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राखी आए, राखी जाए—राहुल उपाध्याय



साधन बढ़े, संसाधन बड़े हैं
फिर भी मन में कुछ ऐसे रोड़े पड़े हैं
कि
न बहन राखी भेजे, न भाई उपहार दिलाए
कोरी बधाई से दोनों काम चलाए
स्काईप-फ़ेसबुक पे करें लम्बी बातें
लेकिन लिफ़ाफ़े में रोली-अक्षत रखी न जाए
राखी आए, राखी जाए
पर्व की खुशबू कहीं न आए
बहन भाई से हमेशा दूर रही है
घर-संसार में मशगूल रही है
लेकिन इतनी भी कभी लाचार नहीं थी
कि भाई का पता भी पता नहीं है
सिर्फ़ एस-एम-एस से काम चलाए
घिटपिट-घिटपिट बटन दबाए
पर्व की उपेक्षा
ये करती पीढ़ी
चढ़ रही है
उस राह की सीढ़ी
जिस राह पे डोर का मोल नहीं है
तीज-त्योहर का कोई रोल नहीं है
संस्कृति आखिर क्या बला है
इस पीढ़ी को नहीं पता है
बस पैसा बनाओ, पैसा बटोरो
किसी अनुष्ठान के नाम पे काम न छोड़ो
24 घंटे ये सुई से भागे
कभी रुक के न मन में झांके
कि इस दौड़ का आखिर परिणाम क्या होगा?
जब होगी जीवन की शाम, क्या होगा?

 

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