती बातों को छोड़ो, और जाकर मुखिया से बात करो । अगर कहे तो बुधना को वहाँ पहुँचा दो । यहाँ बेचारा दो वक्त की रोटी के लिए तरसता रहता है, वहाँ भर पेट अनाज मिलेगा ; और तो और , महीने के अंत में चार पैसे भी आ जायेंगे । सबसे बड़ी बात होगी कि पढ़े-लिखे लोगों का संग मिलेगा, तो आगे भविष्य उज्ज्वल होगा ।

वीरेन्द्र  —-  वहाँ तुम्हारे बेटे के साथ कोई दोस्ती करने नहीं बुला रहा; वह सिर्फ़ मुखिया के घर के चार कुत्तों में पाँचवां कुत्ता होगा. जो जूठा खाकर दरवाजे पर पड़ा रहेगा ।

कमला—हम गरीब के लिए बड़े घर के कुत्ते की हैसियत रखना, भी तकदीर की बात होती है, जो सभी गरीबों को नसीब नहीं होता ।

वीरेन्द्र की आँखों से दुख के आँसू निकल पड़े , बोला— कहाँ है बुधना ?

बुधना, पास ही खड़ा,सब सुन रहा था; बोल पड़ा —मैं आपके पास हूँ बाबू ! मुझे कहाँ जाना है ?

पिता वीरेन्द्र, उसके सर के बाल को सहलाते हुए बोला —बेटा, तुझे मुखिया के घर पशुओं को सानी-भूसा लगाने के लिए रहना है ।

बुधना जब घर से जाने लगा; माँ कमला ने समझाया— बेटा ! बड़े भाग्य से तुझे यह मौका मिला है । तुम्हारे उम्र के इसी गाँव में और भी बच्चे हैं, मुखिया का मैनेजर, उन्हें न बुलाकर ,तुझको बुलाया है । वहाँ पहुँचकर कोई ऐसी गलती न करना कि वे लोग तुझको वहाँ से भगा दे । मालिक- मालकिन, यहाँ तक कि उनके घर के छोटे-छोटे बच्चों की बातों का सम्मान करना । वे लोग, जो काम दे, उसे खुशी-खुशी करना ;जिससे कि वे लोग तेरे चाल-व्यवहार से खुश रहें ।

बुधना, सर नीचा कर बोला-—ठीक है माँ, कहकर पिता के साथ,मुखिया के घर चला गया ।

वीरेन्द्र,मुखिया के घर बेटे को सौंपकर, जब घर वापस आया, बरामदे की दीवार से पीठ टिकाकर गुमसुम बैठ गया । तभी पत्नी, कमला बगल में बैठती हुई, पूछी—क्यों जी ,वे लोग बुधना को रखने से इनकार कए दिये ।

पति वीरेन्द्र, डबडबाई आँखों से पत्नी की ओर देखते हुए पत्नी से बोला—नहीं, नहीं ; बुधना को देखते ही मुखियाजी पसंद कर लिये ।

पत्नी कमला— तो फ़िर रोते क्यों हो,बगल में ही तो है, उधर से आते-जाते बुधना से मुलाकात हो जायगी; कौन दूर देश गया है ।

पति वीरेन्द्र, निराश हो बोला—उतना भाग्यशाली कहाँ हूँ कमला, जो बेटा दूर-देश नौकरी करने जायगा । उसे तो इसी गरीबी के दलदल में, यहीं जीना और मरना है । पति की बात सुनकर , कमला रो पड़ी । मगर हिम्मत जुटाते हुए कही — छोड़ो यह सब चिंता, जिंदगी का तीन हिस्सा बीत गया, एक हिस्सा बाकी, वह भी बीत जायगा । मेरे बाद बुधना का क्या होगा, नहीं होगा,हम अभी से सोचकर क्यों रोयें ? हम जन्मदाता हैं, तकदीर दाता नहीं ; इसलिए जो मेरे वश में नहीं है , उसके लिए सोचना या मातम मनाना व्यर्थ है ?

