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बुधिया की दिवाली

 

बाहर घनी अँधेरी रात थी। फिर भी माहौल में हर तरफ दिवाली के आगमन का उल्ल्हास भरा था। लोग दिवाली के स्वागत में जोर- शोर से लगे हुए थे। कुम्हारों की बस्ती में पाँच-च: वर्षीय बुधिया अपने घर के आँगन में बैठा चूल्हे में जल रही लकड़ियों से उत्पन्न उजाले में अपने पिता के द्वारा बनाये हुए दीयों को देख रहा था। उसके पिताजी हुक्का लिए आये और आँगन में बिछी हुई खाट पर चिंतित से बैठ कर हुक्का गुडगुड़ाने लगे। बुधिया उन्हें देख कर बोला -
"बापू ! इस बार अब तक हमारें सौ -डेढ़ सौ दीये ही बिक़े हैं "
"हाँ ..बिटवा ..लोग अब मिट्टी के दीये कम खरीदते है, लोग नये जमाने के हो गये है न ....मिट्टी के दीयों के बदले बिजली के बलब जलाने लगे हैं इनके लिए रीति रिवाज निभाने के लिए तौर तरीको को बदलने
के कोई नियम क़ानून नहीं होता वो सब तो गरीब गुरबों के लिए होते हैं। " राजाराम अपनी ही धुन में बोले जा रहा था।
"अच्छा बापू !..कल दिवाली है अगर थोड़े दीये और बिक गये तो इस बार हम भी दिवाली के दीये जलाएंगे और पटाखें छुडायेंगे, ठीक है न बापू". "
"अरे नहीं बिटवा ..इस बार भी दीये पटाखे कुछ नहीं ..बल्कि अच्छा -अच्छा खाना पकवान- मिठाई बनायेंगे और सब लोग पेट भर के खायेंगे "
"ठीक है बापू ,भरपेट बढ़िया खाना खायेंगे और दीये जलाएंगे "
"कहा न नहीं,..दीये वीये कुछ नहीं जलाएंगे "राजाराम ने झुंझलाकर कहा,तो बुधिया का मुहँ लटक गया। राजाराम ने बेटे का लटका मुहँ देखा .... ,उसे अपने बेटे पर दया आगयी ,मगर वह अपनी गरीबी से लाचार
था, बेबसी से बोला -" अरे बेटवा हम गरीब लोग है ,या तो पेट भर के खाना खा सकते हैं या त्यौहार मनाने के प्रपंच कर सकते हैं "
"बापू हमारे बनाये दीये और् सब, लोग जलाएँगे और हमहीं क्यों नहीं जला सकते है "बुधिया कुछ मचलते हुए बोला।
"बुधिया बेट्टा हम महँगा तेल कैसे दीयों में डाल के जला दें , कुछ दिनों का खाना बनाने के लिए तेल खरीद पायें वही बहुत है,.हमारे पास दीये तो हैं उन्हें रोशन करने के लिए तेल नहीं है, दरअसल बेट्टा !,. हम लोग खुद इन दीयों की तरह ही हैं ..ये तेल बाती धारण कर ..जलके आँच की तपिश सहके लोगों के मन को खुशियों से और दुनियाँ को रौशनी से भरते हैं ,हम खून पसीना बहा के,..मेहनत करके अपना तन जलाके, लोगों को दीये बना कर देते हैं ,ताकि सदियों से मनती आ रही दिवाली अब भी परम्परा गत तरीके से ही दीये जला कर मनायी जा सके ...समझ रहा है न बेट्टा ".कहते कहते बुधिया की ओर देखा,
बुधिया बापू की बातों को समझने का प्रयत्न करते हुए बोला -
"बापू मैं दिवाली के दिन एक पूड़ी कम खा लूँगा ,मगर एक दीया जरूर जलाऊंगा "
"ठीक है बेट्टा ...मैं और तेरी माँ भी कम खा कर तेरी दिवाली में एक दीया जलाने की तमन्ना जरूर पूरी करेंगे।। "राजाराम ने भी संकल्प लेते हुए बुधिया को गोद में बैठा लिया।

 


- मंजु शर्मा

 

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