याद न दिला मुझे….. अहसास हैं परिपक्व हूॅं मैं–प्रभा पारीक

याद न दिला मुझे….. अहसास हैं परिपक्व हूॅं मैं
अकसर मैने लोगों को देखा हैं कि वह उम्रदराज व्यक्ति के रखरखाव महिलाओं के बनाव श्रंगार को देख कर टिप्पणी करते नहीं चूकते है। चठी जवानी बूठे पर अथवा बनी ठनी महिला हो तो ‘बूढी घोडी लाल लगाम‘वैसे ये बातें इन डिसैन्ट हैं किसी की निजता पर कुठारा करनेे जैसा है। और उन को भी यह गा कर जवाब देने का हक हैं कि हम तो भई ऐसे ही हैं कोई खुष हो या खफा हो। यह षाष्वत सत्य हैं कि बुढापा एक बिमारी हैं की इस धरती पर जन्म लेने वाले हर व्यक्ति पेड़ ़ पौधे सभी को झेलना पडता हैं आने वाली मौत की घीमी दस्तक हैं बुठापा। इसे भले आप अनसुना करते रहें पर आवाज तो आती ही हैं। बार बार याद दिलाते रहने से कि ‘यह आपकी वृद्धावस्था है‘। ‘आप बूठे हो रहे हैं‘, ‘आप पेड ़के वह जर्द पत्ते हैं जो न जाने कब झड़ जायेंगे‘ कोई फायदा नहीं षायद लोग एैसा अन्य लोगो की तसल्ली के लिये कहते हैं क्यों की लोग यही सुनना पसंद करते हैं कोई बुठा आदमी उम्र को मात दे यह किसी को सहन नहीं होता।
बहुओं की बात कि जाये तो काई भी बहु जवान सास को पसंद नहीं करेगी। मंा जी तो उन्हे मां जी स्टाइल में ही चाहिये अच्छा दिखने और अच्छा पहनने का एकाअधिकार सिर्फ युवा का ही नहीं हैं एक उम्र होते होते व्यक्ति आर्थिक रूप से अक्सर संपन्न ही होता हैं तो क्यों … न .. वह पैसे अपने उपर खर्च करे अपने अधुरे अरमान पूरे करे ‘लुक गुड -फील गुड ये एक सत्य सुत्र हैं।
याद रखने वाली बात यह हैं कि किसी भ्रम में न रहें जो सच हैं उसे स्वीकार करके चलें पर जब तन बूठा होने लगे तब मन बूठा न होने दें मन को जवान रखेंगे तभी खुष रह सकेंगं जीवन का हर पल षिददत से जिये उसी में जीने का मजा हैं आपके अपने लिये यही उचित हैं लेकिन हम जिस समाज में रहते हैं उसकी परवाह भी हमें हैं बुजुर्ग औरों के सामने जवानों जैसे हाव भाव से बात करेंगे तो निष्चित ही वे उपहास के पात्र बन जायेंगे।
अपनी उम्र का अहसास ही बुजुर्गो को सहन षील बनाता हैं स्नेहिल बनाता हैें अगर उम्र को नकार कर चलेगे तो आप अपने ही धर वालों के लिये प्रतिद्वंद्वी जैसे हो सकते। जैसे लडकों के लिये पिता बेटी के लिये सास मां इस तरह आपसी टकराव के अवसर बठ सकते हैं बच्ेच उनको कहने की ना कहने की कहकर दुखी करते रहते हैं जैसे इस उम्र में आपको एैसा करते षर्म नहीं आती। आपकी उम्र हैं क्या अब ये सब करने की? इस तरह के वाक्यों से घर के युवा आपको उम्र का अहसास कराते हुये षर्म सार कर सकते हैं किसी भी पठी लिखि महिला के लिये पब्लिक में अपनी उम्र का लेखा जोखा देना गाली जैसा लगता हैं यह भी सच हैं कि उम्र कम बताने से मोत का डर घट नहीं जाता लेकिन यहाॅ इरादा अहम बात हैं जैसा हर लडकेां का मनोविज्ञान होता हैं उसे बीवी सुन्दर चाहिये टेलेंन्टेड चाहिये लेकिन मां बूठी और एवरेज ही सुविधा जनक है
उम्र का अहसास इस लिये भी जरूरी हैं कि उत्साह में आप वह सब कुछ न कर जायें जो आपका षरीर झेल नहीं सकता । यह तो निष्चित हैं कि बठती उम्र के साथ ताकत बढती नहीं बल्कि घटती हैं हां अनुभवों में जरूर बठोतरी होती हैं इस बात का सदा अहसास रहना चाहिये बुढापे में युवाओं जैसी हरकते आपको न केवल हास्यास्पद बनाती है आपको असुरक्षित भी बनाती हैं जहाॅ तक पहनने ओठने की बात हैं उम्र उसमें खास आडे़ नहीं आती राजस्थान में बुजुर्ग औरते खूब जेवर भी पहनती हैं और चटक लाल पीले वस्त्र भी पहनती हैं वहाॅ यही चलता हैं पर यु पी में बुजुर्ग औरते हल्के रंग के वस्त्र ही पहनती हैं।परिधानों की जहाॅ तक बात हैं यह बात परंम्पराग परिवारों पर ही लागु होती हैं क्यों कि अति धनाढ्य परिवार के बुर्जगों के परिधान वस्त्र तो सदा से ही आर्कषण का केन्द्र रहे हैं। जनता के बीच रहने वाले लोगों पर उम्र और परिधानों का असर देर से नजर आता हैं।समाज की यही रीत हैं बाकी सब समान है
जीवन के ठेर से अनुभव उम्र का अहसास कराते रहते हैं थोडी बहुत अघ्यात्म में रूची भ्ंाी होने लगती हैं कई औरते तो धर्म के झूठे उथले स्वरूप को ही असल मान कर धार्मिक प्रपंचों में समय गुजारने लगती हैं अगर इसमें किसी का नुकसान नहीं होता हैं तो यह हार्मलैस टाईमपास माना जा सकता हैं
यु तो यह दो अन्र्तरविरोधी बातें लगेगी कि बठती उम्र का अहसास भी रहे और आप जीवन को भरपूर जीये दिल जवान रखें सोच को बूढा न होने दे लेकिन गहराई पर सोचने पर यह एक ही सिक्के के दो पहलु हैं
प्रभा पारीक

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