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दीप और कवि महेंद्रभटनागर
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[१] दीप
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दीप, तुम्हें तो जलना होगा !
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नभ के अगणित टिमटिम तारे,
जग के कितने जीवन-प्यारे,
बारी-बारी से सो जाएंगे,
सपनों का संसार बसाए
दीप, तुम्हें पर जलना होगा !
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तूफ़ान मचेगा जब जग में,
गहरा तम छाएगा मग में,
जब हिल-हिल जाएंगे भूधर,
डोल उठेगा भूतल सारा
दीप, तुम्हें तब जलना होगा !
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[२] दीपक
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मूक जीवन के अँधेरे में, प्रखर अपलक
जल रहा है यह तुम्हारी आश का दीपक !
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ज्योति में जिसके नयी ही आज लाली है
स्नेह में डूबी हुई मानों दिवाली है !
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दीखता कोमल सुगन्धित फूल-सा नव-तन,
चूम जाता है जिसे आ बार-बार पवन !
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याद-सा जलता रहे नूतन सबेरे तक,
यह तुम्हारे प्यार के विश्वास का दीपक !
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[३] मृत्यु-दीप
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कौन-से दीपक जले ये ?
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विश्व में जब सनसनातीं वेग से नाशक हवाएँ,
साथ जिनके आ रही हैं हर मनुज-सर पर बलाएँ,
हो रहा जीवन-मरण का खेल जब रक्तिम-धरा पर,
मिट रहे मानव अनेकों घोर क्रन्दन का जगा स्वर,
त्रस्त-पीड़ित जब मनुजता कौन से दीपक जले ये ?
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युद्ध के बादल गगन में, भूख धरती पर खड़ी है,
सांध्य-जीवन की करुण तम यह असह दुख की घड़ी है,
मृत्यु का त्यौहार है क्या ? विश्व-मरघट में जले जो,
स्नेह बिन बाती जलाकर शून्य में रो-रो पले जो ?
प्रज्वलित हैं जब चिताएँ कौन-से दीपक जले ये?
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[४] झंझा में दीप
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आज तूफ़ानी निशा है, किस तरह दीपक जलेंगे !
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मुक्त गति से दौड़ती है शून्य नभ में तीव्र झंझा,
शीर्ण पत्रों-सी बिखरती चीखती हत त्रास्त जनता,
क्योंकि भीषण ध्वंस करतीं बदलियाँ नभ में चली हैं,
क्योंकि गिरने को भयावह बिजलियाँ नभ में जली हैं,
मेघ छाये हैं प्रलय के, नाश करके ही टलेंगे !
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आज जन-जन को जलाना है न, निज गृह दीप-माला,
आज तो होगी बुझानी सर्व-भक्षक विश्व-ज्वाला,
तम धुआँ छा प्रति दिशा में घिर गया गहरा भयंकर
युग-युगों का मूल्य संचित मिट रहा, रोदन भरा स्वर,
कर्ण-भेदी लाल अंगारे स्वयं फटकर चलेंगे !
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एकता की ज्योति हो; जिससे मिले मधु स्नेह अविरल,
और तूफ़ानी घड़ी में जल सके लौ मुक्त चंचल,
शक्ति कोई भी न सकती फिर मिटा, चाहे सुदृढ़ हो,
विश्व का हिंसक प्रलयकारी भयंकर नाश गढ़ हो,
फिर नहीं इन आँधियों में दीप जीवन के बुझेंगे !
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[५] प्राण-दीप
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रात भर जलता रहा यह दीप प्राणों का अकेला !
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वेग लेकर नाश का आया पवन था,
शक्ति के उन्माद में गरजा गगन था,
दीप, पर, अविराम जलने में मगन था,
आ नहीं जब तक गयी संसार में नव-स्वर्ण-बेला !
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रात भर हँस-हँस सतत जलता रहा है,
आँधियों के बीच भी पलता रहा है,
आततायी का अहम् दलता रहा है,
मूक, हत, भयभीत मानव को दिया जगमग उजेला !
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[६] ज्योति-पर्व
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मिट्टी के लघु-लघु दीपों से जगमग हर एक भवन !
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अँधियारे की लहरों से भूमि भरी,
पर, उस पर तिरती झलमल ज्योति-तरी,
जलना है, चाहे हो जाये तारक-शशि हीन गगन !
