सुलोचना भाभी---महेश द्विवेदी

Post Reply
User avatar
admin
Site Admin
Posts: 21114
Joined: Wed Nov 16, 2011 9:23 am
Contact:

सुलोचना भाभी---महेश द्विवेदी

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 4:23 pm

जून के महीने की तपती लू मंे पूरे गांव का हाल बेहाल था। दिनेश के घर का पालतू कुत्ता चबूतरे पर नीम की छाया में आंख मींचकर पड़ा हुआ हांफ ़रहा था। सुबह के समय आंगन की मुंडेर पर फुदकने वाला नर गौरैया लू से बचने के प्रयास मे ककैया ईंट की पुरानी दीवाल में बन गये एक छेद मंे घुस गया था। दिनेश, जो दक्षिणी बराम्दे के पीछे स्थित कच्ची मिट्टी की दीवालों के मड़हे मे बंास की चारपाई पर अलसाया पडा़ था, नर गौरैया के पीछे उसी छेद में घुसती हुई मादा गौरैया को ध्यान से देख रहा था। उसको देखकर उसे अनायास अपनी सहपाठिनी जेन की याद आने लगी थी। दिनेश ने गत वर्ष रसायन शास्त्र में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. एस. सी. करने के बाद डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के उद्देश्य से न्यूयार्क स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया था। वह गत माह अपने गांव आया हुआ था। उसकी छुटिृयां समाप्त हो गईं थीं और उसे अगले ही दिन एयर इंडिया की फ़्लाइट से अमेरिका वापस जाना था।

‘‘तुम्हाओ पोस्ट कारड आओ है। आज स्कूल सै बापिस आत बखत कल्लू कौं डाकिया ने पकराय दओ हतो।’’ भग्गी काछी की दुलहिन दिनेश के घर के पूर्वी बराम्दे में खडी़ होकर दिनेश की माॅ को सम्बोधित कर सूखे मुंह से कह रही थी- उसके मुख पर चिंता का भाव परिलक्षित हो रहा था। दिनेश की माॅ पढी़ लिखी नहीं थीं परंतु पोस्ट कार्ड का एक कोना फटा देखकर वह सहम गईं थीं- गांव मे यह बात कौन नहीं जानता कि पोस्ट कार्ड के कोने मे पीला रंग लगे होने का अर्थ होता है विवाह अथवा किसी शुभ कार्य के अवसर का निमंत्रण, तार आनेे का अर्थ होता है किसी की मृत्यु अथवा मृत्युशैय्या पर होने का समाचार, एवं पोस्ट कार्ड का कोना फटे होने का अर्थ निःसंदेह मृत्यु की सूचना ही होता है। दिनेश की माॅ अपढ़ थीं अतः वह शीघ्रता से पोस्ट कार्ड लेकर उसके कमरे में आकर उससे कहने लगीं,
‘‘देखौ तौ लला, जा मैं का लिखी है।’’
पोस्ट कार्ड की ओर देखकर दिनेश भी अपने को किसी अनिष्ट की सूचना को सहन करने को तैयार करने लगा। फिर माॅ के हाथ से पोस्ट कार्ड लेकर पढ़ने लगा,
‘‘प्रिय रामदयाल, पखनगांव
प्रसन्न रहो। 24, जून,1963

तुम्हाई चिट्ठी मिली हती। जवाब दीबे मै देरी कुछ खास परेसानीं के कारण भई।
बिसेस समाचार जू है कि उमेन्द्र की बहू सुलोचना पिछले सोमवार कौं बाई बीमारी मे खतम हुइ गई, जो उमेन्द्र कौं हती। बाई दिन क्रिया करम कर दओ हतो। पर गांव मंै काउू ने थाने मे सिकायत कर दई, सो दूसरे दिन पुलिस आई हती, और मुस्किल सै लै दै कें वापस गई। अब तौ मामला ठंडो जान पड़त है।
घर मैं सबको यथायोग्य कहियो।
बाकी ईश्वर कृपा है।
तुम्हारा सुभेच्छु,
बालकराम ’’

