सुलगते अरमान —डा० श्रीमती तारा सिंह

सुलगते अरमान                 —डा० श्रीमती तारा सिंह साँझ  ढ़ल  आई ,रात  काली  है  बिछनेवाली नील  गगन  में  विहग बालिका-सी उड़नेवाली थकी   किरण   नींद  सेज  पर  सोने  चली मेरी  भी झिप-झिप आँखें,जो पलकों में काटती आई रातें,झुकी झुर्रियों के नीचे सोना Read More …

सच्ची श्रद्धांजलि—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  सच्ची  श्रद्धांजलि—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह  आओ ! उस माँ के चरणों में हम शीश झुकाएँ जिसने  हँसते- हँसते  राष्ट्रदेव की प्रतिष्ठा में स्वतंत्रता  की वेदी पर, चढ़ा दिया अपना लाल कहा, यम दो बार कंठ नहीं धरता,मनुज मरता एक Read More …

विधु हुआ है बावला—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

विधु  हुआ  है   बावला—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह   प्रिये ! घर  से निकलकर आँगन में आओ देखो, कान  धरकर सुनो, तीर –सा क्षितिज उर को  चीरती, बजती, दंग करती आ रही शृंगी   ढाक , संग   मृदंग   की  आवाज लगता  नियति ,तिमिर Read More …

यह   जीवन   का   ठौर   नहीं—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह    तुमसे मिलने के पहले,जीवन डाली से लिपटे जितने  भी  आशाओं  के  पत्र  नवल  थे सभी  एक-एक  कर  अंतर  की ज्वाला में झुलस-झुलसकर, असमय ही गिरे जा रहे थे हृदय  टहनी  के Read More …

यग्य समाप्ति की वेला, धधक उठी ज्वाला—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

यग्य  समाप्ति   की   वेला, धधक  उठी   ज्वाला—डॉ. श्रीमती तारा सिंह  क्षमा  करो  हे  देवाधिदेव, बताओ मुझको जिस  वेदी  को  मैंने  जीवन  सीमा  के काल    संगम    तक    जलाये   रखा प्राणों  का दीप जलाकर ,अश्रुजल से धोया रुधिर  के   छींटे , अस्थिखंड Read More …

रिश्ते तूत के—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  रिश्ते तूत के—डॉ. श्रीमती तारा सिंह               जवानी के दिनों में चारो ओर से आदमी से घिरा रहनेवाला, इंजीनियर बेटा का पिता बैजू, जिंदगी के अंतिम ढ़लान पर मिट्टी के दालान घर में, अपनी घोर दरिद्रता के साथ Read More …

कुर्बानी का पुरस्कार —डॉ० श्रीमती तारा सिंह

कुर्बानी का पुरस्कार —डॉ० श्रीमती तारा सिंह   जीवन सुख से विरत , रामलाल की जिंदगी में शायद ही कोई दिन ऐसा आया होगा, जब वह अपने गाँव के मंदिर में जाकर बाबा भोले के दर्शन किये बगैर घर लौटा Read More …

मधुवा की माँ—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

मधुवा की माँ—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   एक लम्बे अरसे के बाद, बीरजू और दीपक, दोनों जब शहर से गाँव लौटे । अपनी पूर्व यादों की मनोवेदना के निर्जन कानन में भटकते हुए कजरी के घर जा पहुँचे, हालाँकि पाँव Read More …

संतान सुख—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  संतान सुख—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह   रामदास और उसकी पत्नी, मैना दोनों ही 60 के ऊपर हो चले थे ,मगर चमड़ी पर झुर्रियाँ अभी तक नहीं आई थीं, न ही बिच्छू के डंक की तरह दीखनेवाली रामदास की मूँछें Read More …

पुत्रमोह—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

पुत्रमोह—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह देवना के पिता सुखेश्वर लाल के , नशे की बात का पूछना ही क्या ? दिन चढ़े तक सोता रहता है और जब नींद खुलती है ,तब धरती पर लोट रही बोतल को लात मारकर कहता Read More …