बेडियों में जकडी हुई स्वतंत्रता......डा० कामिनी कामायनी

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बेडियों में जकडी हुई स्वतंत्रता......डा० कामिनी कामायनी

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 5:38 pm

अंगारों पर चलकर भी झूलसे हुए पैरों की वगैर चिन्ता किए निरंतर चलते रहना ही जीन्दगी की कहानी है तो यह उसी स्त्रीवर्ग की कहानी है जिसे वक्त ने पंख तो दे दिया है मगर वे उनकी हैसियत के हिसाब से धातु के हो गये । सम्पन्न परिवेश में सोने चॉदी के . . विपन्न में लौह अयस्क के .. ।
इतने भारी परों के साथ खुले आसमान में उन्मुक्त उडान भरना तो दूर नीचे धरती पर निर्भय विचरन करना भी दुष्कर है ।मगर कहने के लिए तो कहा ही जाता है .. नई शिक्षा ने .. .नई हवा ने तुझे दे दिए है ऊची उडान भरने के लिए अवसर . . अब पिंजरा भी खुला है. निकल अब उस शोषण भरी यातनापूर्ण जिन्दगी से.।तो है न यह एक भद्दा मजाक़ . ।
नारी जीन्दगी हमेशा से एक शोध का विषय बन कर रह गई है. . आज भी ''अबला जीवन की कथा लोमहर्षक ही है. . ।नारी मुक्ति के लिए वषोर्ं से समाज सुधारक विभिन्न क्षेत्र में प्रयास करते रहे हैं .. उन्हें लगता था कि शिक्षा का अधिकार पाकर वे अपने अधिकार और क़र्त्तव्य को समझ लेंगी और आने वाला सूरज अपनी सुनहरी किरणों से उनकी जिन्दगी को स्वर्णमयी बना देगा. . .कुछ क्षेत्रों में यह सही साबित हुआ भी लेकिन आशातीत सफलता नहीं मिली ।इस असफलता के पीछे के कारणों को जानने से पहले हमें इतिहास के अथाह सागर में डूबकी लगानी ही होगी कि आखिर भारतीय पुरूष समाज ने औरतों के लिए कौन सा आदर्श स्थापित कर रखा था जिससे अद्यतन मुक्त होना असंभव दिख रहा है ।


