veal का विरोध अभीतक क्‍यों नहीं हुआ----अलकनंदा सिंह

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veal का विरोध अभीतक क्‍यों नहीं हुआ----अलकनंदा सिंह

Post by admin » Wed Jul 11, 2018 3:16 pm

मंगलवार, 10 जुलाई 2018
क्रूरता की हदें पार करने पर veal का विरोध अभीतक क्‍यों नहीं हुआ
veal के रूप में क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं , मैं किसी के आहार को नियंत्रित करने की बात यहां नहीं कह रही परंतु मगर भक्ष और अभक्ष का भेद तो करना ही होगा अन्‍यथा ये क्रूरता हमारी हमारे दिमाग को कहीं का नहीं छोड़ेगी।
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पिछले कई दिनों से जब लगातार नन्‍हीं बच्‍चियों के साथ बलात्‍कार की खबरें पढ़-सुन कर मुझे बहुत बेचैनी हो रही है तो उन मांओं के साथ क्‍या बीतती होगी जिनके बच्‍चों को सिर्फ 'मारने के लिए ही' जन्‍माया जाता है। जी हां, मांसाहारियों में एक नाम बड़ा प्रचलित है 'वील'। जो वील खाता है, वह शेखी बघारता है कि उसका पसंदीदा भोजन वील है।

इसी 'वील' से जुड़ी एक मार्मिक खबर आपको सुनाती हूं... कि भारत के तकरीबन सभी फाइव स्टार होटलों में 'वील' की खास डिमांड होती है और दावत का स्‍टैंडर्ड नापने के लिए इसे मेजबान और मेहमान के बीच बड़ी अहमियत दी जाती है। सभी मांसाहारी का तो पता नहीं परंतु जो बीफ की बात करते हैं या इनमें से जो उच्‍चशक्षित और संपन्‍न परिवार के हैं, वे बखूबी परिचित होंगे ‘वील’ से परंतु उनमें से कम ही होंगे जो यह जानते होंगे कि आखिर वील तैयार कैसे होता है, मैं यह दावे से कह सकती हूं कि वील तैयार करने के प्रक्रिया जानकर उनमें से तमाम मांसाहार ही छोड़ देंगे।

फाइव स्‍टार की मांसाहारी पार्टियों में अपने स्‍टैंडर्ड को दिखाने के लिए परोसा जाने वाला वील आखिर है क्या? दरअसल यह गाय के उस नन्हें बछड़े का मांस होता है, जिसे भूखे रखकर मार दिया गया हो ताकि उसका मांस हल्‍का (सफेद-पीला) रंग लिए हुए गुलाबी भी नज़र आए, इतना ज़र्द कि उजले रंग का सा लगे। जन्म के तकरीबन 14 हफ्ते बाद ऐसे बछड़े को काट दिया जाता है।

‘veal’ मांस के लिए बछड़े तैयार करने की वीभत्‍सता जानकर दिल को थाम लेंगे आप भी। यह मांस-उद्योग के लिए पशुपालन के बाकी सभी रुपों में सबसे ज्यादा वीभत्‍स है। पशु की इस नियति से तो कहीं उसकी मौत अच्छी। ‘वील’ तैयार करने के लिए जन्म के एक- दो दिन बाद ही नन्हें बछड़े को उसकी मां से अलग कर दिया जाता है। इस बछड़े को काठ के एक तंग और 22 इंच गुणे 54 इंच के अंधेरे दड़बे में जंजीर से बांधकर रखा जाता है। दड़बा इतना तंग होता है कि उसमें बछड़े का शरीर बमुश्किल समा पाता है। चल-फिर ना पाने के कारण बछड़े की मांसपेशियां एकदम शिथिल पड़ जाती हैं और मांसपेशियों की यही शिथिलता मांस को मुलायम बनाती है। बछड़ा कभी खड़ा भी नहीं होता, सिवाय उस एक वक्त के जब उसे काटने के लिए ले जाया जाता है और इस घड़ी तक बछड़े की टांगें बेकाम हो चुकी होती हैं।

