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नए साल की आहट पाकर

 

new year

 

इन गुलाब की पंखुड़ियों पर
जमी
ओस की बुँदकी चमकी
नए साल की आहट पाकर
उम्मीदों की बगिया महकी

 

रही ठिठुरती
सांकल गुपचुप
सर्द हवाओं के मौसम में
द्वार बँधी
बछिया निरीह सी
रही काँपती घनी धुँध में

 

छुअन किरण की मिली सबेरे
तब मुँडेर पर चिड़िया चहकी

 

दर-दर भटक रही
पगडंडी
रेत-कणों में
राह ढूँढती
बरगद की
हर झुकी डाल भी
जाने किसकी
बाँट जोहती

 

एक उदासी ओढे थी जो
नदिया की वह धारा हुमकी

 


- बृजेश नीरज

 

 

 

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