साहित्य समाज का कैसा दर्पण हो —सुशील शर्मा

साहित्य समाज का  कैसा दर्पण हो
सुशील शर्मा

साहित्य समाज की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है।
-आचार्य रामचंद्र शुक्ल
साहित्य ज्ञानराशि का संचित कोश है। –
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के
अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी
भाव. कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है।
समाज कल्याण की भावना से लिखा गया अर्थमय विचार साहित्य कहलाता है।
साहित्य समाज एवं व्यक्ति की आत्माभिव्यक्ति है ,समाज की खूबियां एवं
कुरीतियाँ दोनों को साहित्य साक्षी हो कर व्यक्त करता है।
सही अर्थों में साहित्य का मुख्य प्रयोजन मानवीय संवेदना का विस्तार और
प्रचार-प्रसार करना है। मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण
योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की
विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया। मानव की
विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है।
साहित्य मनुष्य को मनुष्यता का पाठ सिखाता है। वह व्यक्ति को व्यक्तिगत
से सार्वजनिक करता है। हमारे अंदर की मनोदशा को विस्तार देता है।

इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी
परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में
फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि
के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता
है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का
पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है।
साहित्य का सरोकार
साहित्य का सरोकार आधारभूत एवं शाश्वत मानवीय मूल्यों ,विवेक एवं चेतना
से होता है। साहित्य हमेशा देश काल परम्पराओं को लाँघ जाता है। ये
साहित्य का स्वाभाविक गुण है क्योंकि साहित्य अविरल है वह किसी व्यक्ति
,समाज कल एवं परम्पराओं से बंधा नहीं है। समाज के शुभ अशुभ ,अच्छे बुरे
,नैतिक अनैतिक गुणों को व्यक्त करना उसका स्वभाव है।साहित्य हमेशा समाज
के प्रति प्रेम,संस्कृति एवं इतिहास के प्रति सम्मान दर्शाये ये जरूरी
नहीं है। साहित्य ने हमेशा सत्य को जिया है। समाज में जो अशुभ उसकी
भर्त्सना की है एवं जो शुभ है उसका गुणगान किया है।
देश काल परस्थिति एवं संस्कृति से साहित्य एवं शिक्षा हमेशा प्रभावित
रहे हैं। औपनिवेशिक काल में साहित्य ने हमेशा साम्राज्यवाद का घोर विरोध
किया  था कुछ डेढ़ सौ वर्ष पुराने हिंदी साहित्य को हमेशा मानवीय मूल्यों
की अवमानना ,संघर्ष ,छुआछूत ,वर्ग विभेद ,एवं सांस्कृतिक विषमताओं का
मुखर प्रवक्ता माना जा सकता है।