अंधेरे और मिट्टी की छुअन से दूर, बिना मां के दूध और घास के, इस बछड़े के मुंह में कुछ घंटों के अंतराल पर जबरदस्ती एक बोतल उड़ेली जाती है जिसे भोजन कहा जाता है जबकि भोजन के नाम पर यह लुगदीनुमा दवाई तरल वसा (फैट) होती है। बछड़े की चमड़ी में सूइयां चुभायी जाती हैं और यह सब इसलिए किया जाता है ताकि बछड़ा जिन्दा रहे और मोटा होता जाए। उसमें जान-बूझकर लौह-तत्व (आयरन) या ऐसे ही जरुरी पोषक तत्व नहीं डाले जाते। ऐसे भोजन के कारण पशु में आयरन की कमी हो जाती है। आयरन की कमी के ही कारण बछड़े का मांस जर्द पीला या कह लें तकरीबन उजला नजर आता है जो कि वील के लिए जरूरी माना जाता है।

‘वील’ मांस के लिए बछड़े को तैयार करने वाले किसान उसे जरुरत भर का पानी भी नहीं पिलाते, प्यास से बेहाल बछड़ा भोजन के नाम पर दिए जा रहे बदबूदार तरल वसा को पीने के लिए बाध्य होता है।
इस बछड़े को भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्‍स दी जाती हैं ताकि न्यूमोनिया और डायरिया से वह बचा रहे। यह एंटीबॉयोटिक्स वील खाने वाले के शरीर में भी पहुंचता है लेकिन सिर्फ एंटीबॉयोटिक्स ही नहीं पहुंचता बहुत कुछ और भी पहुंचता है।

वील का उत्पादन करने वाली ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां बछड़े को एक खतरनाक और अवैध दवा क्लेनबुटेरॉल भी देती हैं। यह बछड़े के शरीर को बढ़ाता और उसमें आयरन की ज्यादा कमी पैदा करता है ताकि बछड़े का मांस ज्यादा उजला दिखे, मांस जितना उजला दिखेगा, उसकी कीमत उतनी ज्यादा लगेगी। दूसरे 16 हफ्ते की जगह उसे 12-13 हफ्ते में ही काटने के लायक मान लिया जाता है।

गौरतलब है कि वील के ज़रिए क्लेनबुटेरॉल मांस-उपभोक्ता के शरीर में जाने पर हृदय की धड़कन का बढ़ना, कंपकंपी आना, सांस लेने में कठिनाई होना, बुखार होना और मौत होने तक का खतरा 90% बढ़ जाता है।
हालांकि भारत के होटलों में वील गैरकानूनी, चोपी छिपे मिलता है क्‍योंकि भारत में वील का उत्पादन करना गैरकानूनी है परंतु फाइवस्‍टार होटलों ने इसकी काट निकाल ली है, वे कहते हैं हमने वील का आयात किया है।
मुझे पक्का यकीन है कि होटलों पर छापेमारी की जाए तो पता चलेगा कि इम्पोर्ट लाइसेंस और वील की खरीदी की मात्रा उससे कम निकलेगी जितना कि बेचा गया है। बहुत से होटल वील बेचते हैं और अपने मैन्यू में वील के नीचे ‘इम्पोर्टेड’ (विदेश से मंगाया) लिखते हैं। 'इम्पोर्टेड' लिखने का अर्थ ही यह है कि हमारे देश में भी चोरी-छुपे इसका व्यवसाय चल तो रहा है।

बहरहाल 'इम्पोर्टेड' के तर्क को पेश करने से उनका ''वीभत्‍सता के ज़रिए व्‍यापार करने'' का दोष तो खत्म नहीं हो जाता ना।

यह भी सत्‍य है कि कानूनी तौर पर वील का आयात DGFT (Directorate General of Foreign Trade) के अंतर्गत हमेशा प्रतिबंधित रहा है और जिन होटलों में स्वदेशी या आयातित वील परोसा जाता है उनपर एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है परंतु अभी तक ऐसी कार्यवाही कहीं नहीं हुई।

निश्‍चित रूप से वील मांस की तैयारी के लिए पाले जा रहे बछड़े की नियति और व्यवस्थित क्रूरता क्‍या हमें ये सोचने पर बाध्‍य नहीं करती कि जैसा खाओगे अन्‍न वैसा बनेगा मन। दरअसल क्रूरता को तो हम अपनी थाली में परोसकर चल रहे हैं फिर यह आशा कैसे करें कि वे ''आहें'' हमारा विनाश नहीं करेंगी, फिर चाहे विनाश बुद्धि का हो या शरीर का।
-अलकनंदा सिंह
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