ताराचंद तन्हा: एक शब्द साधक ---- घनश्याम भारतीय

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ताराचंद तन्हा: एक शब्द साधक ---- घनश्याम भारतीय

Post by admin » Mon Nov 26, 2018 3:39 pm

ताराचंद तन्हा: एक शब्द साधक
घनश्याम भारतीय
सामाजिक गतिविधियों का प्रतिबिंब दिखाने और उसमें व्यापक परिवर्तन का दम रखने के लिए समाज का दर्पण कहे गए साहित्य की अनेकानेक विधाओं में हास्य व्यंग्य एक प्रमुख विधा है। इसके माध्यम से पाठकों और श्रोताओं के मन को गुदगुदाते हुए उनके दिल में उतर कर व्यवस्था पर की जाने वाली चोट वास्तव में बहुत ही गहरी और परिवर्तन में कारगर सिद्ध होती है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं की भांति इसको समझना दुरूह नहीं होता। इसमें अभिव्यक्त भावार्थ को मनोरंजन के साथ बेहद आसानी से समझा व परखा जा सकता है। यूं कहें कि कम पढ़ा लिखा पाठक व श्रोता भी हास्य व्यंग्य की रचना में निहित भावार्थ को बेहद आसानी से समझ लेता है। इसमें दो राय नहीं कि हास्य व्यंग्य की रचना लोक ग्राही होती है।
वर्तमान समय में हास्य की धनुष से व्यंग्य बाण चलाकर सियासत और शासन को एक नई दिशा देने वाले रचनाकारों की देश में एक लंबी फेहरिस्त है। उस फेहरिस्त में कुछ ऐसे नाम है, जिन पर देश की जनता को नाज है। ताराचंद तन्हा उन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने अवध के अदब की खुशबू को देशभर में बिखेरा है। यही खुशबू देश की सीमा से परे दुनिया के कई देशों में भी फैल रही है। आज ताराचंद तन्हा किसी परिचय के मोहताज नहीं है,परंतु कम ही लोग जानते होंगे कि गरीबी और मजबूरी के थपेड़ों को झेलते हुए संघर्षों की आग में स्वयं को तपा कर ही वे इस मुकाम तक पहुंचे हैं। स्थिति यह है कि उनके बगैर कवि सम्मेलनों का मंच अधूरा समझा जाता है।
70 के दशक में उनके पिता लुधियाना की एक फैक्ट्री में काम करते थे और पूरे परिवार के साथ वही रहते थे। जहां 24 अक्टूबर 1969 को ताराचंद का जन्म हुआ। जब वे एक वर्ष के हुए, उनके माता-पिता अपने पैतृक निवास सआदतगंज फैजाबाद आ गए। यहां तन्हा की स्नातक तक की शिक्षा विपरीत और विकट परिस्थितियों में हुई। इस दौरान सामाजिक व राजनीतिक प्रदूषण तथा जीवन संघर्षों ने साहित्य सृजन के रास्ते पर ला खड़ा किया। छात्र जीवन में ही उन्होंने बेहतरीन लेखन शुरू कर दिया। फैजाबाद शहर में होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों और नशिश्तो से निकल कर जब उन्होंने उस्ताद शायरों कवियों के संरक्षण में कवि सम्मेलन व मुशायरे के मंच की ओर रुख किया तो तमाम अवरोधों को तोड़ कर शीघ्र ही अपनी एक प्रभावी छवि बना ली। तन्हा के भीतर कुछ नया करने की ललक और सीखने की जिद भी खूब है। एक बार न्योरी मे मुशायरे के मंच पर एक शायर ने उर्दू न जानने पर इन्हें हेय दृष्टि से देखते हुए खिल्ली क्या उड़ाई उन्होंने उर्दू सीखने की ठान ली।छ माह बाद जब उसी शायर को तन्हा ने उर्दू में खत लिखा तो वह दंग रह गया। आगे चलकर एक विषय उर्दू से हाईस्कूल,इंटर और बीए फिर से करके बेसिक शिक्षा परिषद से उर्दू अध्यापक की नौकरी तक हासिल की।इसके पूर्व वे जल निगम में लिपिक थे। जिसे छोड़ कर 2006 में सोनी सब टीवी के वाह वाह कार्यक्रम की प्रस्तुति देने मुम्बई चले गए थे।जहां थोड़े ही समय मे दर्शकों के दिल में बसकर प्रशंसकों की एक लंबी फौज खड़ी की।
अवध का संस्कार, हिंदी की समझ और उर्दू की पकड़ से उनका साहित्यिक पहलू काफी मजबूत है। वे आसान शब्दों में गूढ़ बात कहने की भी कूवत रखते हैं। ऐसा नहीं कि अन्य हास्य व्यंग्य कवियों की भांति उनकी रचनाएं सतही हैं अपितु उनकी रचनाएं विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर केंद्रित, काफी ठोस व समाज को नई दिशा देने वाली होती हैं।
राष्ट्रवाद व राष्ट्र प्रेम को लेकर हो रही सियासत जब उन्हें झकझोरती है तो यह रचना फूटती है-
भारत प्यारा जग से न्यारा अच्छा लगता है, हमको यार तिरंगा प्यारा अच्छा लगता है।
भाईचारा राजनीति हो अच्छी बात नहीं,
