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गणतंत्र दिवस

 

rday

 

प्रश्न पूछता है गणतंत्र
क्या देश हमारा हुआ स्वतंत्र
समय का चक्र जो था पुराना
वही गुलामी विकट जमाना
अस्त हुआ था गुलामी सूरज
दमक उठा था तेज का वैभव
अनवरत संघर्ष का जोर
अंग्रेज चला भारत को छोड़
इतनी मेहनत इतना त्याग
फिर क्यों फैला भ्रष्ट का आग
दागदार सांसद है आज
दुर्दिन में जीता समाज
अनुशासन तो है ही नहीं
नैतिक आचरण कहीं नहीं
जन-गण की कोई मूल्य नहीं
उनकी चिंता मुख्य नहीं
कुंठित-दुखी विक्षुब्ध युवा है
पथ-विहीन सा उसकी दशा है
जख्म सदा खाते रहे
दुश्मन मुखर होते रहे
खून आँसूं वादे हजार
लोग हुए बेहद लाचार
शिखर पुरुष चिन्तक मनीषी
कहीं नहीं दीखते हितैषी
प्रकाश-स्तंभ आदर्श नहीं है
व्यक्ति कोई विशिष्ट नहीं है
बौद्धिक चिंतन अनिवार्य हुआ
स्व-सुधार कर्तव्य हुआ
गुजरे दिन को करके याद
गण-तंत्र दिवस मनाये आज .

 

 

 

भारती दास

 

 

 

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