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शशांक मिश्र भारती की रक्षाबन्धन पर तीन कविताएं-


सार्थक रक्षाबनधन मनाना होगा


बहिनों ने फिर से है संकल्प उठाया
देखा-रक्षा पर्व जब इस बार है आया।
भइया रखनी है राखी की मर्यादा
हुमायूं ने जैसे अपना वादा निभाया।
आज मर्यादाये पड़ीं हुई संकट में हैं
आप सबकों अपना धर्म निभाना होगा।
गांव से शहर तक चीर हरण रुकें
अपनी रणनीति को ऐसा बनाना होगा।
इक्कीसवीं सदी में हम सब पहुंचे हैं
पर अपनी ही जड- जमीन भुलाये हैं।
विस्मृति की धुन्ध छा गयी ऐसे है,
अपने ही अपनों से जारहे बिसराये हैं।
माता-पिता ही नहीं वृक्ष भी अब तो
अहं स्वार्थ-लिप्सा हित बांटे जाते हैं।

 

अपने-अपनों की नयी परिभाषा गढ़
कहीं काटे और कहीं डांटे जाते हैं।
राखी के धागे का जन्म, महत्व क्या
इस रक्षा पर्व पर समझ जाना होगा।
यह पर्व हमें दे सके सद्दिशा बोध यदि
तभी सार्थक रक्षा बन्धन मनाना होगा।।


रक्षाबन्धन बने वक्षपर्व


क्यों न ऐसा रक्षा पर्व मनाएं
खुले गांठ सब अपने हो जायें।
किसी के हृदय में न हो कटुता
मर्यादा हित अब संकल्प उठायें।
इस पर्व को पर्यावरण से जोंड़ें
उसके हित यह गर्व से मनायें।
भाईयों की कलाई सजती ज्यों है
वैसे ही हम सभी वृक्ष सजायें।
बहिन-भाई न हों घर तक में
पौधे-वृक्ष सभी भाई बन जायें।
रक्षा सूत्र का इनसे भी नाता है
आओं मिलकर सबको समझायें।

 

यूं तो प्रतिवर्ष हैं यह पर्व मनाते
इस बार कुछ नया करके बनायें
रक्षा बन्धन मने वृक्ष पर्व सा बन
ऐसे ही अब हम संकल्प उठायें।।


सम्बन्ध सूत्र


बहना ने सजाये जो सुन्दर सपने
पराये भी करने हैं इस बार अपने।
सभी में समरसता के भाव फैलाने
उत्साह बढ़ायें सजी राखी की दूकानें।
बहिन-भाई का पवित्र सूत्र पर्व यह
रक्षाबन्धन सम्बन्ध प्रगाढ़ बनाता है।
हमारा इतिहास जिसका गवाह है
मर्यादाहित इसका धर्म से ऊपर नाता है।
आज नहीं सदियों से ही यह तो
इस भरत भूमि का रहा गौरव है।
सभी को पवित्र बन्धन में बांधता
बहिन-भाई के रिश्ते का सौरभ है।
बहिन के रक्षा सूत्र का दिवस यह
मार्गदर्शन भाईयों को दिलाता है।
भूले बिसरे न मिलपाने वालों को
रक्षाबन्धन आकर के मिलवाता है।

 

इसे कच्चे धागे का सूत्र न मानो
अटूट सम्बन्धों का यह दाता है।
अनुजा के हित सर्वस्व त्यागिए
दुष्टता विनाशक कटुता का त्राता है।।

 

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