बेटियों को मुखाग्नि का अधिकार क्यॊ नहीं--डा० सुनील कु०परीट

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बेटियों को मुखाग्नि का अधिकार क्यॊ नहीं--डा० सुनील कु०परीट

Post by admin » Thu Aug 01, 2013 11:39 am

* बेटियों को मुखाग्नि का अधिकार क्यॊ नहीं *
- डॊ . सुनील कुमार परीट
वरिष्ठ हिन्दी अध्यापक
सरकारी माध्यमिक विद्यालय
लक्कुंडी - 591102बैलहोंगल
जि- बेलगाम (कर्नाटक)
मो- 08867417505

" यह कहना शायद सही होगा कि सबसे ज्यादा बदलाव लाने की जरुरत दो जगह पर है - औरोतों के बारे में आदमियों की सोच और औरतों के बारे में खुद औरतों की सोच। " ये विचार वेरा ब्रिटेन जी का है। और यह उतना ही सच है कि औरत को पुरुष से ज्यादा औरत वर्ग ही मानने को तैयार नहीं। माना भारत प्राचीन काल से ही पुरुष प्रधान देश है, तब से ही किसी भी काम में पुरुष का ही पात्र महत्वपूर्ण माना है। जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी कामों को ज्यादातर पुरुष ही देखते आ रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि बेटियों को मुखाग्नि देने का कोई अधिकार नहीं है और इस तरह का उल्लेख भी शास्त्रों में कहीं नहीं है।
भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्न ने संदेश दिया है कि, मृत्यु एक अटल सत्य है, जिसने जन्म लिया है उसे मृत्यु भी अवश्य मिलेगी, आत्मा अमर है, आत्मा की शांति के लिए उसकी अंतिम इच्छा भी पूरी होनी चाहिए। भारत मान्यताओं और परम्पराओं का देश है हिन्दू धर्म में मृत्यु के संबंध में कई महत्वपूर्ण नियम बनाए गए हैं। मृत्यु के बाद शव को मुखाग्नि पुत्र ही देता है, मृतक अगर स्त्री हो या पुरुष अंतिम क्रिया पुत्र ही संपन्न करता है। इस संबंध में हमारे शास्त्रों में उल्लेख है कि पुत्र पुत नामक नरक से बचाता है अर्थात पुत्र के हाथों से मुखाग्नि मिलने के बाद मृतक को स्वर्ग प्राप्त होता है। इसलिए मान्यता के आधार पर पुत्र होना कई जन्मों का पुण्य का फल बताया जाता है।
मुखाग्नि देने की प्रथा तो भारतीय संस्कृति में पवित्र संस्कार ही है। मुखाग्नि यानि चिता पर रखे हुए शव के मुख में रखी जानेवाली अग्नि। मुखाग्नि के पर्यायवाची शब्द हैं- चिताग्नि या शवदाह। अब उस मृतदेह को अग्नि कौन दे यह तो प्राचीन काल से शायद यक्षप्रश्न की तरह सब खाई जा रही है। तो मुखाग्नि अधिकार सिर्फ पुरुष को दे यह बात किस हदतक हजम कर सकते हैं। स्त्री के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जाता है?
" यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्य :।
तस्मिंस्तया वर्तितव्य स धर्म :।
मायाचारो मायया बाधितव्य :।
साध्वाचार: साधुना प्रत्युपेय :॥ "
- वेदव्यास (महाभारत, शांतिपर्व)
अर्थात अपने साथ जो जैसा व्यवहार करता है, उसके साथ ही बर्ताव करना धर्मनीति है। मायावी पुरुष के साथ मायावीपन और साधु पुरुष के साथ साधुता का व्यवहार करना चाहिए, यही श्रेष्ठ धर्मनीति है।
