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दीप जलाओ शांती की

 

 

lambodharan

 

 

लंबोधरन पिल्लै. बी

 

 

 

साहित्य में
संस्कृति में
सामाजिकता में
आर्थिक क्षेत्र में
हर ओर कुरूपताएँ है ।
हर क्षेत्र पर अंधकार छाया हुआ है
न्याय कहाँ है ?
सभी ओर अंधकार है
नीति को बदलकर अनीति बनाया गया
विवेक को कम कराकर
अविवेक को वरण किया
अच्छाई का स्थान निकालकर
बुराई को फैला दिया
चारों ओर घोर तम है
उसमें हम ढ़ूंढ़ रहा है
नीति,विवेक,न्याय और अच्छाई को
राख में आग का टुकडा अवश्य मिलेंगे
उसे फू्ँक फूँक दो
ज्वाला,ज्वालाएँ बनाकर
अंधकार को मिटाने का
समय है यह
अज्ञता रूपी अंधकार को दूर करे
दीपावली आयी है
दीप जलाओ शांती की ।

 

 

 

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