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महान विदुषी –कैकेयी

 

भारती दास

 

 

नृप दशरथ की दूसरी रानी
नाम था कैकेयी बड़ी सयानी
थी विदुषी प्रतिभा –सम्पन्न
परम सुन्दरी वीरांगना अनुपम
सती-साध्वी चरित्र था उनका
पति –प्रेम में अटूट सा निष्ठा
राज –कार्य में करती सहयोग
नहीं रखती कुछ मन में क्षोभ
शम्बरासुर के साथ युद्ध में
दशरथ जूझ रहे थे क्रुद्ध में
तब कैकेयी ने दिखायी हिम्मत
सारथी बनकर बचाई इज्जत
राजा दशरथ थे मर्मज्ञ
एहसान मानकर हुए कृतज्ञ
हमसे कोई दो वर मांगों
हे प्रिय तुम कुछ ना सोचो
है मेरा वरदान धरोहर
मांग लूंगी कभी समय पर
अंतर कभी नहीं करती थी
राम की जननी माता सी थी
एक - दूजे में स्नेह समान
कैकेयी लुटाती रहती जान
दुखद आहट से अनजान
समय चला कुचक्र महान
परम्परा यही चलती थी
ज्येष्ठ पुत्र को ही मिलती थी
राजा की उत्तराधिकारी
राम ही होंगे थी तैयारी
कैकेयी ख़ुशी से झूम उठी थी
पर अनहोनी कुछ और वदी थी
मंथरा नाम की दासी खास
जिसने लगा दी द्वेष की आग
दिल –दिमाग से तिक्त हुई
करुणा –ममता से रिक्त हुई
राजा से मांगी दो वरदान
‘’भरत-राज्य‘’ और ‘’वन को राम’’
चौदह वर्ष वनवास मिला
कैकेयी को संतोष मिला
राम –राम बस राम कहे
दशरथ जी निज प्राण तजे
इसी घटना ने मोड़ दिया
कलंक से नाता जोड़ दिया
कुमति –मति की थी लाचारी
अपने पति की बनी हत्यारी
कुपथ –गामिनी बनी अभागी
बनी कलंकिनी जो थी त्यागी
विधि की मोहरा वो सटीक थी
लेकिन प्रेम की वो प्रतीक थी
बन गयी वो घृणा के पात्र
बनी पापिनी मूढ़ कुपात्र
‘’लेकिन एक प्रश्न है सबसे
विदुषी महिला थी वो मन से
फिर क्यों ऐसा काम कर गयी
लोक –लाज से क्यों गड़ गयी ‘’
ऋषि –मुनि को सर्व –विदित था
विधि की लीला स्व –रचित था
कुल के हित को चाहने वाली
राम को विजय बनाने वाली
भविष्य सुनहरा कर गयी वो
राम की प्रेरणा बन गयी वो
दूर –दृष्टि कहते है उनको
जिसने कलंकित की थी खुद को
स्नेह की डोर से बांधता कौन
उत्तर से दक्षिण जाता कौन
जन –जन के मन में समाता कौन
अन्याय रावण का मिटाता कौन
हिन्दू –मन ने वहिष्कार किया
सदा उन्हें तिरस्कार किया
पेशेवर हत्यारी नहीं थी
अपराधी व्याभिचारी नहीं थी
पुत्र ने भी बैर ही माना
अशुभ कहा उन्हें गैर ही माना
इससे बड़ा क्या होगा दण्ड
माँ की ममता हो गयी खंड
कैकेयी की अपराध बोध
ग्लानि-नीर से बहा था क्षोभ
पछतायी वो मन से भर-कर
प्रायश्चित की उर से रोकर
पीड़ित-व्यथित-संकुचित हुई
आत्म-पीड़ा से दुखित हुई
कैकेयी की ये कथा बताती
निश्चय शुभ सन्देश है देती
कभी किसी की बात में आकर
ना भुलाये चरित्र ये सुन्दर
खुद को पापी-पीड़ित बनाकर
क्यूँ जीये अपमानित होकर
राम ने श्रद्धा-पात्र बनाया
निर्मल और निष्पाप बनाया
घृणित नहीं वन्दित हुई वो
निन्दित नहीं पूजित हुई वो
भरत-जननी श्रेष्ठ थी नारी
महान विदुषी दशरथ प्यारी
उन्होंने की जग पे एहसान
देकर शुभ-सुन्दर परिणाम.

 

 

 

 

भारती दास

 

 

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