बुधना को मुखिया का मैनेजर,दिन भर का काम समझाकर कहा— तुम अपना काम अभी से शुरू कर दो । बुधना अपने काम में लग गया । लेकिन मुखिया के पोते को स्कूल जाते देख, रोज यही सोचता रहा—मैं कब स्कूल जाऊँगा ? मेरे माता-पिता स्कूल न भेजकर, यहाँ क्यों भेज दिये ; क्या मैं स्कूल कभी नहीं जा पाऊँगा ? इसी तरह मुखिया के दरवाजे पर जिंदगी भर,पशुओं के साथ जीऊँगा ; नहीं-नहीं, मैं भी स्कूल जाऊँगा ,पढ़ूँगा-लिखूँगा और बड़ा आदमी बनूँगा । लेकिन कैसे स्कूल जाऊँगा—बुधना इसी सोच में डूबा रहा । सुबह होते ही सारे पशुओं को जल्दी-जल्दी चारा डालकर,मुखिया के पोते के पीछॆ-पीछॆ ,खुद को छिपते-छिपाते स्कूल पहुँच गया । जब स्कूल के गुरुजी ने देखा,कि एक मैला-कुचैला कपड़ा पहने एक बच्चा कुछ कहना चाहता है; तो गुरुजी उसके पास गये । पूछा— तुझे क्या चाहिये ? बुधना (हाथ जोड़ते हुए) बोला —मुझे कुछ नहीं चाहिये ।

गुरुजी—तो तू यहाँ क्या करने आया है ?

बुधना,बिना कुछ सोचे-समझे बोल गया— पढ़ने ।

सुनते ही गुरुजी गुस्सा से तिलमिला उठे और बोले — भागो यहाँ से, नहीं तो एक थप्पड़ दूँगा । बड़ा आया है ,पढ़ने । गुरुजी के इस व्यवहार से बुधना टूट गया ,लेकिन जिद्द बरकरार रखा । उसने तय कर लिया कि उसे पढ़ना है; पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना है, नहीं तो ऐसी दुतकारें जिंदगी भर उसे सहनी पड़ेगी ।

दूसरे दिन सुबह होते ही, बुधना पशुओं को सानी-भूसा लगाकर स्कूल के लिये रवाना हो गया । आज गेट से नहीं घुसा, बल्कि स्कूल के पिछवाड़े की खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया । गुरुजी जब क्लास में आये, बुधना कान लगाकर सुनने लगा । गुरुजी कैसे  और क्या पढ़ाते हैं; बुधना को गुरुजी की सारी बातें समझ में आने लगी । जो नहीं समझ में आती थी, उसे मुखिया के पोते से,अकेले में पूछ लिया करता था । इस तरह बुधना. रोज स्कूल जाने लगा । एक दिन गुरुजी की नजर पढ़ाते-पढ़ाते खिड़की के बाहर पड़ी, देखा ,कोई बच्चा वहाँ खड़ा है और बड़ी गौर से उनकी बातों को सुन रहा है ।

गुरुजी एक पिउन भेजकर उसे अपने पास बुलबाये । बुधना डर गया; सोचने लगा—ये तो वही गुरुजी हैं,जिनके हाथों मैं मार खाते-खाते बच गया था । आज बचने वाला नहीं ; अत: गुरुजी के पास आते ही गिरगिराने लगा —मुझे माफ़ कर दीजिये , मुझसे गलती हो गई ।

गुरुजी, बुधना को पुचकारते हुए बोला — गलती तुझसे नहीं, गलती मुझसे हुई है । मुझे पहले दिन ही तुझे यहाँ पढ़ने की इजाजत देनी चाहिये थी ; तू पढ़ेगा ?

बुधना ,आँसू पोछते हुए कहा— हाँ ।

गुरुजी — तो तुम यह बताओ कि इस दो साल में खिड़की के बाहर से सुन-सुनकर ,मुझसे क्या-क्या सीखा ?

बुधना—-पूछिये गुरुजी !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Facebook
Twitter
LinkedIn
INSTAGRAM