करूँ सामना इनका, अब सामर्थ्य नहीं--गौरव शुक्ल

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करूँ सामना इनका, अब सामर्थ्य नहीं--गौरव शुक्ल

Post by admin » Fri Mar 17, 2017 6:37 am

यह कहकहे, ठहाके, मुझे चिढ़ाते हैं ,
करूँ सामना इनका, अब सामर्थ्य नहीं।
ऐसे मनोरंजनों से मन ऊब चुका,
इस उल्लास, हास में कोई तथ्य नहीं।

हर उत्सव बेचैन और कर जाता है,
अरुचि घोर होती, महफिली प्रमादों से।
करो नहीं उपचार वेदना का मेरी,
मुझे जूझने दो मेरे अवसादों से।

मेरे अश्रुपूर्ण नेत्रों पर प्रश्न उठें,
उससे पूर्व, मुझे ले, कहीं निकल साथी।
घुटा जा रहा है दम इस कोलाहल में,
दूर यहाँ से कहीं मुझे ले चल साथी।
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