साहित्य का उदेश्य :-
साहित्य के आरंभ में संस्कृत के विद्वानों ने साहित्य के तीन  उद्देश्य
बताए हैं। पहला- यश प्राप्ति, दूसरा- अर्थ प्राप्ति, तीसरा- स्वांत:
सुखाय। बाद के कुछ चिंतकों ने लोक हित, व्यवहार ज्ञान आदि को भी साहित्य
का प्रयोजन स्वीकार किया। इन विद्वानों के बताए प्रयोजनों को आधुनिक
संदर्भों से जोड़कर देखें तो बहुत सारी नई बातों का पता चलता है।
प्रेमचंद ने साहित्य के उद्देश्य के संबंध लिखा है- “साहित्यकार या
कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता तो शायद
वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर
भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपनी कल्पना
में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता की जिस अवस्था में देखना
चाहता है उसे वह दिखाई नहीं देती। इसलिए वर्तमान मानसिक और सामाजिक
अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है।साहित्य ही मनोविकारों के रहस्यों को
खोलकर सद्वृत्तियो को जगाता है साहित्य मस्तिष्क की वस्तु बल्कि ह्रदय की
वस्तु है। जहाँ ज्ञान और उपदेश असफल हो जाते है   वह साहित्य बाज़ी मार ले
जाता हे साहित्य वह जादू की लकड़ी है जो पशुओ में ईट पत्थरों में पेड़
पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देता है। ”
प्रेमचंद कहते हैं, ‘मेरे विचार से उसकी (साहित्य की) सर्वोत्तम परिभाषा
जीवन की आलोचना है।’ निबंध के अंत में साहित्य की कसौटियों की चर्चा करते
हुए वे खरा साहित्य उसे मानते हैं, जिसमें जीवन की सच्‍चाइयों का प्रकाश
हो। एक तरफ जीवन की आलोचना और दूसरी तरफ जीवन की सच्‍चाइयों का प्रकाश।
साहित्य की परिभाषा और साहित्य का उद्देश्य इसी के बीच से निकलता है।
सच्‍चाइयों के प्रकाश तक पहुंचने के लिए जीवन की आलोचना बेहद जरूरी है।
यहीं पर समाज का दर्पण होने मात्र से साहित्य का उद्देश्य विस्तारित हो
जाता है।साहित्य का मुख्य उद्देश्य  सामाजिक रूढ़ियों और विसंगतियों को
दूर करना भी है। समय-समय पर साहित्य ने यह करके भी दिखाया है। मध्यकाल
में संत कवियों ने समकालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आडंबरों के खिलाफ
आवाज बुलंद की । सत्ता से मुठभेड़ भी की । कबीर और उनका पूरा मण्डल लगातार
निचले तबके के उत्थान के लिए संघर्षरत रहा। उन्हें लोभ और मोह से मुक्त
कर वास्तविकता से परिचित कराया। समाज में स्त्रियों के अधिकारों की
स्थिति, लैंगिक विभेद,जाती एवं धर्म का टकराव। राजनैतिक कुचक्रों में
फंसा आम आदमी ,लोकतंत्र के नाम पर भीड़ तंत्र हमेशा से साहित्य के प्रिय
विषय रहें हैं। साहित्य ने इन पर भीषण प्रहार किया हैं एवं विकृतियों को
सुधारा है।

