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आ गया वर्ष फिर नूतन कुछ राहें नई दिखाओ

 

डॉ. रंजन विशद

 

new year

 

अन्तर के पट खोलो तुम मन की उलझन सुलझाओ।
आ गया वर्ष फिर नूतन कुछ राहें नई दिखाओ।

 

जाने कब से भटके हैं जाने कब से अटके हैं।
हम सब त्रिशंकु से जग में जाने कब से लटके हैं।
सुविधाओं के भोगी हैं, शंकाओं के रोगी हैं।
सच पूछो तो हम केवल बातों के ही योगी हैं।

 

बदलों ऐसी फितरत को चिन्तन की फसल उगाओ।
आ गया वर्ष फिर नूतन कुछ राहें नई दिखाओ।

 

बीते वर्षों में हमने देखे हैं अनगिन सपने।
बन सके भला उनमें से बतलाओ कितने अपने।
दिन के ऐसे सपनो से जग का उत्थान न होगा।
ईश्वर न मिलेगा जब तक सच्चा इन्सान न होगा।

 

व्यर्थ के प्रदर्शन छोड़ो मौलिकता को अपनाओ।
आ गया वर्ष फिर नूतन कुछ राहें नई दिखाओ।

 

अब इतना समय नही है हम इन्तज़ार कर पाएँ।
निज दम्भ, द्वेष को तजकर जग को समृद्ध बनाएँ।
बसुधैवकुटुम का जिस दिन मन में संकल्प जगेगा।
सबको सबका ही सुख दुख अपना सुख दुःख लगेगा।

 

यह शाश्वत सृष्टि नियम है इसको न कभी बिसराओ।
आ गया वर्ष फिर नूतन कुछ राहें नई दिखाओ।

 

 

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