भाग्य---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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भाग्य---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Fri Jul 13, 2018 3:20 pm

भाग्य---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

उमा अपनी हथेली पंडित जी की ओर, बढ़ाती हुई पूछती है ---’पंडित जी ! क्या आप बता सकते हैं, मेरी हथेली पर खींची गई इन लकीरों में कौन सी लकीरें सौभाग्य-रेखाएँ और कौन सी दुर्भाग्य रेखाएँ हैं ?’
पंडित जी--- ’ उमा की हथेली को उलट-पुलटकर देखते हैं और कहते हैं ---- बेटा ! तेरी शादी जल्द होने वाली है ; वह भी जैसे-तैसे के साथ नहीं, बल्कि एक बड़े इंजीनियर के साथ, जिसके घर जाकर तुम बहुत सुखी रहोगी ।’
उमा, पंडित की बात पर हँस पड़ती है और उसके कथन पर चोट करती हुई कहती है----’ कितने दिनों तक सुखी रहूँगी, यह तो आपने बताया ही नहीं ।’
उमा का प्रश्न सुनकर, पंडित जी के चेहरे का रंग उड़ गया । वे इधर-उधर ताकते हुए बोले ---’ जीवन भर ।’
पंडित जी की बात सुनकर उमा बौखला उठी और उत्तेजित होकर बोली---’पंडित जी ! अंधे भक्तों की आँखों में धूल झोंककर यह हलवा, बहुत दिनों तक नहीं खा सकेंगे आप । अब वह समय आ रहा है, जब भगवान को घर-घर जाकर अपने भक्त खोजने पड़ेंगे ।’
पंडित जी को समझते देर न लगी कि यह लड़की, लड़की नहीं, कोई घायल शेरनी है । वरना भगवान के बारे में इतना ओछा मंतव्य करने का साहस कैसे कर ली । इसलिए उन्होंने उमा से नरमी बरतते हुए कहा---’अच्छा बोलो तो बेटा ! तुझे हुआ क्या है ? तुम इतनी दुखी क्यों हो ?’
उमा, पंडित जी की तरफ़ स्नेह भरी निगाहों से देखती हुई,काँपते स्वर में कही ----’ पंडित जी ! इस दुनिया को रचने वाला, जिसे हम-आप सभी, भगवान कहते हैं, उसने अपनी आकांक्षा के कल्पित स्वर्ग के लिए , इस धरती को नरक क्यों बना दिया ? यहाँ दिन को प्रिय-जनों से विच्छेद है, तो रात की कालिमा में छिपा, विरह का संयोग है ।’
सेवा और धर्म को आधार बनाकर जीने वाली उमा , अपना वृतांत सुनाती बिफ़र पड़ी । काल का विश्रृंखल पवन, तीनों लोक का दुख-दर्द, उसके आँचल में एक रात में ऊपर वाले ने बिखरा जो दिया था , वह कहती है ---’पंडित जी ! क्या इस अनंत ज्वालामुखी के सृष्टिकर्ता को लोग इसी डर से पूजते हैं ।’
पंडित जी, उत्तर में हाँ के लिए सिर्फ़ सिर हिला देते हैं और कहते हैं---- ’वह चालाक भी है, इसलिए तो उसने आदमी के भीतर एक कोमल पदार्थ रख दिया, जिसे हम दिल कहते हैं, जो निष्ठुर दुख-दर्द को सहता रहता है । लेकिन बेटा ! ईश्वर से तेरी ऐसी नाराजगी का कारण क्या है ? क्यों तुम उसे इस प्रकार कोस रही हो ?’
पंडित जी की बात सुनकर तुषार तुल्य उमा के दिल में बिजली दौड़ गई । अपने जीवन को मृत्यु के हाथों से छीनने के लिए प्राण तक त्याग देने वाली उमा, उस कठोर सत्य को, जो उसकी आँखों में आज भी प्रचंड लपटें बनकर प्रभासित होती रहती हैं, उसकी गर्मी में झुलसने लगी । उमा दर्द से तड़प उठी और पंडित जी से बिना कुछ कहे ,जाने के लिए वेग से उठकर खड़ी हो गई ।


तभी उसकी सहेली मीरा उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँची । उमा को वहाँ देखकर, वह आश्चर्यचकित हो गई ; उसने पंडित जी से पूछा---’क्या बात है पंडित जी , यह यहाँ ?
पंडित जी बोले---- क्षमा करना, बेटी ! इसके दिल पर लगता है, किसी ने बज्रघात किया है, तभी यह इतनी दुखी है । क्या इसके दुख का कारण मैं जान सकता हूँ ?’
मीरा हाथ जोड़कर, सिर नीचा कर ली, और आँखें खोली ; बोली-- यह मेरी सहेली है । आज से एक साल पहले यह ऐसी नहीं थी । सेवा और दया की मूर्ति बनी, इसके जीवन के आज और कल में कितना अंतर है ? आप जानेंगे तो, आपका कलेजा फ़ट जायगा ।’
निर्जन गंगा का वह तट ,जो कभी इसके लिए मनोविनोद की सामग्री बनी हुई थी, जब से पति का साथ छूटा, जड़-सौन्दर्य गंगा का वह तट उसकी आँखों को, प्रतिहिंसा भरा भयानक एक राक्षस सा दीखता है । जहाँ सुबह-शाम, ये दोनों पति-पत्नी गंगा की प्रखर धारा से बंधी बैठी रहती थीं, गंगा के संयम का बज्र गंभीर नाद सुनने, अब स्मृति मात्र से नफ़रत करती है ।
पंडित जी ने मीरा की ओर विस्मय से देखते हुए पूछा---’ इसके पति कहाँ हैं ?
मीरा दीर्घ साँस छोड़ती हुई बोली---- ’मैं इसकी सहेली हूँ । पूरा बोल भी नहीं पाई थी कि पंडित जी बोल पड़े----इसके पति को क्या हुआ था ?
मीरा थोड़ी देर तक पंडित जी को देखती रही, फ़िर बोली---’ कुछ नहीं हुआ था । एक दिन शिशिर की संध्या में , जब विश्व की वेदना भरे


जगत की थकावट, रात के काले कम्बल से लिपटकर सोने जा रही थीं, तभी क्षितिज के नीरव प्रांत से ऊपरवाले ने अपने अस्तित्व का
आधिपत्य जनाने के लिए एक बज्र गिराया , जो सीधा जाकर उमा के पति के सीने में जा लगा । वे सीने के दर्द से कराहने लगे । हमलोग उनको डॉक्टर के यहाँ खटिये पर टाँगकर शहर ले जा रहे थे । रास्ते में एक बागीचा था । वहाँ से गुजरते बख्त पेड़ का एक बड़ा हिस्सा, आँधी में टूटकर उनके ऊपर जा गिरा और रही-सही कहानी वहीं खतम हो गई । तब से बदहवास उमा, मन में वेदना, मस्तक में आँधी और आँखों में पानी लिए , ज्योतिषी को ढूँढ़ती फ़िरती है । शायद उसे अपने पति के जाने का विश्वास आज भी नहीं हो रहा है । वह सोचती है ---’ मेरे हृदय के निविर अंधकार में आशा का उजाला ,अगर कोई फ़ैला सकता है, तो वह ज्योतिषी है । इसलिए यह आज दुख के झंझावात से भग्न-वक्ष लिए आपके चरणों में आ गिरी है ।
पंडित जी बात को और न लम्बाकर, बोले--- ’सब भाग्य’ , और वहाँ से उठकर चले गये ।
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