साहित्य समाज का कैसा दर्पण है –
साहित्य अपने मौखिककाल से अब तक समाज की विभिन्न गतिविधियों, स्थितियों,
प्रक्रियाओं, संदर्भों से गुजरता हुआ, उसे अपने में समेटे हुए एवं अपने
परिवेश के साथ न्यूनाधिक अभिव्यक्ति करता हुआ सतत प्रगतिशील होता है ।
आर्थिक परिबलों के साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत जितनी समृद्ध होगी,
समाज उतना विकसित और संपन्न होगा, सिर्फ आर्थिक संपन्नता से भौतिकवादिता
ही बढ़ेगी। साहित्य दर्पण मात्र नहीं है, वह परिवर्तन-परावर्तन की क्रिया
से भी लैस होता है।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ के समाज के ऊपर ही आश्रित रहता है। एक
सच्चा साहित्यकार कभी भी समाज अथवा युग की उपेक्षा नहीं कर सकता। यदि वह
समाज की उपेक्षा कर, कल्पना में विचरण करता हुआ साहित्य-रचना करता है तो
उसका साहित्य कभी भी शाश्वत रूप धारण नहीं करता और न ही उस समाज का
अस्तित्व घोषित होता है। साहित्य ही अपने समाज का स्वर और संगीत है।
अन्धकार वहीं जहाँ आदित्य नहीं है। मुर्दा है वह देश, जहां साहित्य नहीं
है।
आधुनिक साहित्य में साहित्यिक विधाओं के विकास के साथ यह विरोध और विकसित
हुआ। साहित्यकारों ने तमाम आंदोलनों द्वारा समाज को सुधारने का प्रयास
किया।समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच एक बहुत बड़ी दूरी है। एक शोषित
है दूसरा शोषक। साहित्य मानव की बराबरी की वकालत करता है। वह आँख बन्द
करके रूढ़ियों का अनुसरण नहीं करने देता वह चेतना को जागृत करता है। और
कवि धूल को आँधी के साथ उड़ने की स्वाभाविक क्रिया और उसकी परिणति से
आगाह कराता है।
किसी भी महान कृति में  तत्कालीन समाज, उसके रीति-रिवाजों और समय की
अभिव्यक्ति होती है । साहित्य और समाज के बीच वस्तुपरक सरोकार कौन से हैं
? किन अर्थों में साहित्य समाज का दर्पण है ? कृति और पाठक के बीच कैसा
सम्बन्ध है ? इन सब का सम्बन्ध समाज का साहित्य में प्रतिबिम्बन से है।
रचनाकार जिन पात्रों का सृजन करता है वे काल्पनिक होते हुए भी सवाये सच
होते हैं, वे व्यक्ति-अनुभव को भलीभाँति समझ लेते हैं । लावेंथल
लोकप्रिय संस्कृति और साहित्य का विश्लेषण-विवेचन करते हुए उसे मध्यवर्ग
का साहित्य मानते हैं। उस साहित्य को ठीक-ठीक समझने के लिए मध्यवर्गीय
मानसिकता-आवश्यकता को जानना अपेक्षित है ।
निश्चित रूप से कोई भी साहित्य समाज का दर्पण होता है परन्तु “दर्पण”
पूरा सच नहीं होता| प्रथम तो दर्पण में दिखने वाला प्रतिबिम्ब हमेशा
बिम्ब का आधा होता है। बिम्ब दर्पण के आकर पर भी निर्भर करता है।  दूसरा
उस दर्पण का खुद का क्या स्वरूप है: समतल, अवतल या उत्तल? यह सम्बंधित
साहित्यकार पर निर्भर है कि वो क्या रूप चुनता है| यदि हम दर्पण को बिना
समझे प्रतिबिम्ब को देखेंगे तो हमें कभी सही जानकारी नहीं मिलेगी।
साहित्यकार क्या दर्पण चुनता है यह इस पर निर्भर है की उसकी प्रतिबद्धता
क्या है?‘साहित्य समाज का दर्पण’ ऐसा कहने का अर्थ यही है कि साहित्य
समाज का न केवल कुशल चित्र है, अपितु समाज के प्रति उसका दायित्व भी है।

साहित्य समाज की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है।
-आचार्य रामचंद्र शुक्ल
साहित्य ज्ञानराशि का संचित कोश है। –
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के
अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी
भाव. कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है।
समाज कल्याण की भावना से लिखा गया अर्थमय विचार साहित्य कहलाता है।
साहित्य समाज एवं व्यक्ति की आत्माभिव्यक्ति है ,समाज की खूबियां एवं
कुरीतियाँ दोनों को साहित्य साक्षी हो कर व्यक्त करता है।
सही अर्थों में साहित्य का मुख्य प्रयोजन मानवीय संवेदना का विस्तार और
प्रचार-प्रसार करना है। मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण
योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की
विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया। मानव की
विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है।
साहित्य मनुष्य को मनुष्यता का पाठ सिखाता है। वह व्यक्ति को व्यक्तिगत
से सार्वजनिक करता है। हमारे अंदर की मनोदशा को विस्तार देता है।

इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी
परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में
फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि
के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता
है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का
पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है।
साहित्य का सरोकार
साहित्य का सरोकार आधारभूत एवं शाश्वत मानवीय मूल्यों ,विवेक एवं चेतना
से होता है। साहित्य हमेशा देश काल परम्पराओं को लाँघ जाता है। ये
साहित्य का स्वाभाविक गुण है क्योंकि साहित्य अविरल है वह किसी व्यक्ति
,समाज कल एवं परम्पराओं से बंधा नहीं है। समाज के शुभ अशुभ ,अच्छे बुरे
,नैतिक अनैतिक गुणों को व्यक्त करना उसका स्वभाव है।साहित्य हमेशा समाज
के प्रति प्रेम,संस्कृति एवं इतिहास के प्रति सम्मान दर्शाये ये जरूरी
नहीं है। साहित्य ने हमेशा सत्य को जिया है। समाज में जो अशुभ उसकी
भर्त्सना की है एवं जो शुभ है उसका गुणगान किया है।
देश काल परस्थिति एवं संस्कृति से साहित्य एवं शिक्षा हमेशा प्रभावित
रहे हैं। औपनिवेशिक काल में साहित्य ने हमेशा साम्राज्यवाद का घोर विरोध
किया  था कुछ डेढ़ सौ वर्ष पुराने हिंदी साहित्य को हमेशा मानवीय मूल्यों
की अवमानना ,संघर्ष ,छुआछूत ,वर्ग विभेद ,एवं सांस्कृतिक विषमताओं का
मुखर प्रवक्ता माना जा सकता है।

