[अनवर सुहैल ] तिनके का आसरा

आसरा तिनके का भी
देता है कितनी राहतें
तुम नहीं जानोगे
मत छीनो किसी डूबते से
मामूली तिनके का सहारा

मालूम है बेशक, डूबने से
तिनका नहीं बचा पायेगा
एक बच्चा भी जानता है
कि इस आसरे पर भरोसा
पक्का आत्मघाती कदम है
तुम जानते हो कि इस
तुच्छ से आसरे की बदौलत
हमारा डूबना तय है
लेकिन तुम हमारी उम्मीद के इस
अंतिम सहारे को भी छीनना चाहते हो

तुम देख रहे हो कि इस बाढ़ में
किस तरह हाथ-पाँव मार रहे हैं हम
हाथ भर की दूरी तक चले आये
भयानक काले बादलों से
क्या कभी बंद भी होंगे फौव्वारे
कि हमारे जिस्म ठंडे हो रहे हैं रूह की तरह
जिंदगी और मौत के बीच
कम से कम होती दूरी अब हमें नहीं डरा पाती
हम जानते हैं कि बचना किसी तरह से
एक चमत्कार ही होगा
और यह भी सत्य है
कि हमारे जीवन में
संजोग और चमत्कार की कोई गुंजाईश नहीं

बेशक, यह हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है
ऐसे समय में जब नैतिकता, आदर्श, मानवीयता
जैसे शब्दों वाली किताबें लिख रहे हों सदी के भ्रष्टतम लेखक
समाचार चैनलों में जब दुःख, मौत और बलात्कार
वीर बाँकुरे एंकरों की मुस्कानों के साथ परोसी जाती हों
कुछ इस अंदाज़ में कि मरने वालों का आंकडा बढ़ भी सकता है

तुम हमारे इस मामूली आसरे को हमसे जुदा मत करो
तुम भले से कर लेना लाइव-कवरेज
हमारी इस मृत्यु से लड़ी जा रही जंग का
बस तुमसे इतनी इल्तेजा है कि
तिनके के आसरे के प्रति हमारे दिलों में
गहरे तक पैठी उम्मीदों को
हमारी मृत्यु तक जीवित रहने देना….

 

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