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अनोखी दीवाली


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पिछले साल की तरह इस साल भी शिवानी ने दीवाली में नया कुछ करने की ठान रखी थी।

 

दीवाली आने वाली है।एक सप्ताह रह गया है।ऐसा सोचकर शिवानी ने सभी मित्रों को अपने घर बुलाया।दीवाली मनाने के लिए सभी ने अलग-अलग तरीके सुझाये।कोई खिलौने खरीदने कोई पिकनिक मनाने, कोई मिठाईयां लाकर खाने, तो कोई एक स्थान पर बैठकर गीत-कहानियां, चुटकुले सुनाने का कार्यक्रम करने को कहता।

 

शिवानी और भागीरथी की सलाह पर आखिर सबने यह निश्चय किया, कि दीवाली दीपों का त्यौहार है।अन्धकार में रोशनी का दिया जलाने का त्यौहार है।इसलिए क्यों न चन्दा इकट्ठा कर मुहल्ले के गरीब बच्चों की सहायता की जाये।उनको स्कूल में प्रवेश दिलवाकर कापी-किताबें खरीदवायी जायें।

 

मोहित, शुभम्, वीणा, भागाीरथी, शिवानी, एकांशी, शुभांशी आदि मित्र दीवाली मनाने की तैयारी में पूरी तरह जुट गये।

कुछ ही दिनों में मुहल्ले भर के गरीब बच्चों के नामों की सूची बना ली गई। उनके मम्मी -पापा को उन्हें विद्यालय भेजने के लिए तैयार कर लिया गया।

 

बच्चों की मित्र मंडली के दिन-दिन भर कई-कई दिन तक गायब रहने -घूमने से उनके माता-पिता आश्चर्य में पड़ गये, कि आखिर यह सब क्या कर रहे हैं। शिवानी के पापा उससे पूछ ही बैठे-

 

बेटी, क्या बात है? दिन-दिन भर तुम लोग कहां घूमते रहते हो? कभी इस मुहल्ले में; तो कभी दूसरे मुहल्ले में। इस बार तुमने अपने लिए नये कपड़ों व पटाखों की भी मांग नहीं की।

 

पिताजी ऐसा नहीं है, हम सब मित्रों ने इस बार भी दीवाली का त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाने का निश्चय किया है।हम सब दीवाली का दिया फिर अनोखे ढंग से जलायेंगे।आप केवल दीपावली के दिन तक प्रतीक्षा कीजिए। फिर देखना दीवाली की रात को घर के सामने वाले मैदान में क्या होता है। शिवानी ने अपने पिताजी को बतलाया, आखिरकार सभी का इन्तजार समाप्त हुआ।दीपावली आ गई। मुहल्ले के मैदान में बच्चों ने बड़ी अच्छी व्यवस्था कर रखी थी।एक ओर जहां कापी-किताबों को सजाया गया था वहीं दूसरी ओर खिलौने और मिठाईयों को।

 

मुहल्ले भर के लोगों के इकटठा हो जाने पर शिवानी ने माइक संभाला और सभी को सम्बोधित करते हुए बोली- आज हम सभी लोग यहा पर दीपावली मनाने के लिए बड़े ही उत्साह से इकटठे हुए हैं। यह दीवाली मनाने का ढ़ग अनोखा होगा। प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार का यह पर्व भी अपना अलग संदेश छोड़ेगा।हम बच्चे भी अनोखे ढ़ग से दीवाली मना रहे हैं।

 

हम सभी ने घर-घर जाकर पहले चन्दा किया फिर उसके पैसे से कापी-किताबे खरीदीं। गरीब बच्चों की सूची बनायी। उनके माता-पिता को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए तैयार किया।

 

आगे की कार्यवाही के लिए माइक बहिन भागीरथी को सौंपती हंू-

 

-‘‘ हां तो सज्जनों,इस बार हम सबने अपने गरीब मित्रों के जीवन में ज्ञान का दीपक जलाकर दीपावली मनाने का निश्चय किया है। जो अब तक विद्यालय नहीं जा पा रहे थे।उनको कापी-किताबें देकर विद्यालय भेजने खील-बताशे खिलाने का निश्चय किया है।

 

मै अपने पास की सूची से एक-एक बच्चे का नाम पुकारुंगी वह जाकर कापी-किताबे ले लेगा।

 

 

शशांक मिश्र ’भारती’

 

 

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इसके बाद सभी ने अपनी-अपनी कापा-किताबे ली खील-बताशे खाये और अपने-अपने घर चले गये।