साहित्य का उदेश्य :-
साहित्य के आरंभ में संस्कृत के विद्वानों ने साहित्य के तीन  उद्देश्य
बताए हैं। पहला- यश प्राप्ति, दूसरा- अर्थ प्राप्ति, तीसरा- स्वांत:
सुखाय। बाद के कुछ चिंतकों ने लोक हित, व्यवहार ज्ञान आदि को भी साहित्य
का प्रयोजन स्वीकार किया। इन विद्वानों के बताए प्रयोजनों को आधुनिक
संदर्भों से जोड़कर देखें तो बहुत सारी नई बातों का पता चलता है।
प्रेमचंद ने साहित्य के उद्देश्य के संबंध लिखा है- “साहित्यकार या
कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता तो शायद
वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर
भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपनी कल्पना
में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता की जिस अवस्था में देखना
चाहता है उसे वह दिखाई नहीं देती। इसलिए वर्तमान मानसिक और सामाजिक
अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है।साहित्य ही मनोविकारों के रहस्यों को
खोलकर सद्वृत्तियो को जगाता है साहित्य मस्तिष्क की वस्तु बल्कि ह्रदय की
वस्तु है। जहाँ ज्ञान और उपदेश असफल हो जाते है   वह साहित्य बाज़ी मार ले
जाता हे साहित्य वह जादू की लकड़ी है जो पशुओ में ईट पत्थरों में पेड़
पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देता है। ”
प्रेमचंद कहते हैं, ‘मेरे विचार से उसकी (साहित्य की) सर्वोत्तम परिभाषा
जीवन की आलोचना है।’ निबंध के अंत में साहित्य की कसौटियों की चर्चा करते
हुए वे खरा साहित्य उसे मानते हैं, जिसमें जीवन की सच्‍चाइयों का प्रकाश
हो। एक तरफ जीवन की आलोचना और दूसरी तरफ जीवन की सच्‍चाइयों का प्रकाश।
साहित्य की परिभाषा और साहित्य का उद्देश्य इसी के बीच से निकलता है।
सच्‍चाइयों के प्रकाश तक पहुंचने के लिए जीवन की आलोचना बेहद जरूरी है।
यहीं पर समाज का दर्पण होने मात्र से साहित्य का उद्देश्य विस्तारित हो
जाता है।साहित्य का मुख्य उद्देश्य  सामाजिक रूढ़ियों और विसंगतियों को
दूर करना भी है। समय-समय पर साहित्य ने यह करके भी दिखाया है। मध्यकाल
में संत कवियों ने समकालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आडंबरों के खिलाफ
आवाज बुलंद की । सत्ता से मुठभेड़ भी की । कबीर और उनका पूरा मण्डल लगातार
निचले तबके के उत्थान के लिए संघर्षरत रहा। उन्हें लोभ और मोह से मुक्त
कर वास्तविकता से परिचित कराया। समाज में स्त्रियों के अधिकारों की
स्थिति, लैंगिक विभेद,जाती एवं धर्म का टकराव। राजनैतिक कुचक्रों में
फंसा आम आदमी ,लोकतंत्र के नाम पर भीड़ तंत्र हमेशा से साहित्य के प्रिय
विषय रहें हैं। साहित्य ने इन पर भीषण प्रहार किया हैं एवं विकृतियों को
सुधारा है।