पत्र पढ़कर दिनेश स्तब्ध रह गया- उसका मन यह स्वीकार ही नहीं कर रहा था कि सुलोचना भाभी अब इस दुनिया मंे नहीं हैं और वह अब उनसे कभी नहीं मिल पायेगा। समाचार की गम्भीरता को ज्यों ज्यों वह आत्मसात करने लगा, उसका हृदय तीव्रतर व्यथा से आप्लावित होने लगा। सुलोचना भाभी की मृत्यु उसके लिये किसी आत्मवत व्यक्ति की मृत्यु का प्रथम अनुभव था।
दिनेश की माॅ के मुख पर दुख की एक झलक आई और अपने स्वभाव के अनुसार उनके मॅुह से ‘हे ईश्वर’ निकला; और उसके बाद वह बोलीं,
‘‘चलौ अच्छोई रहो। बहू की जिंदगी तौ उइसेंई खराब हुइ गई हती।’’
यद्यपि दिनेश जानता था कि ग्रामीण समाज में पति की मृत्यु के उपरांत विधवा का जीवन एक लम्बी दुख, तिरस्कार, अपमान एवं दासता की दिनचर्या मात्र रह जाता है, तथापि सुलोचना भाभी के सम्बंध मे माॅ के ये शब्द उसके मन को कसैला कर गये थे। सुलोचना भाभी, जो इतनी स्वस्थ, सुंदर एवं हंसमुख थीं, को इतनी जल्दी पति की बीमारी लग जाना और उससे उनकी मृत्यु हो जाना अविश्सनीय था- उस पर पुलिस के आने और ले देकर वापस हो जाने की बात भी दाल में कुछ काला होना इंगित करती थी। दिनेश का मन दुख एवं संशय से भर रहा था जो आंसू बनकर बहने को आतुर हो रहे थे, और उन्हें छिपाने के लिये वह आंख बंद कर ऐसे लेट गया जैसे इस सूचना से अनछुआ रहा हो और शांति से सोने जा रहा हो।


