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स्वर हर्ष का


शशांक मिश्र भारती


आज हमारे देश में व्याप्त क्यों,
इतने भीषणतम अत्याचार हैं।
कहीं बह रही अनैतिक सलिला,
कहीं पलते दैहिक व्यापार हैं।
हिंसा-प्रतिहिंसा फलती जाती
अलगाव-भ्रष्टाचार बढ़ता है,
सत्यता जाने छुपी कहां पर
तापमान अन्याय का चढ़ता है।
जो जितना यहां ईमानदार है
वह उतना ही आज पिछड़ता है,
जिसने सोची निःस्वार्थ सेवा
उसमे ही आ गयी जड़ता है।
अमीरों का देश बना इण्डिया है
गरीब पुराने भारत में मरता है,
शेयर, इंजीनियर, डाक्टरें की चर्चा
न जाने गरीब कहां-कहां खपता है

सत्य अहिंसा के पुजारी का
पावन देश कभी क्या महकेगा,
घर-घर खुशियां फैलेंगी
स्वर हर्ष-हर्ष का चहकेगा।

 

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