अपने देश के महान ऐतिहासिक दस्तावेज में दफ्न है इनके ऑसुओं और घुटन की अनंत कहानियॉ और यह पीढी दर पीढी हजारों साल से एक दुखांत नाटक की भॉति जीन्दगी के रंगमंच पर बार बार अभिमंचित होती रहती है । वैदिक साहित्य से ही एक पत्नी का नियम और आदर्श प्रचलित होने के वावजूद बहु विवाह के प्रमाण मिलने शुरू हो गए थे ।ऋग्वेद से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि इन्द्र की कई रानियॉ थीं ।ऐतरेय ब्राह्ण में उल्लिखित है कि ''एक पुरूष की कई स्त्रियॉ है किन्तु एक पत्नी एक साथ कई पति नहीं प्राप्त कर सकतीं ।'. . . ..देखें धर्मशास्त्र का इतिहास भाग १ .. पृष्ट ३१२ डा० पी०वी० काणे.
हालाकि भिन्न भिन्न कालों में कुछ सहृदय सूत्रकारों ने . स्मृतिकारों ने स्त्रीजाति के लिए कुछ आदर्श की बातें कहीं जिससे उनकी स्थिति में सुधार हो ।भारतीय समाज में ऐसी उदारवादी दृष्टिकोण की वजह से ही समाज में चंद महान स्त्रियों की गाथा प्रचलित है । मगर अधिकांश बातों मे पुरूष वर्ग ने अपनी मनमानी चलाई । महिलाओं को अपने अधीन रखने के लिए उसने हर तरह के छल छदम दंड भेद का सहारा लिया ।उन्हें वे अपनी संपत्ति समझते थे ।उसे बेचने खरीदने का अधिकार उन्हें प्राप्त था। कुछ महान आत्माओं ने नारी को मोक्ष प्राप्त करने से भटकाने वाला और नरक का द्वार तक कह दिया ।अपने विरूद्व हो रहे किसी भी प्रकार के शोषण के विरूद्व आवाज उठाने वाली को विभिन्न प्रकार के विभत्स अलंकारों से विभूषित कऱ . डायन . .चूडैल साबित कर आत्महत्या तक करने पर मजबूर कर दिया जाता था ।उसे स्वतंत्र रहने की अनुमति नहीं थी ।बाल्यावस्था में पिता के अधीन युवावस्था में पति के और वृद्वावस्था में पुत्र पौत्र के संरक्षण में ही उसकी सदगति थी।वह अकेली सो भी नहीं सकती थी ।इस योग्य उसे नहीं माना जाता था कि वह राजनीतिक . आर्थिक . सामरिक जैसे महत्त्वपूर्ण मसलों पर अपना विचार रख सके ।मात्र एक भोग्या .परिचारिका .विश्वासी और सहृदय दासी ।
वह भरोसे लायक नहीं मानी थी और किसी भी प्रकार के साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत नहीं की जा सकती थी ।उसके लिए सिर्फ कर्त्तव्य की कर्त्तव्य निर्धारित किए गए थे ।
पाणिनि ने पत्नी शब्द की व्युत्पत्ति करके बताया हैकि उसी को पत्नी कहा जाता है जो यज्ञ तथा यज्ञ करने के फल की भागी होती है ।स्पष्ट है कि जो स्त्रियॉ अपने पति के साथ यज्ञों में भाग नहीं लेती थी उन्हें जाया या भार्या कहा जाता था पत्नी नहीं ।पत्नी पति की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं कर सकती थी ।कात्यायन ने एक कदम आगे बढ कर घोषित कर दिया था कि विवाह के पूर्व पिता की आज्ञा के बिना विवाहोपरांत पति या पुत्र की आज्ञा के बिना स्त्री जो कुछ आध्यात्मिक लाभ के लिए करती है वह सब निष्फल जाती है ।
याज्ञवल्क्य ने पत्नी के कर्त्तव्य निर्धारित किए थे ''घर के बरतन .कुरसी. आदि को निर्धारित स्थान पर रखना .दक्ष होना. हॅसमुख रहना . मितव्ययी होना पति के मन के योग्य कार्य करना श्वसुर एवं सास के पॉव दबाना .सुन्दर ढंग से चलना फिरना एवं अपने इंदि्रयों को वश में रखना।
स्मृतिकार शंख ने निर्देश दिया ''बिना पति या बडों की आज्ञा के घर के बाहर न जाना .. बिना दुपट्टा .. . उत्तरिय़ . . ओढे बाहर न जाना .. तेज न चलना .. व्यापारी .संन्यासी या वैद्य को छोडकर किसी अन्य अपरिचित पुरूष से बात न करना ..नाभी न दिखाना ..साडी को एडी तक पहनना कुचन दिखाना हाथ से या वस्त्र से मुख ढॅककर ही जोर से हॅसना .. अपने पति या संबंधी से घृणा न करना आदि ।“

पुराणों ने भी स्त्री धर्म के बारे में विस्तार से लिखा है .. ।स्कंदपुराण ने पतिव्रता स्त्री के अपने पति का नाम लेने से मना किया है ।पति उसे अपने उच्च स्वर से अपराधी ही सिद्व क्यों न कर रहा हो पीटी जाने पर भी उसे जोर से रोना भी नहीं चाहिए . उसे हॅसमुख ही रहना चाहिए ।
पद्यपुराण के सृष्टिखंड के अनुसार वह स्त्री पतिव्रता है जो कार्य में दासी की भॉति संभोग में अपसरा जैसी . भोजन देने में मॉं की भॉति तथा विपत्ति में अच्छी राय देने वाली हो ।“
उनकी दर्दनाक एवं दयनीय अवस्था का विरोध करने मे समय समय पर कुछ प्रमुख शास्त्रकारों ने भी अपनी लेखनी उठाने का जोखिम लिया था।छठी सदी में वराहमिहिर ने वृहतसंहिता में स्त्रियों के पक्ष में जबरदस्त दलीलें पेश करके उनके अधिकारों का समर्थन किया ।उनके अनुसार स्त्रियों पर धर्म एवं अर्थ आश्रित है ।उन्हीं से पुरूष वर्ग इंदि्रय सुख प्राप्त करते हैं उस गृहलक्ष्मीं को सदैव सम्मान मिलना चाहिए ।वह निंदकों से प्रतिप्रश्न करता है कि ''सच बताओ स्त्रियों में कौन से दोष हें जो तुमलोगों में नहीं पाए जाते . . पुरूषलोग धृष्टता से स्त्रियों की भर्त्सना करते हें वास्तव में वे पुरूषों की अपेक्षा अधिक गुणों से संपन्न होती हैं ।'

