नैतिक मूल्यों को बचाएं और आधुनिकता की ओर उन्मुख हों....गिरीश

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नैतिक मूल्यों को बचाएं और आधुनिकता की ओर उन्मुख हों....गिरीश

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 5:41 pm

नैतिक मूल्यों को बचाएं और आधुनिकता की ओर उन्मुख हों....गिरीश पंकज

स्त्री-विमर्श : एक दृष्टि यह भी
नैतिक मूल्यों को बचाएं और आधुनिकता की ओर उन्मुख हों
गिरीश पंकज
मेरा मानना है कि लेखन लेखन होता है. उसे स्त्री-पुरुष के खांचे में बांटना उचित नहीं. फिर भी जब बुनियादी विभाजन प्रकृति ने ही कर दिया है, तब कुछ अलहदा विमर्श हो जाये, तो इसे अन्यथा भी नहीं लिया जाना चाहिए. हमारे प्राचीन साहित्य में, वेद-पुरानों में स्त्री के सम्मान को रेखांकित करने वाली अनेक कथाएं दर्ज हैं. कहीं भी स्त्री का अपमान नहीं है. 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' कहकर हमने स्त्री को देवी बनाया दिया. दुर्गा, सरस्वती, काली, सीता आदि देवियाँ पूजनीय है. लेकिन धीरे-धीरे स्त्री के प्रति मोह भंग-सा भी नज़र आता है. स्त्री कब हमारे लिये हाशिये कि चीज़ हो गई, पता नहीं चला. और आज तो जो मानसिकता लोकव्यापी है, उसे हम झेल ही रहे हैं, कि पढ़ा-लिखा समाज तक यह देखने की कोशिश करता है कि गर्भ में पालने वाला भ्रूण स्त्री है या परुष. इस मानसिकता के कारण ही स्त्री के प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार होने लगा. स्त्री होना ही मानो पाप हो गया. इस मानसिकता के खिलाफ बगावत होनी ही थी. इसीलिये स्त्री-विमर्श कि शुरुआत में स्त्री कि अस्मिता और उसकी गरिमा को रेखांकित करने वाली रचनाएँ शुरू हुई ताकि स्त्री के खिलाफ जो मानसिकता बन रही है, उसमें बदलाव लाया जा सके. स्त्री-लेखन में सक्रिय लोगों ने इस दिशा में सार्थक काम किया.उनके लेखन ने वातावरण बनाने का काम किया, और यही कारण है कि नयी पीढ़ी की युवा-स्त्री अब अपने व्यक्तित्व को लेकर ज्यादा सजग है.
परिवर्तन की इस मुहिम का लेकिन जो नुकसान हुआ है, उस पर भी ध्यान देने की ज़रुरत है. स्त्री मुक्ति के नाम पर इधर का स्त्री लेखन देह से भी मुक्ति चाहने लगा है और अपनी रचनाओं के माध्यम से वह यही प्रचारित कर रहा है कि स्त्री अपनी देह कि मालकिन है. वह उसका जैसा चाहे इस्तेमाल करे. इस मानसिकता के फैलाव ने न केवल नई लेखिकाओं को गुमराह किया, वरन नई पथिकों को भी दिशा हीन बनाने कि कोशिश की. जब साहित्य ही ऐसा रचा जाएगा,जब दिशाहीन करने के लिये प्रेरित करेगा, तो स्वाभाविक है कि नव धारणाएं विकसित होंगी. साहित्य, सिनेमा, नाटक आदि का व्यापक असर पड़ता है. कोमल मन पर विपरीत असर भी पड़ता है. जब साहित्य के माध्यम से कोई कथा स्त्री के पतन को भी उसका मुक्ति बतलाने लगेगा तो बहुत संभव है कि बहुत-सी नई लडकियां उस कहानी को ही अपना आदर्श मान बैठे. और हो भी यही रहा है. आज नेक लेखिकाएं स्त्री