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आस्था आडम्बरयुक्त हुई धरम-करम घट गया----अमरेश सिंह भदौरिया

Posted: Sun Oct 14, 2018 2:44 pm
by admin
मुक्तक संग्रह
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Amresh Singh



आस्था आडम्बरयुक्त हुई धरम-करम घट गया।
जोड़ने की शर्त थी पर टुकड़ा-टुकड़ा बट गया।
वैमनस्य कटुता यहाँ खूब फली फूली रिश्तों में,
परिणाम प्रत्यक्ष है आदमी-आदमी से कट गया।
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ढूंढ़िये क़िरदार ऐसे भी मिलेंगे तथ्य में।
जल जंगल ज़मीन का संघर्ष जिनके कथ्य में।
इतिहास लिखना शेष है उनके हिस्से का अभी,
संदर्भ से कट कर सदा जिए जो नेपथ्य में।
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अपराध की दुनिया के दृश्य घिनौने हो गए।
इंसानियत का कद घटा किरदार बौने हो गए।
ढाई आख़र पढ़ सकी न शायद हमारी ये सदी,
अंज़ाम उसका ये हुआ रिश्ते तिकोने हो गए।
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दास्तान-ए-इश्क़ भी है आग़ पानी की तरह।
महक भी मिलती है इसमें रातरानी की तरह।
समय जिसका ठीक हो मिलती उसे खैरात में,
वक़्त के मारों को मिलती मेहरबानी की तरह।
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चंद सपने और कुछ ख्वाहिशें हैं आसपास।
दूर ले जाती है मुझको आबो दाने की तलाश।
तन्हाई, चिंता, घुटन, बेबसी, मज़बूरियां,
बदलती हैं रोज़ अपने-अपने ढ़ंग से लिबास।
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दिल भी एक ज़ागीर है, संभालिये जनाब।
दरिया दिली का शौक कुछ,पालिये जनाब।
बाज़ार-ए-इश्क़ में गर करना है कुछ कमाल,
खोटा ही सही सिक्का, उछालिये जनाब।
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खुद को कभी भी आप यूँ तनहा न छोड़िये।
जुड़िये किसी से आप भी औरों को जोड़िये।
असलियत उघाड़ दें न कहीं ए बेशर्म हवाएं,
शोरहत का लबादा है जरा ढंग से ओढ़िये।
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सब्ज़बाग़ दिखलाने वाली दृष्टि सुनहरी है।
सिर्फ़ स्वयंहित साधन की साधना गहरी है।
अधिकारों के लिए एक ही विकल्प है संघर्ष,
सुनती भला याचना कैसे सत्ता गूंगी बहरी है।
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मिटने और मिटाने की बात करता है।
जहाँ को छोड़कर जाने की बात करता है।
समझ पाया नहीं जो स्वयं को आजतक,
नादान है वो ज़माने की बात करता है।
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करना है कुछ करो रोशनी के लिए।
चंद खुशियां जुड़े जिंदगी के लिए।
सभी को आदमी की ज़रुरत यहाँ,
दोस्ती के लिए, दुश्मनी के लिए।
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सब मिलते हैं अपनी-अपनी तरह।
कोई मिलता नही आदमी की तरह।
दोष दृष्टि में है याकि है व्यक्ति में,
है समझना कठिन जिंदगी की तरह।
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कभी किस्से में मिलती है
कभी मिलती कहानी में।
सुखद अहसास-सी है वो
महकती रातरानी में।
करुँ तारीफ़ भी कितनी
भला उसके हुनर की मैं,
महज-मुस्कान-से अपनी
लगाती आग पानी में।
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अमरेश सिंह भदौरिया
अजीतपुर
लालगंज
रायबरेली
उत्तर प्रदेश
पिनकोड 229206
मोबाइल +919450135976