माँ---डॉ० श्रीमती तारा सिंह

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माँ---डॉ० श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Thu May 17, 2018 3:26 pm

माँ---डॉ० श्रीमती तारा सिंह
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पूजा-पाठ का हँसी उड़ाने वाला आज का भोला , बचपन से जड़वादी नहीं था | वह तो पूरे निष्ठावान और ईश्वर भक्त था | दादी के साथ नित्य उठकर ,गंगा-स्नान कर मंदिर-मंदिर चक्कर लगाना उसकी नित्य की दिनचर्या थी | जब वह दिन के दश बजे, दादी के साथ घर लौटता था, तो उसके पूरे वदन पर चन्दन लपेटा रहता था , जिसे देखकर पड़ोस के बच्चे उसका मजाक उड़ाया करते थे | कहते थे, इस उम्र में तुमको इतना शृंगार क्यों करना पड़ता है ? क्या आगे चलकर तपस्वी बनना है या भगवान से कुछ मानत है , क्योंकि सुना है, धर्म , स्वार्थ के बल टिका रहता है , हवस ही मनुष्य के मन और बुद्धि को इतना संस्कार दे सकता है | उत्तर में भोला बस इतना बोलकर चुप हो जाता था , कि सच पूछो , तो गणेश , इतना करने के बाद भी, मेरे चित्त की शांति दिनों-दिन उड़ती मुझसे दूर चली जा रही है | मुझे कुछ भी समझ नहीं आता , कि मैं यह सब करना क्यों पसंद करता हूँ ? मेरे मन की कमजोरी को देवालय में पहुँचकर बल क्यों मिलता है ?
गणेश , भोला के सवालों के समर्थन में कहता था , वो इसलिए कि ईश्वर ने ही तो हम सबको बनाया है , वो अंतर्यामी है | सबके दिल का हाल जानता है , नहीं तो शबरी का प्रेम देखकर स्वयं राम उसके घर आकर , उसकी मनोकामना पूरी क्यों करते ? एक दिन तुम्हारी भी मनोकामना पूरी होगी, मगर तुम्हारी उलझन क्या है, यह तो बताओ ?
भोला रुआँसा होकर बोला--- तुम्हीं बताओ , जिसे मैंने कभी नहीं देखा , न छुआ , न ही उसके होने का एहसास किया; फिर क्यों वह मेरी साँसों की डोर संग बंधी , मेरी जिंदगी की रक्षा करती रहती है ? कौन है वह , जिसे ढूंढने मैं मंदिर -मंदिर का चक्कर काटता हूँ ?
भोला की बात सुनकर गणेश हँस पड़ा , बोला ---- अरे बेवकूफ ! यही तो ईश्वर है, जिसे हमने कभी नहीं देखा , पर महसूस हर क्षण होता है; दिल कहता है , वो है, तभी हम हैं |
भोला--- चुपचाप खड़ा, अपने आँसुओं के वेग को सारी शक्ति से दबाते हुए कहा ---तुम ठीक कहते हो , लेकिन ईश्वर आकाश से सीधा जमीं पर मुझे नहीं लाकर तो खड़ा किया होगा ; कोई तो माध्यम रहा होगा मुझे यहाँ लाने का , जिससे होकर मैं यहाँ आया ?
गणेश झटपट बोल उठा ----- है न , वो माँ , जिसने हमें जनम दिया, पाला-पोषा , बड़ा किया | मेरे लिए रात जगी, दिन खड़ी रही ; माँ , ईश्वर का ही तो रूप है |
भोला कुछ देर चुप रहा, फिर बोला ---- मगर मेरी तो माँ नहीं है, मैंने तो माँ को कभी नहीं देखा , फिर क्यों उसकी तुलना ईश्वर से कर मैं उसके लिए तड़पता रहता हूँ ? मंदिर -मंदिर जाकर ,वहाँ बैठी उस देवी में अपनी माँ को ढूंढता हूँ ?
भोला बोला--- वो इसलिए कि, तुम्हारी अश्रुपूरित आँखें , तुम्हारी माँ के प्रेम और वियोग में सदा ही एक सम्बंध बनाए रखती है |
गणेश की स्नेहमयी बातें सुनकर, भोला का मन इस कदर उल्लसित हो उठा, मानो अँधेरे में टटोलते हुए उसे वांछित वास्तु मिल गई हो |
एक दिन भोला ने देखा कि उसके पड़ोस में रह रहे , मीनू और सोनू , दोनों भाई-बहन हँस- हँस कर , उछल-उछल कर ,उसे दिखा-दिखा कर मिठाइयाँ खा रहे हैं | यह देखकर भोला का जी ऐंठकर रह जाता था ; जब वह खुद को नहीं सँभाल सका , तब उसके पास गया, बोला ------ थोड़ी मिठाइयाँ मुझे भी दो न !
इस पर सोनू ने कहा---- नहीं , तुम अपनी माँ से जाकर माँगो ; ये मिठाइयाँ मेरी माँ ने मुझे बाजार से लाकर दिया है |
सोनू की बात सुनकर भोला की आँखें भर आईं | उसने विनीत भाव से कहा--- मेरी माँ नहीं है , जैसे ही मैं दुनिया में आया, धरती पर कदम रखा ; मेरी माँ दुनिया छोड़ दी | न उसने मुझे देखा, न मैंने उसे देखा, लेकिन मेरी दादी कहती है, वह बड़ी मृदुभाषिणी थी | नित मंदिर जाया करती थी , और वहीँ बैठकर प्यारी आत्माओं को ईश्वर -प्रेम के प्याले पिलाती थी |
भोला की बातें सुनकर सभी बच्चे एक साथ हँस पड़े , बोले ---- तब मंदिर में जाता क्यों नहीं , वहीँ अमृत के प्याले के साथ मिठाइयाँ भी मिलेगा !
