स्त्री विमर्श : एक विवेचन....... KAUSHAL PANDAY

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स्त्री विमर्श : एक विवेचन....... KAUSHAL PANDAY

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 5:38 pm

वैश्वीकरण के इस दौर मैं जब हम स्त्रियों को सफलता की बुलंदियों को छुते देखते है तो स्त्रियों के इस जज्बे को देख कर आश्चर्य होता है | आज स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही है और हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज की है | किन्तु स्त्रियों की स्थिति हमेशा से ऐसी नही रही इसके लिए उन्होंने लबे समय से संघर्ष किया है और आज भी कर रही है |
संस्कृत में स्त्री की महत्ता विषयक अनेक सूक्तियां और ऋचाये मिलती है | वैदिक ऋचाओं के दृष्टा ऋषियों में गार्गी , मैत्रेयी आदि महिला का भी नाम रहा है | विश्वबंधुत्व की बात करने वाला समाज स्त्री को भी सम्मान की दृष्टी से देखता रहा है -

यत्र नर्येस्तु पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता:

यहाँ स्त्री मातृशक्ति रही है जो आवश्यकता पड़ने पर काली का रूप धारण कर सकती है |
तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है | : इस बात के अनेक उदाहरण है कि भारत में लम्बे समय से स्त्री के द्वितीय स्तर का प्राणी माना जाता रहा है | इन्द्र के पाप का दंड सदैव 'अहिल्या' को मिलता रहा है |

विश्व समाज और भारत में नारी सदियों से प्रताड़ित होती रही है | यदि सीता निर्वासन को माने तो देवी सीता तथा पांच पुरुषों में विभक्त कर दी गई द्रोपदी सदृश्य राज परिवारों कि नारियों को जब सतत प्रताड़ना और उत्पीडन का शिकार होना पड़ा तो सामान्य वर्ग को नारियों की स्थिति को कल्पना सहज ही की जा सकती है | भारतीय समाज में जहाँ स्त्रियों को देवी की संज्ञा दी जाती है | वहीँ पितृसत्तात्मक समाज में उसका शोषण भी किया जाता रहा है |

रामचरितमानस जैसे महाकाव्य में गोस्वामी तुलसीदास ने स्त्री विषयक जो दोहे प्रस्तुत किये है | उससे तत्कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति का पता चलता है :----

ढ़ोल गंवार शुद्र पशु नारी |
सकल ताड़ना के अधिकारी ||

भारत में तो स्त्रियों की स्थिति और भी दयनीय रही है | वह सदियों से परम्पराओं के नाम पर बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा, आदि अनेकों रूपों में ठगी जाती रही है |
स्त्रीवादी साहित्य लिखने वाली पाश्चत्य लेखिका Dworkin Andrea ने लिखा है________
women is not born ; she is made.

मतलब स्त्री पैदा नही होती बनाई जाती है और ये बात बिल्कुल सच है |

बच्चा जन्म लेता है , परन्तु जन्म लेते ही वह अमीर- गरीब , उच्च -निम्न , पुरुष - स्त्री हो जाता है | ये कैसी व्यवस्था है ? जहाँ पुरुष - स्त्री से तात्पर्य प्रकृति- प्रदत्त लिंग भेद नही , वरन वह स्थिति है जिसमें एक शासक होता है - दूसरा शासित , एक शोषक होता है - दुसरा शोषित , एक सर्वाधिकार संपन्न - दूसरा अनाधिकार विश्व समाज में नारी ने इस स्थिति को झेला है |

स्त्री के विषय में समाज की सोंच में परिवर्तन उन्नीसवीं सदी में आना प्रारंभ हुआ | सबसे पहले पश्चिम में स्त्रियों के अधिकारों के लिए जोरदार आन्दोलन चला | भारत में भी स्त्री-स्वातंत्र्य का आन्दोलन पुरुषों द्वारा ही चलाया गया | राजाराम मोहन राय आदि ने बाल विवाह , सती प्रथा, आदि का विरोध किया |

बीसवीं सदी की नारी ने अपने पंख फैलाये | उसने इस अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई | इस अभियान में उसे कुछ पुरुषों का सहयोग भी मिला | परन्तु जैसे पुरुष प्रसव पीड़ा का अनुभव नही कर सकता , उसी प्रकार स्त्री हुए बगैर स्त्री के दुखों को पूरी तरह से नही समझा जा सकता |

स्त्री द्वारा उठाये गये आवाज़ का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा अत: आधुनिक साहित्य में कवियों तथा लेखकों द्वारा उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति हुई है | समाज में स्त्री पर अत्याचार के कई रूप रहे है | परन्तु उसका सर्वाधिक शोषण योन के क्षेत्र में हुआ है | कवि कहता है ----

योनी नही रे नारी वह भी मानवी प्रतिष्ठित |
उसे पूर्ण स्वतंत्र करो वह रहे ना नर पर अवसित ||


नारी जीवन विवशता का ही दूसरा नाम हो गया है | मुस्लिम समाज में कभी भी तलाक , तलाक , तलाक कहकर पुरुष विवाह सम्बन्ध का विच्छेद मान लेता है | गर्भ-धारण, जो विश्व में सिर्फ नारी का अधिकार है पुरुष का नही | वह वरदान जो सृष्टि सञ्चालन का एक मात्र आधार है , वही नारी के लिए अभिशाप बन जाता है |

पुरुष यदि पर स्त्री का गमन करता है तो ये उसका शौक है , अधिकार है स्त्री यदि पर पुरुष गमन करे तो कुलटा है पुरुष कोठे पर जाये तो यह उसकी सम्पन्नता का सूचक है परन्तु कोठे पर जिसके पास जाता है वह नारकीय है नफ़रत की पात्र है | आज स्त्री भगवान से बस यही कहती है .................

अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो …….

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने स्त्री के युगों - युगों की व्यथा को इन शब्दों में समेट दिया है ----

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी |
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ||

वर्तमान समय में शहरी समाज के पुरुष वर्ग की मानसिकता में थोडा परिवर्तन हुआ है | जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज स्त्रियाँ भी समाज के विकास में अपना योगदान दे रही है और अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हुई है | किन्तु भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी कोई खास परिवर्तन नही हुआ है | इसका एक प्रमुख कारण उनकी निरक्षरता है किन्तु जिस प्रकार शिक्षा का प्रचार प्रसार हो रहा है उसे देख कर स्त्रियों के सुनहरे भविष्य की कल्पना की जा सकती है |



|| कौशल पाण्डेय ||
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