राजनीति में भाईचारा अच्छा लगता है।।
किसी मजबूर की बेबसी जब उन्हें आहत करती है तो यह लिखने को विवश होते हैं-
रोटी की चिंता उसे, मिल जाए दो जून।
कांप रहा था ठंड से, बेच रहा था ऊन।।
पैरोडी लिखने में भी वे पीछे नहीं है। कबीरदास के एक प्रसिद्ध दोहे पर उनकी यह पैरोडी देश भर में खूब चर्चित हुई है-
ऐसी बानी बोलिए, रोजै झगड़ा होय।
वहसे कबहूं न भिडो, जे तोहसे तगड़ा होय।।सियासी दांव पेच में गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले लोग तन्हा को कतई पसंद नहीं हैं। इसका प्रमाण उनकी यह रचना है-
मैं मन में था जिनके लिए श्रद्धा लिए हुए,
एक दिन मिले वे हाथ में अद्धा लिए हुए।
करते रहे चोरी से वे जंगल का सफाया,
मंत्री बने फोटो छपी पौधा लिए हुए।।
परिवर्तन के चक्कर में परंपरा और संस्कृतियों से हो रहे खिलवाड़ के बीच अत्याधुनिक होने की होड़ से भी वे काफी दुखी हैं। मन की पीड़ा को कुछ यूं व्यक्त करते हैं-
छप्पर की तस्वीरें देखी मैंने शहर के बंगलों में, ज्यों मछली ने भक्ति देखी पानी के उन बगुलों में। चांद कभी था सिर पर अपने आज चांद के सर पर हम,
खेतों में अब घर बनते हैं खेती होती गमलों में।।
जीवन की विपरीत परिस्थितियों में लोगों का व्यवहार कैसे बदल जाता है यह उनकी इस पंक्ति में झलकता है-
खुशनुमा इस जिंदगी में आया जब भूडोल था,
तब हमारे दोस्तों का कुछ अलग ही रोल था।
आग मेरे घर लगी जब बाल्टी ले दौड़े वे,
पर नहीं था पानी उसमें तो भरा पेट्रोल था।।
उनकी कविताएं जातिवाद भेदभाव के मिथक और उसकी संकीर्णता भरी दीवार को भी तोड़ती हैं। एक दोहे में उनका स्पष्ट कहना है-
गुरु जब देता ज्ञान तो, करता शिष्य विकास। मीरा,मीरा हो गई, पाकर गुरु रैदास।।
भाषा को लेकर किए जा रहे झगड़े पर भी तन्हा ने खूब लिखा और लोगों को भाषा के नाम पर न लड़ने की हमेशा सीख ही दी है। एक अवधी कविता में वे कहते हैं-
हमैं गवार जिन समझा तू
हम मानस मा जनमानस मा,
छोड़ो भाषा के झगरा का
आय बसो मनमानस मा।
इसी के साथ पर्यावरण, राजनीति, अपराध, भ्रष्टाचार, शोषण, अत्याचार आदि विषयों पर भी उनकी कलम खूब चली है। दहेज जैसी कुरीति पर उनकी यह कविता काफी चर्चित है-
बिन दहेज आपन बियाह जब हम कै डारेन तै, ससुर जी हमरे बोले भगवन आपकै किरिपा भै। गऊ के जइसन लड़की हमरी मिला है लड़िका हीरा,
पिताजी हमरे रोक न पाइन मुल दहेज कै पीरा।
चिढ़के हमरे ससुर से बोले केतना बढ़िया मेल है,
गऊ अगर है लड़की तोहरी लड़का हमरा बैल है।।
एक समय हनुमान चालीसा की तर्ज पर जब विभिन्न चालीसा लिखने का चलन हुआ तब ताराचंद तन्हा ने चुटीले अंदाज में पत्नी चालीसा लिखा जो देश भर में चर्चित है। यथा-
शिव जी तोहरी रीति निराली।
बगल में पत्नी सिर पै साली।।
यही रीति जौ हम अपनाई।
अपनेन घर मा घुसै न पाई।।
ताराचंद तन्हा जो लिखते हैं वही जीते भी हैं। उनका मानना है कि दूसरों को दिया गया उपदेश तभी सार्थक होता है जब देने वाला इन उपदेशों पर स्वयं अमल करे। इसके दो उदाहरण उनके जीवन से जुड़े हैं। पहला यह कि अपनी रचनाओं में दहेज जैसी कुप्रथा को उन्होंने सामाजिक कोढ़ बताया तो स्वयं भी बिना दहेज के ही शादी की। दूसरा यह कि उन्होंने जातिवाद के मिथक को तोड़ने की वकालत अपनी रचनाओं में की तो स्वयं भी अंतरजातीय विवाह भी किया। परिणाम यह हुआ कि शादी में सहमति जताने के बाद भी उनके पिता ने उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया। बहुत कुछ होते हुए भी आज वे विकट परिस्थितियों में जीवन यापन को विवश हैं।
गत दिवस एक कार्यक्रम में हुई मुलाकात में उन्होंने अपने जीवन व लेखन पर बेबाक चर्चा की। पूरे ढाई दशक बाद हुई दूसरी मुलाकात में बातचीत के दौरान उनके अंदर कोई बदलाव नहीं दिखा। बातचीत का लहजा,स्नेह, अपनापन व लगाव सब कुछ तो वैसा ही रहा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ताराचंद तन्हा तन्हाई में भी तन्हा नही होते। उनकी कविता हमेशा उनके साथ होती है।
घनश्याम भारतीय
स्वतन्त्र पत्रकार/ स्तम्भकार
अम्बेडकरनगर यूपी
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