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भारती के होली मुक्तक

 

 


1ः-
तेरे आने का इन्तजार रहता है मुझे कब से,
तुम आती हो वर्ष में बसन्त ऋतु में जब से।
रंग-बिरंगे परिवेश को जैसा लाता मौसम
ले जाओ घृणाभाव भारत जन से ही वैसे।।

 

2ः-
देखो कहीं बहक न जाये मन तम की बातों में,
उस ज्ञान को छोड़ अज्ञान रूपी काली रातों में।
असत्य लोभ,ईष्र्या-द्वेष को छोड़कर के तुम
मिल जाओ सत्यं शिवं सुन्दरं की बातों में।।


3ः-
होली में जिस तरह के हैं रंग-बिरंगे परिवेश,
वैसे ही देश में भिन्न भाषाएं धर्म और भेष
किन्तु जो रखे हुए है सदैव से एकता सुत्र में
वही हमारी भारतीय संस्कृति का पावन संदेश।।

 

4ः-
सत्य को सदा समर्थन दो मत दो झूठे वादों को,
मैं तुमको वहीं मिलूंगा सत्य धर्म की रातों में।
आपसी मन मुटाव मिटाके तुम जन-जन का।
मिल जाओ अपनत्व भाव से होली की रातों में।।

 

5ः-
भेदभाव मिटे सर्वजनों के दिलों में तभी होली है,
लोगों का आपसी प्रेमभाव ही राष्ट की खुशहाली है।
मात्र ढोग आपसी घृणा मिटाने का करने से क्या-
दिलों में भी प्रेम अपने जगाओ आई आज होली है।।

 

6ः-
जन-जन मिलते हैं परस्पर हिल-मिल कर,
दूर करते हैं तम अपने अन्दर का घुल-मिल कर।
आज व्याप्त है देश में घृणा हिंसा का दौर
रोको सर्वजन आपस में प्रेमभाव जगाकर।।


7ः-

तम प्रकाश का आशय अबकी समझ लो इस होली में,
पुरुषार्थ चतुष्टय का अर्थ समझ लो इस होली में।
तूम निर्णय लो अपने मन में व्याप्त जंजालों का
घृणा-भेदभाव, ईष्र्या को प्रेम से जीत लो होली में।

 

 

 

शशांक मिश्र ’भारती’

 

 

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