कालिदास और भवभूति जेसे मूर्धन्य साहित्यकारों को छोडकर वराहमिहिर के अतिरिक्त अन्य किसी स्मृतिकार वा लेखक ने स्त्री के पक्ष में ऐसे उदार मनोभावनाए प्रकट नहीं किए ।
स्त्री के लिए शुभ और सुन्दर विचारों को प्रायः सभी काल के लेखकों ने गर्त्त में डालकर उसे ''शूद्र गॅवार ढोल पशु नारि' कहकर उन्हें ताडन के अधिकारी बनाकर अपना स्वार्थ साधता रहा है
समय बदलता रहा है मगर नहीं बदली है तो वह है नारियों की स्थिति ।पहले भी वह पुरूषों की संपत्ति थी आज भी वह कुछ हद तक उनकी संपत्ति है ।
आज के सभ्य समाज में दुनिया भर के देशों ने नारी के मामले में अपने अपने गिरेबान में झॉकना शुरू कर दिया है ।भारत में भी लोककल्याणकारी सरकार द्वारा स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत के संविधान में स्त्री और पुरूष को समान अधिकार दिया गया है ।महिला आयोग का गठन किया गया है . अनु० ४९८ के माध्यम से नव विवाहितों को काफी मजबूत बनाया गया है .. .बेटियों को भी पैत्रिक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार दिया गया है. दहेज विरोधी कानून बनाए गए हैं. ।तलाक की प्रकि्रया को लचीला बनाया गया है. . यौन उत्पीडन के विरूद्व कडे कानून बनाए गए हैं ।

आज असंख्य महिलायें शिक्षा के बल पर समाज में उच्च मकाम हासिल कर चुकी है. . देश में महिला राष्ट्रपति स्पीकर लोकसभा जैसे पदों पर पहुँच चुकी हैं ।फिर भी उनकी दशाओं में आशातीत सफलता नहीं मिल पाई.।इतिहास पीछा नहीं छोड रहा है।नारी मात्र एक वस्तु है एक संपत्तिहै. . घर की लाज मानमर्यादा . . और बाहर की दुनिया के लिए भोग विलास की सामाग्री .. .धर्म के नाम पर भी इनका सदा सर्वदा से शोषण होता रहा है ।यही वजह है कि आज के इस एकीसवीं सदी में भी कई समाज में ऑनर किलींग जैसी घटनाए धडल्ले से सामने आती है. . दहेज के लिए बहुओं को ससुराल में जला दिया जाता है. .कार्यस्थल पर उसका यौन शोषण इस कदर होता है कि वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती हैं । घर से लापता या भागी हुई महिलाओं के मामले में किसी प्रांत का पुलिस अधिकारी उसके पिता को उसे गोली मारने या खुद डूब मरने की सलाह देता है तो कहीं का उच्च न्यालय स्त्री को सीता जैसी बनने की सलाह देता है । द्यनारी तुम केवल श्रद्वा हो. और कुछ नहीं. . . मगर यह तभी तक ..है जब तक तुम झूठी मान मर्यादा और शारीरिक मान्यताओं में उलझी गुलामी की जंजीरों को तोड पाने में अक्षम हो . . ।.फिर देर क्यों उठो जागो और तोड डालो इस सदियों पुरानी लोहे की बेडियों को ।
॥ डा० कामिनी कामायनी ॥
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