नारी बनाम नारी उत्पीडन.....डा० रमा शंकर शुक्ल

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नारी बनाम नारी उत्पीडन.....डा० रमा शंकर शुक्ल

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 4:27 pm

नेट पत्रिका स्वर्ग विभा फोरम में डा० प्रीत अरोड़ा का लेख "शोषण से लेकर सशक्तिकरण तक" पढ़ा. प्रीत समकालीन युवा लेखिकाओं में शुमार हैं. उन्होंने जो कहा है, काफी हद तक सच कहा है. मेरा उद्देश्य किसी का खंडन नहीं, बल्कि अपने कुछ ख़ास अनुभों के आधार पर नारी आन्दोलन और नारी मुक्ति पर अपने विचार रखना है.
जहाँ तक मेरा मानना है कि स्वतंत्रता पर सर्वाधिक ग्राह्य विचार रूसो का स्वीकृत है. उसने प्रायः सभी क्षेत्रों पर अपनी बेबाक टिपण्णी ही नहीं लिखी बल्कि मानवीय गरिमा को सैद्धांतिक और तार्किक धरातल भी प्रदान किया.
वर्ष १७५० में आवारागर्दी के दौरान उसने डिजान एकेडमी की निबंध प्रतियोगिता में "हेज दी प्रोग्रेस आफ साइंसेज एंड आर्ट्स कान्त्रिब्युतेद टू करप्ट आर प्युरिफाई मोरेलिटी?" अर्थात विज्ञान और कला की प्रगति का परिणाम नैतिकता में वृद्धि या गिरावट है? रूसो कि विचार "हाँ" में था. रूसो नारी मुक्ति के सन्दर्भ में बहुत रचनात्मक सोच नहीं रखता था, यह तो सभी को पता है. लेकिन नैतिकता के मुद्दे पर उसने जो विचार प्रकट किये थे, उसी में आज के नारी-मुक्ति का अर्थ झलकता है. जिस कला और विज्ञान को रूसो ने "नैतिकता की गिरावट" के लिए जिम्मेदार मन था, वही नारी स्वतंत्रता और विकास का कारण भी है.
मूल प्रकृति और आरोपित प्रकृति में फर्क होता है. लेकिन एक तथ्य यह भी है कि लम्बे समय से कोई शर्त किसी वर्ग, जाति अथवा समूह पर थोपी जायेगी तो धीरे-धीरे वह उसकी मूल प्रकृति हो जायेगी. उदाहरण के तौर पर महिलायें इस बात को बखूबी जानती हैं कि वे देवी नहीं हैं. एक मनुष्य हैं और आम पुरुषों की तरह उन्हें भी भूख, नीद, गुस्सा, प्यार, सेक्स महसूस होती है. वे उसी तरह अपनी सराहना पर प्रसन्न होती हैं, जैसे कोई पुरुष. लेकिन पुरुष लेखकों ने आरोपित कर दिया कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" तो वे अपने को देवी समझने लगीं. मुझे नहीं लगता कि इस विश्वासघाती सम्मान को तत्कालीन महिलाओं ने तुरंत स्वीकार कर लिया होगा. हाँ, जब उपेक्षिताओं को किसी पुरुष ने पहली बार देवी जैसी पूज्य बताया होगा तो उसे जरूर अच्छा लगा होगा. अंधा क्या मांगे दो आँख. शोषित नारी क्या मांगे पुरुष का थोडा सा प्यार. पुरुषों ने सत्ता बरकरार रखने के लिए अच्छी चाल चली. जैसा कि रूसो मानता है कि विज्ञान और कला से नैतिकता घटी, तो इसके विपरीत दूसरा अर्थ भी तैयार है कि विज्ञान और कला का विकास न होता तो नैतिकता बढ़ती. और नैतिकता है क्या? स्त्री का पूर्णतः पुरुष नियंत्रित होना. जैसे गाय, भैस, कुत्ता-बिल्ली वगैरह. यह "नैतिकता" स्त्रियों के लिए बेहद घातक शब्द है. मानक चाहे जो तोड़े, पहल चाहे जिसकी ओर से हो, कटघरे में स्त्री ही खडी होगी. जैसे कि आज भी बलात्कार चाहे जो करे, घृणा का विषय स्त्री ही होती है. कला और विज्ञान के विकास ने अब इन भाषिक षड्यंत्रों का अर्थ खोलना शुरू कर दिया है और वाकई विज्ञान और कला ने कथित अनैतिक ही सही, महिलाओं की मुक्ति का द्वार खोल दिया.
