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पथ के पुष्प


मेरे-
पथ के वे मनोरम पुष्प और
अधखिली पंखुड़ियां स्मरण आ रहे हैं
अपनी स्मृति, महानता, उपयोगिता के
महत्व का आभास दे रहे हैं,
जिनको-
उपेक्षा से अनदेखा कर दिया
कभी-
अपने अन्दर अहंकार का बीज
अंकुरित होने के कारण
सार्थकता भी समझी थी नहीं,
मान लिया था खिलौना व्यर्थ का।
लेकिन-
आज जब कठोर श्रम के बाद भी
शुरु हो गया है असफलताओं का क्रम
मानसिक अशान्ति, शारीरिक कष्टों का दौर,
तो-
उनमें उपयोगिता दिखलाई पड़ रही है
जिनका कि अब-
अस्तित्व होगा भी या नहीं
यह विचार का विषय है;
फिर भी-
आशान्वित हंू उन मनोरम पुष्पों
और-
अधखिली पंखुड़ियों को पाने के लिए
उनकी मोहकता का
सपर्श कर उनसे लाभान्वित हो
सकूंगा अपने पथ पर।

 

 

शशांक मिश्र ’भारती’

 

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