भोला ने एक ठंढी साँस ली, आँखों से आँसू टप-टप कर जमीन पर गिर पड़े ,रोते हुए बोला ---- मंदिर -मंदिर का चक्कर काट-काटकर खुद को आज मिट्टी में मिला दिया |
बच्चों ने ठिठोली करते हुए कहा---- मुबारक हो तुमको, तुम कैसे इंसान हो , ईश्वर की चाह में खुद को मिटाकर अपने को हेय समझते हो ?
गणेश से अब सब्र न हो सका , उसने कहा--- मैं शर्मिन्दा हूँ , अपने कथन पर, मुझे माफ़ कर दो | ऐसे भी, मैं ईश्वर के प्रेम की गहराई से अपरिचित हूँ |
इस अंतिम विचार से गणेश के ह्रदय में , ईश्वर के प्रति इतना नफ़रत भर गया, कि वह जब भी देखता , हाथों में पीतल का कमंडल लिए ,शिव-शिव , हर-हर , गंगे-गंगे , नारायण -नारायण कहते कुछ लोग जा रहे हैं , वह उनके समीप जाता, पूछता--- क्या चाचा ! क्या ता-उम्र निकल गई , राम-राम रटते , कुछ हासिल हुआ ; देखना एक दिन मेरी तरह तुम भी थक-हारकर घर बैठ जावोगे और तब तुम भी मेरे जैसा मंदिर से कतराने लगोगे |
गंगा किनारे जाता , जिसके नाम उच्चारण से जन्मों के पाप धुल जाते हैं ,
जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना हर हिंदू सबसे बड़ा पुण्य समझता है ; वहां पहुँचकर गंगा-स्नान करने वालों से भी पूछता --- आप तो अब बूढ़े हो चले हो , चाचा ! नित्य यहाँ आते हो ; क्या गर्मी , क्या सर्दी , कभी यहाँ की परिक्रमा करना नहीं छोड़ते , तो क्या गंगा से तुमको यह आश्वासन प्राप्त हो गया , कि जीवन भर चाहे जहाँ भी रहो , मौत के समय तुम ‘ मेरे किनारे रहोगे, और मेरी गोद में मरोगे “ ? लोग गणेश को पागल समझकर , राश्ता काटकर निकल जाते , तब गणेश अपनी भौं का पानी पौंछकर , ठठाकर हँस पड़ता |
आज उक्त घटना को बरसों बीत गए , गणेश बचपन के मर्मघाटी वेदनाओं को भूलने लगा; भूले क्यों नहीं ? मदिरा भरा यौवन कब किसी को स्थिर रहने दिया, जो गणेश रह पाता, उसके ह्रदय-आकाश पर का काला बादल, जो बचपन से , उसके मन-पटल को अंधेरा किये रखता था , धीरे-धीरे छटने लगा, तब उसमें उसने देखा---- माँ , एक अक्षर व दो मात्राओं का मेल है, जिसका अर्थ--- म से मन , व ,अ की मात्रा से आवाज अतएव मन की आवाज है माँ ; इसलिए माँ तो मेरे दिल में है , उसे आँख बंद कर देखने की जरूरत है | वह पास न होकर भी, हर पल मेरे साथ है | यह एक अनूठा रिश्ता है | इस रिश्ते में स्वार्थ नहीं होता, केवल और केवल त्याग रहता है | यही कारण है कि माँ मुझे जनम देते वख्त जब उसे अपनी जान त्यागने की शर्त विधाता ने लगाईं , वह क्षण भर के लिए भी नहीं हिचकिचाई, अन्यथा वह कह सकती थी ,’ डॉ० बच्चे को मरने दो , मुझे बचा लो” |आज उस स्नेह, त्याग और सहनशीलता की देवी को ऋण,आभार, कृतज्ञता जैसे शब्दों से नवाजकर मैं छोटा नहीं करना चाहता | जिसका अंश हूँ , उसका ऋण कैसे चुकाऊँ ? उसके एहसान की अदायगी का मन, जिंदगी को और उलझा देता है | पृथ्वी पर मुझे लाने के लिए खुद असीम वेदना में तड़प-तड़पकर दुनिया को अलविदा कह दी, पर पल भर के लिए भी उसने मुझे अभिशाप नहीं किया | उस बेहोशी के पल जो उसने मुझे अमृत के दो बूंदें पिलाई , जिनसे मेरी कोमलता आज भी पोषित है , उसे अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट करूँ ? उसके लिए बस इतना ही कहूँगा , माँ , ईश्वर ने तुम्हें सृजन शक्ति देकर एक विलक्षण व्यवस्था का भागीदार बनाया | एक अघोषित , अव्यक्त व्यवस्था , जिसका पालन दुनिया की हर माँ करती है | खुद्नसीब है वो जिसे माँ की खिदमत करने का मौक़ा मिलता है | मैं भी कम खुशकिस्मत नहीं हूँ , जो तुम जैसी माँ की कोख से मैंने जनम लिया | माँ , तुम तो हर क्षण, हर पल जिंदगी की साँस बनकर मेरे साथ हो | तुम्हारे व्रत, उपवास , आशीर्वाद के दुआओं का ही असर है, माँ , कि मैं आज एक इंसान के शरीर में इस धरती पर जनम लिया |
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