की आजादी के नाम पर जो कहानियाँ रच रही हैं, उन्हें पढ़ कर घिन भी आने लगती है. अश्लील कहानियों को साहित्य कहा जाये, तो दुःख होता है. तथाकथित रूप से साहित्य में प्रतिष्ठित कुछ पत्रिकाओं ने कहानी के नाम पर अनेक लेखिकाओं से अश्लील कहानियां लिखवाई. और लेखिकाओं ने खुद को 'बोल्ड' साबित करने के लिये अश्लील लेखन भी किया. और वे गर्व से कहती भी है कि वे बोल्ड लेखिका है. कपडे उतरना बहादुरी नहीं है. कपडे पहने रहना बहादुरी है. पुरुष समाज तो चाहता ही है कि अश्लीलता बढ़े. हिन्दी के लम्पट किस्म के कामुक आलोचकों-संपादकों के कारण भी स्त्री लेखन दिशाहीन होता चला गया. अश्लीलता को बोल्डनेस बता कर कुछ लेखिकाओं का सिर चढ़ाया जाता रहा. आज हिंदी जगत में कुछ नाक तथाकथित रूप से चर्चित है, लेकिन उनका लेखन सबके सामने है. उनका लेखन और उनका सामाजिक चरित्र भी. आदमी जैसा लिखेगा, फिर वैसा जीने भी लगेगा. एक लेखिका सिगरेट पी कर शान से खुद को आधुनिक बताती है, तो यह मूर्खत भी कही जायेगी. सिगरेट पीना वैसे भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है. पुरुष पीये चाहे स्त्री. फिर ये मानसिकता भी रही कि जो काम पुरुष कर सकता है, वो काम स्त्री क्यों नहीं कर सकती? इस चक्कर में भारी विनाश हुआ है. कल को यह भी सुना-देखा जा सकता है कि नारी मुक्ति की पक्षधर कोई और खड़े हो कर पेशाब करने को क्रांतिकारी कदम बता दे.
स्त्री की दैहिक संरचना को भूल कर स्त्री विमर्श करना खतरनाक है. यह बात समझ लेनी चाहिए कि जब प्रकृति ने ही स्त्री-पुरुष में भेद करके भेजा है, तो कोई कारण होगा. गाय गाय है. भैस भैस है. और रहेगी. सबकी दैहिक तासीर अलग-अलग है. उसमें ही संतुष्ट हो कर विकास का मार्ग खोजना उचित होगा, लेकिन हमारा नया स्त्री लेखन इस मामले में अभी बहुत पीछे है. यही कारण है कि समाज में मूल्यों को स्थापित करने के बजाय मूल्य तिरोहित हो रहे हैं. बस थोड़ा-बहुत संतोष इस बात से है कि अभी भी नेक लेखिकाएं ऐसी है, जो नए ज़माने में लेखन करते हुए भी स्त्री की अस्मिता और उसके संघर्षों को सकारात्मक तरीके से लिख रही हैं. उनके लेखन में अश्लीलता नज़र नही आती, वरन स्त्री की नैतिक क्रांति दीखती है. यही सही स्त्री विमर्श है, जहाँ स्त्री अपनी अस्मिता भी बचाए और अपने अधिकारों को भी प्राप्त करे. स्त्री कहीं भी कमजोर न पड़े, लेकिन वह अपनी आत्मा, अपनी दैहिक नैतिकता को भी क्यों नीलाम कर दे? कुछ पाने के लिये क्या ''सब कुछ'' गवां देना चाहिए. पुरुष पाने की चाहत में दम हिलाने लगता है. चमचागीरी करने लगता है. सत्ता के आगे-पीछे मंडराता है. ऐसे लोगों की भी आलोचना होती है. अगर कोई स्त्री भी यश, धन आदि प्राप्त करने के लिये अपनी देह नीलाम कर दे, अपने शाश्वत मूल्य तिरोहित कर दे, तो क्या यह स्वीकार्य हो सकता है? हालाँकि आजकल ऐसी औरतें बढ़ रही है. इन लोगों ने स्त्री लेखन को प्रदूषित किया है. यह चिंता की बात है.
