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होली

 

holi

 

भारती दास

 

 

गाँव –गाँव डगर डगर
मस्ती की धूम मचाता
जिस रंग से तन-मन भीगा
वही होली फिर आ पहुंचा
चिंतन के उन रंगों में
अपना वजूद भी आ सिमटा
विचारशील लोगों ने तो
होली को उन्माद ही समझा
नैतिकता से बढ़कर कोई
और नहीं जग की सुन्दरता
अमर हो गए लोग वो सारे
जिन्होंने था इसको परखा
अपनी ही जिद्द-हठ के कारण
जल मरी खुद होलिका
भक्त प्रहलाद तो श्रेष्ठ बने
जीती भक्ति उदारता
सतरंगी इस दुनियां में
रंग –संग स्नेह बरसता
ये पावन त्यौहार मनाएं
जब तक है जीवन की क्षमता

 


द्वारा :- भारती दास

 

 

 

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