जल जीवन—अंशुल रहेजा

जल जीवन

सारी दुनिया है जल मग्न I

हरा भरा है जीवन जल पर II

 

गर्मीया आती सबको जलाती I

निकलता जल रुपी पसीना त्वचा से II

आती याद अमृत  मय शीतल जल की I

बुझ जाती सभी के दिलो की प्यास  II

जैसे निकला हो लोहा भट्ट्टी से I

 

विघमान है जल पृथ्वी मे कई अवतारो मे II

लहरो से सुस्जीत समुद्र देव I

जिसके समान कोई ना गहरा और विशाल II

नदियो मे देवी रुप गंगा है I

प्रतिक है पाप नाशनि और मुक्ति की II

अर्पित होता प्रात काल सूर्य देव को I

आरम्भ नहीं होते धार्मिक कार्य बिना स्नान और सफाई  के II
इसलिए बन गया है पूजा का बहुमुल्य अंग I

 

ढका हुआ सतर % भाग जल से II

इसलिए दिखती पृथ्वी नीली ब्राह्य अन्तरिक्ष से I

विघमान है जल पृथ्वी पर उतना ही

जितना था लाखो वर्ष पूर्व II

यदि मानो विश्व मे जल है बाल्टी बराबर I

पीने योग्य बचा है एक चम्मच से भी कम II

जैसे विश्व की आबादी दुगनी होती गई I

वैसे पीने योग्य जल की खपत चौगुनी होती गई II

 

सारी दुनिया है जल मग्न I

हरा भरा है जीवन जल पर II

 

लेखक:-

अंशुल रहेजा

(9540958624)

 

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