लाल आंखे सूरज की,भोर हुई छिटक रहा है---धर्मेन्द्र मिश्र

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लाल आंखे सूरज की,भोर हुई छिटक रहा है---धर्मेन्द्र मिश्र

Post by admin » Sat May 26, 2018 2:17 pm

लाल आंखे सूरज की,भोर हुई छिटक रहा है उजियारा.

चाँद अंबर में कही छिप गया,देखो सूरज बाहर आया.

ब्रह्ममुहूर्त की बेला आई,उठ जाओ देखो हुआ सवेरा.

नींद से जागो बिस्तर को छोडो,सोने की नहीं ये बेला.

अज्ञानी को ज्ञान का वरदान,ज्ञानी को है ज्ञान मिलता.

सब कुछ है मिलता,ब्रह्ममुहूर्त की बेला में जो है उठता.

कर्म से बधा है जीवन सब को है,अपना कर्म करना पड़ता.

पशु पछी कीट पतंगा भी देखो,सब छोड़ चले अपना बसेरा.

ये जीवन धन अनमोल,बड़े भाग्य से मानवतन है मिलता.

इस बात को तुम जानो,अब उठ जाओ देखो हुआ सवेरा.

लाल आंखे सूरज की,भोर हुई छिटक रहा है उजियारा.

चाँद अंबर में कही छिप गया,देखो सूरज बाहर आया.

ओश की बूंदो से लिपटी किरणे,लगती मानो मणिमाला.

अतुल रूप धरि धरती,सूरज को अर्ध दे रही है जलधारा.

अभ्यागत अंबर धरती पे,मधुर मिलन की ये अमृत बेला.

दुग्ध स्नान करती ये धरती,अलंकरण करती दीप्तिप्रभा.

फूल पत्ते,मंद मंद मुस्काते,शीतल सुरम्य बहे समीरा.

वृछ लताएँ सब झूम रही,मधुर गीत सुनाती वनप्रिया.

स्वछंद विचरण करती चिड़िया,ची ची करती गौरैया.

कॉंव कॉंव करता कौवा,देखो छत की मुंडेर पे आबैठा.

लाल आंखे सूरज की,भोर हुई छिटक रहा है उजियारा.

चाँद अंबर में कही छिप गया,देखो सूरज बाहर आया.
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