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जग पर छायी धूमिल वाष्प असुन्दर,
पर, बहता है अविरल स्नेह-समुन्दर,
युग के मन-मरुथल में तुमको रहना है भाव-प्रवण !
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विशृंखल तेज़ प्रभंजन से संसृति,
पर, मुसकाती संग नयी बन आकृति,
टूटेगा बाँध प्रलय का जब हर नूतन सृष्टि चरण !
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कोलाहल हर कोने से फूट रहा,
अब तो सपनों का बंधन टूट रहा,
खो जाएगा नव-जीवन की हलचल में क्षीण मरण !
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[७] दीप जलाओ!
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आँगन-आँगन दीप जलाओ,
दीपों का त्योहार मनाओ !
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स्वर्णिम आभा घर-घर बिखरे
मनहर आनन, कन-कन निखरे
ज्योतिर्मय सागर लहराये
काली-काली रात सजाओ !
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निशि अलकों में भर-भर रोली
नाचें जगमग किरनें भोली
आलोक घटा घिर-घिर आये,
सारी सुधबुध भूल नहाओ !
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हर उर अभिनव नेह भरा हो
युग-युग रोयी धन्य धरा हो,
चलो सुहागिन, थाल उठाओ
नभ-गंगा में दीप बहाओ !

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[८] दीपमाला
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आज घर-घर छा रहा उल्लास !
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भर हृदय में प्रीत
मधु मदिर संगीत
आज घर-घर दीपकलिका वास !
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नव सुनहरा गात
जगमगाती रात
आज घर-घर जा लुटाती हास !
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कर रमन शृंगार
भर उमंग विहार
आज घर-घर दीप-माला रास !
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[९] अभिषेक
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माना, अमावस की अँधेरी रात है,
पर, भीत होने की अरे क्या बात है ?
एक पल में लो अभी —
जगमग नये आलोक के दीपक जलाता हूँ !
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माना अशोभन, प्रिय धरा का वेष है
मन में पराजय की व्यथा ही शेष है,
पर, निमिष में लो अभी —
अभिनव कला से फिर नयी दुलहिन सजाता हूँ !
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कह दो अँधेरे से प्रभा का राज है,
हर दीप के सिर पर सुशोभित ताज है,
कुछ क्षणों में लो अभी —
अभिषेक आयोजन दिशाओं में रचाता हूँ !
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[१०] दीप धरो
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सखि ! दीप धरो !
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काली-काली अब रात न हो,
घनघोर तिमिर बरसात न हो,
बुझते दीपों में हौले-हौले,
सखि ! स्नेह भरो !
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दमके प्रिय-आनन हास लिए,
आगत नवयुग की आस लिए,
अरुणिम अधरों से हौले-
हौले, सखि ! बात करो !
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बीते बिरहा के सजल बरस
गूँजे मंगल नव गीत सरस
घर आये प्रियतम, हौले-हौले
सखि ! हीय हरो !
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[११] दीप जलता है!
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दीप जलता है !
सरल शुभ मानवी संवेदना का स्नेह भरकर
हर हृदय में दीप जलता है !
युग-चेतना का ज्वार
जीवन-सिंधु में उन्मद मचलता है !
दीप जलता है !
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तिमिर-साम्राज्य के
आतंक से निर्भय
अटल अवहेलना-सा दीप जलता है !
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जगमगाता लोक नव आलोक से,
मुक्त धरती को करेंगे
अब दमन भय शोक से !
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लुप्त होगा सृष्टि बिखरा तम
हृदय की हीनता का ;
क्योंकि घर-घर
व्यक्ति की स्वाधीनता का
दीप जलता है !
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बदलने को धरा
नव-चक्र चलता है !
नहीं अब भावना को
गत युगों का धर्म छलता है !
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सकल जड़ रूढ़ियों की
शृंखलाएँ तोड़
नव, सार्थक सबल
विश्वास का
ध्रुव-दीप जलता है !
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[१२] संकल्प
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शक्तिमत्व हो,
दीपाराधन हो !
मरणान्तक रावण की शर्तें
निविड़-तमिस्रा की पर्तें
टूटेंगी,
टूटेंगी !
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कृत-संकल्पों के राम जगे
जन-जन के अन्तर में !
आग्नेय-अस्त्र
पुष्पक-मिग
संचालक उत्पन्न हुए
घर-घर में !
सीमाओं के प्रहरी
बने अजेय हिमालय,
मानवता की निश्चय जय !