साहित्य समाज का कैसा दर्पण है –
साहित्य अपने मौखिककाल से अब तक समाज की विभिन्न गतिविधियों, स्थितियों,
प्रक्रियाओं, संदर्भों से गुजरता हुआ, उसे अपने में समेटे हुए एवं अपने
परिवेश के साथ न्यूनाधिक अभिव्यक्ति करता हुआ सतत प्रगतिशील होता है ।
आर्थिक परिबलों के साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत जितनी समृद्ध होगी,
समाज उतना विकसित और संपन्न होगा, सिर्फ आर्थिक संपन्नता से भौतिकवादिता
ही बढ़ेगी। साहित्य दर्पण मात्र नहीं है, वह परिवर्तन-परावर्तन की क्रिया
से भी लैस होता है।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ के समाज के ऊपर ही आश्रित रहता है। एक
सच्चा साहित्यकार कभी भी समाज अथवा युग की उपेक्षा नहीं कर सकता। यदि वह
समाज की उपेक्षा कर, कल्पना में विचरण करता हुआ साहित्य-रचना करता है तो
उसका साहित्य कभी भी शाश्वत रूप धारण नहीं करता और न ही उस समाज का
अस्तित्व घोषित होता है। साहित्य ही अपने समाज का स्वर और संगीत है।
अन्धकार वहीं जहाँ आदित्य नहीं है। मुर्दा है वह देश, जहां साहित्य नहीं
है।
आधुनिक साहित्य में साहित्यिक विधाओं के विकास के साथ यह विरोध और विकसित
हुआ। साहित्यकारों ने तमाम आंदोलनों द्वारा समाज को सुधारने का प्रयास
किया।समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच एक बहुत बड़ी दूरी है। एक शोषित
है दूसरा शोषक। साहित्य मानव की बराबरी की वकालत करता है। वह आँख बन्द
करके रूढ़ियों का अनुसरण नहीं करने देता वह चेतना को जागृत करता है। और
कवि धूल को आँधी के साथ उड़ने की स्वाभाविक क्रिया और उसकी परिणति से
आगाह कराता है।
किसी भी महान कृति में  तत्कालीन समाज, उसके रीति-रिवाजों और समय की
अभिव्यक्ति होती है । साहित्य और समाज के बीच वस्तुपरक सरोकार कौन से हैं
? किन अर्थों में साहित्य समाज का दर्पण है ? कृति और पाठक के बीच कैसा
सम्बन्ध है ? इन सब का सम्बन्ध समाज का साहित्य में प्रतिबिम्बन से है।
रचनाकार जिन पात्रों का सृजन करता है वे काल्पनिक होते हुए भी सवाये सच
होते हैं, वे व्यक्ति-अनुभव को भलीभाँति समझ लेते हैं । लावेंथल
लोकप्रिय संस्कृति और साहित्य का विश्लेषण-विवेचन करते हुए उसे मध्यवर्ग
का साहित्य मानते हैं। उस साहित्य को ठीक-ठीक समझने के लिए मध्यवर्गीय
मानसिकता-आवश्यकता को जानना अपेक्षित है ।
निश्चित रूप से कोई भी साहित्य समाज का दर्पण होता है परन्तु “दर्पण”
पूरा सच नहीं होता| प्रथम तो दर्पण में दिखने वाला प्रतिबिम्ब हमेशा
बिम्ब का आधा होता है। बिम्ब दर्पण के आकर पर भी निर्भर करता है।  दूसरा
उस दर्पण का खुद का क्या स्वरूप है: समतल, अवतल या उत्तल? यह सम्बंधित
साहित्यकार पर निर्भर है कि वो क्या रूप चुनता है| यदि हम दर्पण को बिना
समझे प्रतिबिम्ब को देखेंगे तो हमें कभी सही जानकारी नहीं मिलेगी।
साहित्यकार क्या दर्पण चुनता है यह इस पर निर्भर है की उसकी प्रतिबद्धता
क्या है?‘साहित्य समाज का दर्पण’ ऐसा कहने का अर्थ यही है कि साहित्य
समाज का न केवल कुशल चित्र है, अपितु समाज के प्रति उसका दायित्व भी है।

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