डर-विशाल अग्निहोत्री (अग्नि)

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डर-विशाल अग्निहोत्री (अग्नि)

Post by admin » Fri Sep 28, 2018 3:26 pm

कविता प्रकाशन हेतू
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Vishal Agnihotri <vagnihotri68@gmail.com>

डर

आज एक अजीब सा डर था हवाओं में
किसी के पास होते हुए भी बहोत दूर जाने में
वो सेंकडो बादलों से लड़ने वाली चिड़िया
मेरा डर था उसके अस्तित्व के खो जाने में
उसने मुझे देवता बना दिया अपने मन मंदिर का
मेरा डर था उस आस्था की मूरत टूट जाने में
कश्ती अकेले निकल पड़ी थी समंदर का सामना करने
मेरा डर था उसके अनंत में विलीन हो जाने में
मैं उसे महफूज़ रखना चाहता था दुनिया के पथरीले वारो से
मेरा डर था उस नाजुक सी गुड़िया के टूट जाने में
उसने बारिश बनकर मेरे बंजर को हरा कर दिया
मेरा डर था बादलों के खत्म हो जाने में
वह निर्जन रण में दिखी प्यास की आस है
मेरा डर है उस आस की मृगतृष्णा हो जाने में
मैं उसकी तपस्या, त्याग, पवित्रता, समर्पण की मूरत हूँ
मेरा डर है इस पूजा के अभिशाप बन जाने में

-विशाल अग्निहोत्री (अग्नि)
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