मुझे लगता है कि अब जो नया स्त्री लेखन आये वो परम्परा और जीवन के नैतिक मूल्यों को बचाए और आधुनिकता की ओर उन्मुख हो. आधुनिक होने का मतलब निर्लज्ज होना नहीं होता. आधुनिक होने का मतलब पुरानी कुप्रथाओं को त्यागना है. जैसे हिंसा परम्परा रही है जो गलत है. अहिंसक होना आधुनिकता है. बलि प्रथा, पर्दाप्रथा, बल विवाह जैसी कुप्रथाएं बंद हो. देवदासी जैसी प्रथाएं बंद हों. कल अगर कहीं गलत होता था, तो उसे हम आज भी दुहराते चलें, यह बुद्धिमानी नहीं है. औरत और नैतिकता एक ही सिक्के के दो पहलू रहे हैं. और ये बने रहने चाहिए. इसके बावजूद और आगे बढ़ सकती है. वह अंतरिक्ष तक जा पहुची है. वह सामाजिक जीवन में अनेक पदों को सुशोभित कर रही है. यह उसकी अपनी प्रतिभा के बूते हुआ है. यही समझने की ज़रुरत है इधर के कुछ लड़कियां आधुनिकता के नाम पर जिस तरह का फैशन कर रही है, उसे भी स्त्री की मुक्ति के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. एक पचास साल कि लेखिका जींस और टाप पहन कर घूमती नज़र आई. उसे देख कर लोग हंस रहे थे. क्योंकि वह ''नीली घोडी लाल लगाम'' वाली कहावत को चरितार्थ कर रही थी. आधुनिकता के नाम पर हम अपने पारम्परिक पहरावे को भी छोड़ने लगे, यह तो आती है. उम्र के हिसाब से भी पोशाके फबती है, मगर उस लेखिका के दिमाग में आधुनिकता का ऐसा भूत सवार है कि वह ''माँ-बहन' की गालिया भी लिखने से परहेज नहीं करती.पुरुष गाली दे सकता है, तो औरत क्यों न दे? अजीब लगता है यह तर्क . मैं पुरुष हो कर अश्लील गलियाँ देने और लिखने की हिम्मत नहीं कर पता. मुझे लगता है, जो गलत है, वो गलत है. कुछ लोग कहते है अगर कोई रिक्शा वाला गाली देता है तो हम लेखन में गाली क्यों न उतारे. मगर अनेक रिक्शावाले ऐसे भी होंगे, जो गलियाँ न देते हों..? क्या ज़रूरी है कि कोई मजदूर है तो वह गलियाँ ही देता होगा? क्या हम मजदूर या गरीब स्त्री में नैतिक मूल्य तलाश ही नहीं कर सकते? अब तो फिल्मों के माध्यम से भी हीरोइनों को गलियाँ देते दिखाया जाता है. इसका असर नई लड़कियों पर भी पडेगा और वे भी गलियाँ बकने में संकोच नहीं करेंगी. करीना कपूर या विद्या बालन गाली दे सकती है, तो मैं क्यों नहीं? यह मानसिकता पतन कि ओर ले जायेगी. हमारा स्त्री लेखन इस सोच के विरुद्ध कालम चलाये. तो समाज के नैतिक मूल्य बचे रहेंगे, वरना जो रंग-ढंग दीख रहे है, उससे तो आने वाले अराजक समय की केवल कल्पना ही की जा सकती है.
ये तमाम बातें हैं, जिन पर स्त्री विमर्श करते हुए या स्त्री लेखन को विचार करना चाहिए. लेखक का काम है जो कुछ भी है उससे बेहतर वातावरण बनाए. साहित्य का मतलब ही है सबके हित को ले कर चले. सबका हित बेहतर जीवन मूल्यों में है. उत्थान में है, पतन में नहीं. स्त्री लेखन अगर मूल्यों को स्थापित करे, स्त्री को सही दिशा में जागृत कर सके, तो वह स्वागतेय है.वह समलैंगिगता को, व्यभिचार को, या किसी भी किस्म की अराजकता को महिमामंडित न करे, और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की पुरजोर कोशिश करे.तभी स्त्री विमर्श को और अधिक ऊंचाई प्राप्त होगी.
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