कला, विज्ञानं और बाजार का विकास न होता तो महिलायें कहाँ होती, इसे आसानी से समझा जा सकता है. और इसी आलोक में वर्तमान नारी मुक्ति आन्दोलन के परिदृश्य का आकलन किया जा सकता है. मेरा अपना मानना है कि जहाँ-जहाँ कला, विज्ञान और बाजार का विकास नहीं हुआ है, वहां महिलायें शोषित हैं. कौन करता है शोषण? कुछ पुरुष और ज्यादा महिलायें. जिन लेखिकाओं को इस पर आपत्ति हो, मै उन्हें एक सौ से अधिक प्रमाण भौतिक सत्यापन के आधार पर दूंगा. इस पर तो शायद किसी को आपत्ति न होगी कि जितना पुरुष अपने घर की महिलाओं को जानता है, उतना ही महिलायें भी अपने घर के पुरुषों को जानती हैं. किसी बेटी के जन्म पर सर्वाधिक दुखी कौन होता है? बेटियों को दिन-रात कौन कोसता है? क्या बहू का जितना विवाद सास से होता है, उतना ससुर से भी होता है? कोई महिला अपने जीवन में सबसे ज्यादा किससे आहात हुई? किससे सर्वाधिक उसके झगड़े हुए? उनकी स्वतंत्रताओं पर सबसे ज्यादा किसने अंकुश लगाया? दहेज़ के मामले में मांगों का पिटारा किसने पेश किया? न मिलने पर रोज-रोज की किचकिच किसने की? इन प्रश्नों के उत्तर शायद यही मिलेंगे कि अधिकांशतः स्त्रियों ने और कुछ पुरुषों ने.
दर-असल यह पूरा मामला सत्ता का है. पुरुष सत्तात्मक समाज के अस्तित्व में आने से पहले भी ऐसी दशा के मौजूद होने की पूरी गुंजाईश है. शायद रहा भी हो. क्योंकि जब सत्ता महिलाओं के पास रही होगी तो पुरुषों पर आधिपत्य को लेकर भी महिलाओं का महिलाओं से संघर्ष होते रहे होंगे. जैसा कि बाद में महिलाओं को लेकर पुरुषों में युद्ध और संघर्ष होते आ रहे हैं. तो आखिर क्या पुरुष नारी उत्पीडन का दोषी नहीं है? कोई भी यह सवाल खडा कर सकता है. "है". बल्कि शातिर तरीके से है. वह महिलाओं की सत्ता के सम्मुख आज भी नतमस्तक है. बस, उसने तोडा दिमाग का प्रयोग किया है. सत्ता तो महिलाओं के हाथ आज भी है. पुरुष तो चाणक्य की भूमिका में है. वह चन्द्रगुप्त को ज्ञान और भावनाओं के आधार पर अपना मुरीद बनाता है. लड़ाई तो चन्द्रगुप्त ही लड़ता है. पुरुष चाणक्यों ने राजा महिलाओं को अपार प्यार का भरोसा देकर उन्हें अपने अनुकूल साध लिया. पुराने ज़माने में यही काम ब्राह्मण आमात्य क्षत्रिय राजाओं के माध्यम से कराते थे. राजा अधिकार बोध की मादकता से इतना ग्रसित होता है कि वह अपने प्रशंसकों को प्रसन्न करने के लिए कोई भी युद्ध कर सकता है. कोई भी आदेश दे सकता है. किसी को भी सजा सुना सकता है. जिन घरों-परिवारों और क्षेत्रों में कला, विज्ञान और बाजार के साथ शिक्षा का वातावरण नहीं है, वहां इन्ही राजाओं द्वारा महिलायें प्रताड़ित हैं. इसके लिए न्यायिक दस्तावेजों का भी आंकड़ा देखा जा सकता है. दहेज़, दहेज़ ह्त्या जैसे मामलों में स्त्रियों की भूमिका पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है. मेरे ख्याल से नारी विमर्श में इस महत्वपूर्ण पहलू की ओर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. कहने को तो यह भी लेखिकाएं आरोप लगा रही हैं कि बाजार में स्त्रियों की नग्नता के लिए पुरुष ही दोषी है. यह सब लड़ने के लिए मजेदार मुद्दे हो सकते हैं, पर यथार्थ से नाटा कम ही है. हालाँकि अपवाद हर किसी के होते हैं.


डा० रमा शंकर शुक्ल
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