इस तरह मैं जी रहा व्यथा को अपनी छिपाकर--अमरेश सिंह भदौरिया

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इस तरह मैं जी रहा व्यथा को अपनी छिपाकर--अमरेश सिंह भदौरिया

Post by admin » Thu Oct 18, 2018 3:25 pm

मुक्तक
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Amresh Singh



इस तरह मैं जी रहा व्यथा को अपनी छिपाकर।
लौट आया हाथ खाली याचना के द्वार जाकर।
दिनकर ने कीमत वसूली दोस्ती की अपने ढंग से,
छोड़ दिया साथ उसने हाथ को मेरे जलाकर।
अमरेश सिंह भदौरिया
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