दस लाख का सूट पहनने वाले कर रहे लाल बत्ती से परहेज–अपना बिहार

संपादकीय : दस लाख का सूट पहनने वाले कर रहे लाल बत्ती से परहेज

दोस्तों, आगामी 1 मई से देश में लाल बत्तियां नहीं दिखेंगी। यह निर्णय उस प्रधानमंत्री का है जो दस लाख का सूट पहनता है और गेहूं के आटे की जगह काजू के आटे की रोटियां भारत की जनता के पैसे से तोड़ता है। कितना दिलचस्प फ़रमान है न! इससे भी अधिक दिलचस्प यह कि लाल बत्ती हटाने का ढोंग करने वाले पीएम अपनी सुरक्षा के लिए सुरक्षा प्रहरियों की बड़ी फ़ौज अपने साथ रखेंगे। यानी भीड़ से खुद को अलग रखने का उपक्रम जारी रहेगा। ऐसे में लाल बत्ती हटाने के ढोंग और इस ढोंग की वजह को आसानी से समझा जा सकता है।

दरअसल वर्तमान भारतीय लोकतंत्र संक्रमण काल से गुजर रहा है। नेताओं और जनता के बीच दूरियां बढती जा रही हैं। एक हद तक यह कहा जाना अधिक तर्क संगत होगा कि नेताओं ने जनता का विश्वास खो दिया है। लाल बत्ती और स्टेटस के लिए सुरक्षा प्रहरी नेताओं को जनता से अलग करते हैं। यही वजह है कि छोटे से छोटे नेता भी लाल बत्ती और सुरक्षा प्रहरी के लिए लालायित रहते हैं।

वैसे इस मामले में बिहार सबसे अलग रहा है। जननायक कर्पूरी ठाकुर को उनकी सादगी और मिलनसारिता के लिए अनंतकाल तक याद किया जाएगा। वे लाल बत्ती और सुरक्षा घेरे दोनों से परहेज करते थे। उनके बाद लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने भी मुख्यमंत्रित्व काल में लाल बत्ती से परहेज किया था। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वयं पिछले 11 वर्षों से लाल बत्ती वाहन का इस्तेमाल नहीं किया है।

खैर यह तय है कि लाल बत्ती का इस्तेमाल करना अथवा नहीं करना जननेता होने का पैमाना नहीं हो सकता है। बेहतर तो यह हो कि नेता जनता की गाढी कमाई के बूते अपनी सुविधाओं में कटौती करने का साहस दिखायें। उन्हें नेता से अधिक स्वयं को जनता के रुप में सामने आने का प्रयास करना चाहिए। इससे जनता का भी भला होगा और लोकतंत्र की बुनियाद और मजबूत होगी। बशर्ते कि दस लाख का सूट और काजू के आटे की रोटी खाने से परहेज किया जाय।

संपादकीय : अजान गुंडागर्दी तो भजन कीर्तन क्या?

दोस्तों, प्राख्यात गायक सोनू निगम ने मस्जिदों में अजान को गुंडागर्दी करार दिया है और देश के अंधभक्त हिन्दू इसे क्रांतिकारी बयान मानकर अल्पसंख्यकों को गालियां दे रहे हैं। वैसे यह पहला वाक्या नहीं है। प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग पहले भी इस तरह का जहर उगल चुके हैं। दिलचस्प यह है कि अब जहर उगलने वालों में फ़िल्मी कलाकार भी शामिल हो गये हैं। पहले अनुपम खेर और बाद में अभिजीत ने फ़िल्मी जगत के भगवाकरण का आगाज किया था।

रही बात अजान को लेकर की गयी टिप्पणी की तो यह पहला उदाहरण नहीं है। कबीरदास ने पहले ही कहा था कि मस्जिद और मंदिरों में इस तरह के आडम्बर नहीं होने चाहिए। सोनू निगम का कथन एकतरफ़ा है और इसलिए यह आलोच्य है।

वास्तविकता है कि मंदिरों और मस्जिदों(अब तो गिरजाघरों) से आवाजें जबरन कानों में डाली जाती है। खासकर मंदिरों में सुबह से लेकर शाम तक भजन-कीर्तन का दौर चलता रहता है। इसका सबसे अधिक नुकसान जनता को झेलना पड़ता है।

यह सभी धर्मों के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है कि वे भक्ति या इबादत के नाम पर अन्य लोगों को किसी प्रकार का कष्ट न दें। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह सवाल आज ही क्यों उठ रहा है?

इस सवाल का जवाब जटिल नहीं है। पूरे देश में इसी तरह का जहरीला माहौल बनाया जा रहा है ताकि अल्पसंख्यक समाज विरोध करे और आरएसएस के लोग हिन्दुओं को दंगे के लिए उकसायें। यह इसलिए भी कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में महज दो वर्षों का समय शेष है और भाजपा यह जानती है कि 2014 में उसने भारतीय जनता से जितने वादे किये थे, उन वादों पर वह खरी नहीं उतरी है। महंगाई यूपीए शासनकाल के समय की तुलना में दुगनी हो गयी है। बेरोजगारी का संकट भी बढता जा रहा है। ऐसे में भाजपा के पास सिवाय दंगों की राजनीति के कोई विकल्प नहीं है।

बहरहाल आरएसएस-भाजपा की बुनियाद ही भारतीयता के खात्मे पर टिकी है। यह बात अब हर भारतवासी को समझ लेना चाहिए कि मुसलमानों के खिलाफ़ भड़काकर आरएसएस के लोग न तो हिन्दू धर्म का भला कर रहे हैं और न ही देश का। उनके लिए सत्ता सबसे महत्वपूर्ण है। फ़िर वह चाहे गौमांस की राजनीति करके हासिल हो या फ़िर राम का नाम बेचकर। उन्हें हर हाल में सत्ता चाहिए।

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