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दीपोत्सव हो,
दीपोत्सव हो !
ज्योति-प्रणव हो !
हर बार
तमस्र युगों पर
प्रोज्ज्वल विद्युत आभा
फूटेगी,
फूटेगी !
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शक्तिमत्व हो,
दीपाराधन हो !
गर्विता अमा का
कण-कण बिखरेगा,
दीपान्विता धरा का
आनन निखरेगा !
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[१३] अग्नि-परीक्षा
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काली भयानक रात,
चारों ओर
झंझावात,
पर, जलता रहेगा —
दीप...
मणिदीप
सद्भाव का,
सहभाव का !
उगती जवानी
देश की
होगी नहीं गुमराह !
उजले देश की
जाग्रत जवानी
लक्ष्य युग का भूल
होगी नहीं गुमराह
तनिक तबाह !
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मिटाना है उसे —
जो कर रहा हिंसा,
मिटाना है उसे —
जो धर्म के उन्माद में
फैला रहा नफ़रत,
लगाकर घात
गोली दाग़ता है
राहगीरों पर
बेक़सूरों पर !
मिटाना है उसे —
जिसने बनायी ;
धधकती बारूद-घर
दरगाह !
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इन गंदे इरादों से
नये युग की जवानी
तनिक भी
होगी नहीं गुमराह !
.

चाहे रात काली और हो,
चाहे और भीषण हों
चक्रवात-प्रहार,
पर,
सद्भाव का: सहभाव का
ध्रुव-दीप / मणि-दीप
निष्कम्प जलता रहेगा !
साधु जीवन की
सतत साधक जवानी
आधुनिक,
होगी नहीं गुमराह !
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भले ही
वज्रवाही बदलियाँ छाएँ,
भले ही
वेगवाही आँधियाँ आएँ,
सद्भावना का दीप
सम्यक् धारणा का दीप
संशय-रहित हो
अविराम / यथावत्
जलता रहेगा !
एक पल को भी
न टूटेगा
प्रकाश-प्रवाह !
विचलित हो,
नहीं होगी
जवानी देश की
गुमराह !
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उभरीं विनाशक शक्तियाँ
जब-जब,
मनुजता ने
दबा कुचला उन्हें
तब-तब !
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अमर —
विजय विश्वास !
इतिहास
चश्मदीद गवाह !
जलती जवानी देश की
होगी नहीं गुमराह !
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एकता को
तोड़ने की साज़िशें
नाकाम होंगी,
हम रहेंगे
एक राष्ट्र अखंड
शक्ति प्रचंड !
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सहन
हरगिज़ नहीं होगा
देश के प्रति
छल-कपट विश्वासघात
गुनाह !
मेरे देश की
विज्ञान-आलोकित जवानी
अंध-कूपों में
कभी होगी नहीं गुमराह !
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[१४] दीप्र
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अवशेष स्वयं को कर
दहता जो
जीवन - भर !
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दूर-दूर तक
राहों का
हरता अंधियारा,
अन्तर - ज्वाला से
घर - घर
भरता उजियारा :
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उसके सर्वोत्तम सक्षम
प्रतिनिधि हम,
तम-हर ज्योतिर्गम !
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[१५] संकल्पित
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प्रज्ज्वलित-प्रकाशित
दीप हैं हम !
सिर उठाये,
जगमगाती रोशनी के
दीप हैं हम !
वेगवाही अग्नि-लहरों से
लहकते चिन्ह-धर,
ध्रुव-दीप हैं हम !
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शांत प्रतिश्रुत
दृढ़ प्रतिज्ञाबद्ध
छायी घन-अंधेरी शक्ति का
पीड़न-भरा
साम्राज्य हरने के लिए,
सर्वत्र
नव आलोक-लहरों से
उफ़नता ज्वार
भरने के लिए !
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हमारा दीप्त
द्युति-अस्तित्व
करता लोक को आश्वस्त,
जन-समुदाय की प्रत्येक आशंका
विनष्ट-निरस्त !
भर उठता
सहज हर्षानुभूति से
हर दबा भय-त्रस्त !
होता एक क्षण में
रुद्ध मार्ग प्रशस्त !
प्रतिबद्ध हैं हम
व्यक्ति के मन में
उगी-उपजी
निराशा का, हताशा का
कठिन संहार करने के लिए !
हर हत हृदय में
प्राणप्रद उत्साह का
संचार करने के लिए !

 

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