वो घर –अजनबी राजा

वो घर 

मोहन अँधेरे मैं बैठा हुआ अपने पुराने वही दिन याद कर रहा था , बाहर अभी भी बारीश हो रही थी , कच्छी छत टपक रही थी

  वो उठा और दरीचे से झांकती हुई अपनी जवानी को कही ढूंढ रहा था सब कुछ तो था उसके पिताजी के पास ढेर सारे खेत थे , पुरे गाँव मैं लोग उनके आगे पीछे गुमते थे , उपर से हम तीन भाई सब हटे कटे मैं ही था घर मैं बड़ा एक बहन थी जो बिहां कर अपने ससुराल मैं खुश थी , सबसे छोटा अभी शहर मैं पड़ने मैं लगा था और ये ,शाम ,यही मटर गस्ती और खेतो मैं घुमा करता था , माँ तो बचपन मैं ही स्वर्ग सिधार गयी बहन मुझ से छोटी थी पर कभी माँ की कमी पूरी नहीं होने दी , पिताजी भी मुझे लाख समझाते रहे घर बसा ले अपना , मगर मैं तो अपने भाइयो मैं ही मस्त था , धीरे धीरे पिताजी का भी स्वास्थ्य गिरने लगा , मुल्क भर मैं इलाज़ करवाया पर कुछ ना हो सका , वो ढेर सारे खेत अब चंद ज़मी के टुकड़े रह गए थे , और एक दिन पिताजी भी माँ के संग हो लिए , गाँव का दबाव और रिस्तेदारो की ज़ोरामर्ज़ि से मेने बीहां कर ही लिया , 

 सब कुछ तो था ही अब जो कुछ बची ज़मीं थी उसी मैं मैं जी तोड़ मेहनत करने लगा  कुछ सालो मैं ही मेने पिताजी की वही मानमर्यादा वापस कमा ली शाम जो काम मैं हाथ ना बटाता था अब वो मेरे साथ कन्धा मिलाकर चलने लगा छोटू भी अब अपनी आखरी परीक्षा की तैयारी कर रहा था , 

पास के गाँव मैं ही मेने शाम के बीहां की बात चलाई और फिर चट मंगनी पट बीहां भी हो गया  

ज़िन्दगी की गाडी दौड़ रही थी की फिर क्या होना था वही हुआ जिसका मुझे डर था इसलिए मैं शादी से भाग रहा था , 

रोज़ रोज़ की इन देरानी झेठानि  की लड़ाई झगड़े ने घर मैं दीवार खिंचवा ही दी अब क्या होना था 

 घर का बटवारा , फिर जायदाद का बटवारा होने लगा, जो कुछ भी था गाँव के ही बड़े बुर्जुगों और रिस्तेदारो ने हमे आधा आधा दे दिया और फिर जो बचा वो छोटे के नाम कर दिया  

वो घर अब तीन तिराहे मैं बट गया था 

कुछ माह गुज़र गए , एक दिन चिठ्ठी मिली छोटू की नोकरी लग गयी है , बोहत बड़ी पदवी है बस और अंत मैं लिखा था 

मेने शादी कर ली है यही वो दूसरी जात की है इसलिए आपको बुलाया नहीं , वहा गाँव मैं हज़ारो बाते हो जाती । मेरा वकील आएगा एक दो दिन मैं मेरे नाम की ज़मी जायदाद वही बेचान करवा देना , 

आपका छोटू

मनोज

 रात अपने अंधकार रूप मैं बड़ती ही जा रही थी , बारीश मानो आज किसी से रूठ कर आई हो ।

मैं उठा वहा से और बक्सा खोल के वो सब सामान उलट पुलट करने लगा कुछ नहीं मिला बस फ़टी पुरानी यादो ने मुझे फिर घेर लिया

बीहां के बाद मेने कभी अपने बच्चा ना होने दिया मुझे कहा मालुम था भाई सिर्फ भाई ही होता है और एक दिन शाम की भाभी , मेरी सरला खेत मैं ही झाड़ पार करते हुए एक नाग ने उसको हर लिया

अब क्या बचा रह गया था , भाई अपनी गृहस्थी मैं व्यस्त था , छोटू अपने जीवन के मौज़ मैं था , फिर एक दिन बची कूची मेरे नाम की ज़मी को मैं बैच वही गाँव के बाहर एक झोपड़ा बना कर अपना गुज़ारा करने लगा ,

अरे ओ मोहन काका, मोहन काका , अँधेरे मैं बाहर कोई दरवाजा ख़ट खटा रहा था , मैं यादो के भँवर से बाहर निकला इतनी बारीश मैं ना जाने कोन होगा ।

अरे रामू तू इतनी बरसात मैं , काका वो मेरी बकरिया नहीं आई वापस तो मैं भी उन्हें ढूंढने उनके पीछे यहाँ आ पहुँचा ।

अच्छा किया यहाँ आ गया तू आ अंदर आजा भीग गया है पूरा , वहा कोने मैं सुखी जगह है वहां बैठ जा , अब तो यही है आज की रात का तेरा मेरा घर

©

अजनबी राजा

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