स्त्री विमर्श...... manmohanbhatia

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स्त्री विमर्श...... manmohanbhatia

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 4:32 pm

स्त्री में देवी की दिव्यता, मां की ममता, सहचरी की सदभावना और प्राणधार की प्राणदायिनी धारा है। वह दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में सर्वोपरी है। लक्ष्मीबाई, इंदिरा, सोनिया के रूप में शासक है। भारत में सर्वदा नारी को अत्यन्त उच्च स्थान पर प्रतिष्टित किया गया है। हमारे धर्म-शास्त्रों में नारी सर्व शक्ति सम्पन्न मानी गई है। विद्या, शक्ति, ममता, यश और सम्पत्ति का प्रतीक समझी गई है। वैदिक, युगीन क्षेत्र में नारी का स्थान, पुरुषों के समकक्ष था।
समय के घटनाचक्र ने समाज में स्त्रियों के अधिकार और समानता को अंकुश किया, लेकिन आज के आधुनिक समाज ने फिर से स्त्री के अधिकार और समानता को पुराना स्वरूप देने की पहल की है। कुछ ग्रामीण क्षेत्रों की बात छोड दी जाए, तो भारत में स्त्रियां फिर से पुराने मुकामों को हासिल किया है। कल की बात भूलिए, आज की बात करे। भारत के कई प्रदेशों में महिला मुख्य मंत्री हैं। कई बेंकों, कंपनियों में सीईऔ भी महिलाए हैं। देश की बागडोर तक एक स्त्री के हाथों में हैं।
इन के बावजूद समाचारों की सुर्खियां में स्त्रियों पर अत्याचार की खबरे रहती है। तमाम मीडिया ने पुरूष समाज को खलनायक बना दिया है। हम सब को अपनी सोच बदलनी चाहिए। अत्याचार सिर्फ स्त्रियों पर ही नही होता है, किसी पर भी हो सकता है। चाहे वह स्त्री हो, पुरूष हो, बच्चों तक अत्याचार के शिकार हैं। अत्याचार स्त्री या पुरूष पर नही होता है। अत्याचार होता है, कमजोर, लाचार और बेसाहारा पर। कमजोरी, लाचारी, बेसाहारी मानसिक भी हो सकती है या फिर शारीरिक। पुरूष या स्त्री में कोई भेद नही करता है, अत्याचार से पहले या फिर बाद में। यदि गरीब भी किसी रूप में बलवान है, वह अत्याचारी का मुकाबला डट कर करता है, उस पर विजयी भी होता है। जो मुकाबला नही कर सकता, वह अत्याचार का शिकार होता है।
हॉनर किलिंग आज समाज की जवल्लंत समस्या है। बेटियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है, झूठी आन, बान, शान की खातिर। लाड प्यार से पाली, समस्त नखरे उठाए, परिवार ने, सारी ईष्छाए मानी, सिर्फ एक ठुकरा दी, अपनी पसन्द के लडके से विवाह करने की। यह कार्य सिर्फ मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति ही कर सकता है, जो समाज के आगे खडा नही हो सकता। रूढी वादी परमपराऔ को तोडने, उनका सामना करने के लिए बलवान मानसिकता चाहिए। बलवान समाज को लताड सकता है, सभी माप दंडों को मोड कर अपना नया रास्ता बना सकता है, और दूसरे अनुयायी बनते है। स्त्रियां सक्षम है, परिवार की सोच बदल सकती हैं। अपनी बेटी को मौत के घाट उतारने के बदले परिवार के आगे डट कर खडा होने की आवश्कता है। परिवार की सोच बदली, तो परिवार समाज की सोच बदल सकता है। कलिंगा के युद्ध में सम्राट अशोक भी स्त्रियों के मानसिक बल के आगे नम मस्तक हो गए, तो आज भी समाज के दकियानूसी विचार धारा को बदलने में सक्षम हैं।
आज जरूरत है मानसिक बलवान बनने की। सक्षम पहले भी थी, आज भी है, कल भी होगी।
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