tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






 

 

आओ .....

 

 

'आओ …'

 

कंदीलें खिड़की की चौखट में लटकाऐं
दर और दीवारों पर बंदनवार सजाऐं
मुख में रसगुल्ले भर-भर के …
शब्द चाशनी में तर कर के …
मजबूरों को खील-बताशे भी दे आऐं ;
मज़दूरों के घर में भी इक दिया जलाऐं ।

 

रक्खें दीप-शिखा को छत पे यूं ऊंचा कर
होएं प्रकाशित अपने घर से उनके भी घर
करें आरती ऐसे स्वर में ...
लय गूंजे हर एक डगर में …
दें आशीष प्रभू हम सब को, ऐसा गाऐं ;
मज़दूरों के घर में भी इक दिया जलाऐं ।

 

मोमबत्तियां मुंडेरों पर चमक उठें जब
दीप-दीप हर आंगन-आँगन दमक उठें जब
'आतिश' बम्ब-पटाख़े फोड़ें …
दो दर्ज़न फुलझड़ियाँ छोड़ें …
दो फुलझड़ियाँ उन बच्चों से भी चलवाऐं ;
मज़दूरों के घर में भी इक दिया जलाऐं ।

 

 

 

 

Ganga Shyam Jadoun

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...