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मजदूर

 

majdoor

 

नहीं बनता समाज बड़ों से,नहीं चलता सब काज बड़ों से
कार्य –कुशल व्यक्ति महान , उससे होती उसकी पहचान
अथक मनोबल मन में भरते ,तूफानों के बीच में रहते
फिर भी वो मजदूरी करते ,उन सबको मजदूर ही कहते
प्रखर ताप में तन को जलाते ,बारिश की बूंदों को सहते
सच्चे हितैषी बन कर जीते ,उन सब को मजदूर ही कहते
उचें महल बनाकर देते ,जी-तोड़ मेहनत जो करते
खुद रहने खाने को तरसते ,उन सब को मजदूर ही कहते
चोर नहीं ‘बे’ इमान न होते ,कामचोर इन्सान न होते
लोकहित से जूड़े जो होते ,उन सब को मजदूर ही कहते
मजदूर बिना कुछ काम ना होता ,जन –समाज की शान ना होता
इक-दूजे की मान ना होता ,धर्म –कर्म –स्वाभिमान ना होता

 

 


भारती दास

 

 

 

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