Page 1 of 1

रात की कालिमा छा गयी थी जहां---डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

Posted: Wed Dec 12, 2018 4:24 pm
by admin
Image

शृंगारिक मुक्तक (गीतिका )
रात की कालिमा छा गयी थी जहां ,
प्रात की लालिमा छा गयी थी वहाँ ।
चाँद का नूर खोया कहीं गुम हुआ ,
ढूंढते ढूंढते चाँदनी फिर कहाँ ।

आँख मलते हुए अब सुबह हो गयी ,
रूठते रूठते जब सुलह हो गयी ।
फेर कर हाथ को प्यार उसने किया ,
प्रेम ही प्रेम से आँखें नम हो गयी ।

एक टक देख कर प्रेम होने लगा ,
बेखटक देखते रूठने रब लगा ।
खूबसूरत नजर हुश्न भी है जवां
प्यार ही प्यार को जब मनाने लगा ।

मुख तेरा देख कर जो खुशी मिल गयी ,
भावना भाँप कर प्रेयसी मिल गयी ।
रूबरू है मेरे मै बयां क्या करूँ ,
हाथ थामे मुझे जिन्दगी मिल गयी ।

जान कर प्यार को प्यार मुझसे हुआ ,
प्रीति में मन मेरा खुशनुमा हो गया ।
एक अहसास है ओठ बेताब हैं ,
झांक कर आँख में स्वप्न सच हो गया ।

“डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव”
सीतापुर