तो क्या हमारी बेटी मायावी है? बेटी के साथ ये मायावी व्यवहार क्यों किया जाता है? जो बेटी उम्र भर सिर्फ सेवा ही करती है, कभी सुख की अभिलाषा तक नहीं करती, जन्म से लेकर अंततक माता-पिता, पति, बच्चें, सास-ससुर सबकी सेवा करती है। मात्र उसे आमतौर पर मुखाग्नि का अधिकार क्यों नहीं दिया गया है? क्या हम ऐसे दूषित समाज में जीना पसंद करेंगे? क्या हम अपने बच्चों को यही आदर्श और मूल्य विरासत में देना चाहते हैं? कुछ लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं कि महिलाओं में छुताछुत की बात होती है, तो मुखाग्नि देने का संस्कार अत्यंत पवित्र होता है, इसमें कोई अपवित्र घटना न हो। परन्तु ये भी सारासर गलतफहमी है। क्योंकि गीता में लिखा गया है-
“ मन : प्रसाद : सौम्यत्वं मौन मात्मविनिग्रह :।
भाव संशुध्दि रित्येतत्तपो मानसमुच्चेय॥ " (गीता १७/१६)
अर्थात मन की प्रसन्नता, शान्तिभाव, मौन, आत्मसंयम, अंत:करण का शुध्द रखना यह सब मानसिक तप है। किसी की कमियाँ देखना या कमजोरियों को देखना हमारा लक्ष्य नहीं होता। दूसरों को दु:ख देकर हम सुखी नहीं बन पाते। मुखाग्नि तो एकसमान प्रथा बननी चाहिए।
स्पष्ट है कि भारत पुरुष प्रधान देश है, प्राचीन काल से ही जब से नागरिकताओं के उगम से लेकर भारतवर्ष में पुरुष प्रधान परिवार हैं, समाज हैं। सामान्यत: घर-परिवार के सभी कामकाज पुरुष ही संभालता आया है, तो सहज ही बनता है कि मुखाग्नि भी पुरुष ही दे। मगर यह कोई त्रिकाल बाधित सत्य भी नहीं है। महिलाओं के साथ यह अन्याय योग्य नहीं है। पुरुष से भी स्त्री हमेशा श्रेष्ठ मानी जाती है। शायद इसीलिए डाऐन मरीचाइल्ड ने कहा है- " औरत संपूर्ण है , क्योंकि उसमें जीवन देने की पालण -पोषण करने की और बदलाव लाने की शक्ति है। "
प्राचीन काल में अनेक बार ऐसे संदर्भ भी आये है जहाँ पुत्र न होने कारण या अनिवार्य स्थितियों में बेटियों ने ही मुखाग्नि दी है। और शायद आजकल तो यह सामान्य बात बनती जा रही है। इस संबंध अनेक उदाहरण हम यहाँ देख सकते हैं-
* एक माँ आशादेवी सक्सेना की मौत के बाद उसके दो बेटों के होते हुए भी उसकी बेटी रुचि सक्सेना ने मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की सारी रस्मों को अदा कर बेटियों के गौरव की मिसाल कायम की। ( साभार गैनिक जागरण, १५ जून २०१३)
* बसपा पार्टी के पूर्व मंत्रिमंडलीय सचिव सबसे ताकतवर नेता शशांक शेखर सिंह को उनकी छोटी बेटी पूजिता सिंह ने मुखाग्नि दी। ( साभार पंजाब केसरी, १३ जून २०१३)
* सन २०११ में पिता श्रीचंद गौतम जी के शव को तीन बेटियों में सबसे छोटी बेटी कनिका ने मुखाग्नि दी। ( साभारअमर उजला, १३ जून २०१३)
* सिविल इंजीनियर श्री सुनीलकुमार वाष्र्णेय जी के मृत्यु के बाद उन्हें उनकी बेटी दिशा ने मुखाग्नि दी।
* हाल ही में शहीद हुए सरबजीत सिंह की पार्थिव शरीर को उनकी बहन दलबीर ने मुखाग्नि दी।
इस तरह हम आज अनेक उदाहरण देख रहे हैं कि अब मुखाग्नि देने का अधिकार सिर्फ बेटों को ही नहीं बल्कि बेटियों ने भी हासिल किया है।पुराने रस्मों-रिवाजों को तोडती हुई महिला भी सशक्त बनकर उभर गयी है। पुरुष के समान सभी क्षेत्रों में काम कर रही हैं तो भला मुखाग्नि देने के इस पुण्य कार्य से क्यों पिछे हट सकती है। और इस बात को सभी पुरुष और रुडिवादी-परम्परावालों को भी मानना ही होगा, नहीं तो बहुत कुछ हासिल करके भी हम सबकुछ खो सकते हैं। इसलिए बाइबल कहता है- ” अगर हम अपनी आत्मा को हारकर सारा संसार जीत ले तो सोचिये हमने क्या पाया? “ (मैथ्यू १६:२६)

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