उमेन्द्र आयु मे दिनेश से पांच वर्ष बडा़ था और उसके मौसा का पुत्र था। उमेन्द्र ने मिडिल स्कूल की परीक्षा मे अच्छे अंक प्राप्त किये थे, अतः उसके पिता ने अपनी सामथ्र्य से अधिक व्यय-भार ओढ़कर उसे विद्यांत इंटर कालेज, लखनउू मे प्रवेश दिला दिया था। लखनउू से उमेन्द्र का गांव बहुत दूर था और दिनेश का काफी़ पास था। अतः थोड़े दिनों की छुट्टियां होने पर उमेन्द्र अपने घर न जाकर प्रायः दिनेश के घर आ जाता था । दिनेश के घर मंे प्रायः वह उसी के साथ अपना समय बिताता था। इस कारण आयु का अंतर होते हुये भी वह दिनेश से बहुत कुछ खुल गया था। वह स्वच्छ हृदय परंतु मनचले स्वभाव का किशोर था। वह छोटे पर से ही इकहरे और दुर्बल शरीर का रहा था परंतु लखनउू आने के बाद वह धीरे धीरे और अधिक दुर्बल दिखने लगा था। उसने अपने मन को वहां के आकर्षणों के वशीभूत कर दिया था। सिगरेट और सिनेमा के व्यसन उसे लग गये थे। कभी कभी एकांत स्थान पाकर वह दिनेश की उपस्थिति मे भी सिगरेट जला लेता था। फिर वह सिगरेट का लम्बा सा कश लेकर अपने हांेठ गोल करते हुये धुंयें के छल्ले छोड़ने मंे गौरव का अनुभव करता था। प्रायः धुंयें को फेफड़ों में भरकर वह देर तक रखे रहता जैसे दिनेश को अपनी क्षमता से प्रभावित करने का प्रयत्न कर रहा हो। वह प्रायः लखनउू के सिनेमा हालों मे लगी हुई्र फ़िल्मों की बातें किया करता। उमेन्द्र की वे बातें सुनकर दिनेश को उसके भाग्य से ईष्र्या होने लगती क्योंकि उसने अपने जीवन में अभी तक एक ही फ़िल्म ‘शाहजहां’ देखी थी। मेले मे पुआल पर बिछी खेस पर बैठकर ‘शाहजहां’ पिक्चर उसकी समझ में तो कम ही आयी थी परंतु उसकी चमकदमक से वह अभिभूत हो गया था और उसके पात्र उसे परीलोक मेें विचरण करने वाले प्राणी लगे थे। उस कहानी के अंश कई बार उसके सपनों मे आकर उसे गुदगुदाते रहे थे। कभी कभी तो उसे लगता कि वह स्वयं परीलोक का शाहजादा बन गया है और उनके बीच निद्र्वंद्व विचरण कर रहा है। एक बार जब उमेन्द्र लखनउू से दिनेश के यहां आया, तब वह जब भी एकांत पाता, ‘मुहब्बत मंे ऐसे कदम डगमगाये, ज़माना यह समझा कि हम पी के आये’ गुनगुनाने लगता। इस गाने के विषय में दिनेश के पूछने पर उसने बताया कि अब की बार उसने नावेल्टी टाकीज़ मे चल रही फ़िल्म ‘अनारकली’ देखी है। फिर उसने अनिर्वचनीय तल्लीनता से उस फ़िल्म की प्रशंसा प्रारम्भ कर दी और उसकी हीरोइन ‘बीना राय’ का नाम आने पर तो उसके होठों पर चाशनी सी लग जाती तथा आंखों मे ऐसी चमक आ जाती जैसे अनारकली उसी के लिये प्राण त्यागने को प्रशस्त हो।
धीरे धीरे उमेन्द्र के लखनउू की पढा़ई के वर्ष बीतते रहे और उसके सिगरेट, पान और फ़िल्म के शौक बढ़ते रहे। अब वह कभी कभी सिगरेट का बहुत लम्बा कश लगा लेता था और फिर देर तक खांसता रहता था। आयु के साथ उसके स्वास्थ्य मे सुधार होने के बजाय उत्तरोत्तर गिरावट आ रही थी, क्योंकि अपने पिता द्वारा भेजे जाने वाले रुपयों के अधिकांश का व्यय वह अच्छा खाने के बजाय सस्ती सिगरेट पीने और सिनेमा देखने मंे करता था। इंटरमीडिएट की परीक्षा उसने किसी तरह तृतीय श्रेणी मे उत्तीर्ण की। उसे आगे पढा़ये जाने का तो प्रश्न ही नहीं था, अतः इंटरमीडिएट के बाद ही उसे कहीं नौकरी पर लगाने का प्रयत्न होने लगा। उन दिनों प्रायमरी स्कूल के अध्यापक की नौकरी के लिये भी प्रथम श्रेणी से हाई स्कूल की अनिवार्यता हो गई थी, जब कि उसकी द्वितीय श्रेणी थी। उसके किसी प्रतियोगिता मे आ जाने की किसी को आशा नहीं थी और न प्रतियोगिताओं के विषय में किसी को पर्याप्त ज्ञान ही था। बडे़ प्रयत्न के उपरांत रेलवे के खल्लासी की नौकरी उसे मिल सकी।
उमेन्द्र के गांव और आस पास के गांवों मे हल्ला हो गया कि लखनउू मे कालिज पास करने के बाद उमेन्द्र को रेलवे मे नौकरी मिल गई है। फिर क्या था कुंआरी कन्याओं के पिता उसके पिता के घर के चक्कर लगाने लगे। रीति के अनुसार दहेज हेतु किये जाने वाले मोलभाव के उपरांत सुलोचना नामक कन्या के साथ विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। तीन महीने बाद ज्येष्ठ माह में विवाह की तिथि पंडित जी ने पंचांग से नकाली। घर में चहल-पहल प्रारम्भ हो गई । गांव की अडो़स-पडो़स की स्त्रियां अपने घर का चूल्हा-चैका प्रतःकाल जल्दी-जल्दी समाप्त करके उमेन्द्र के घर इकट्ठी हो जातीं और गाते बजाते हुये सूप से गेंहूं पछेरतीं, ओखली मंे दाल कूटतीं और धूप में चारपाई पर चादर बिछाकर मुंगौरी बनातीं। निमंत्रण-पत्र देने हेतु निकट के स्थानों को नाई भेजा जाने लगा और दूरस्थ स्थानों को हल्दी-अक्षत लगे पोस्ट कार्ड प्रेषित किये जाने लगे। दिनेश को जब वीरेन्द्र भाईसाहब के विवाह की बात ज्ञात हुई, वह बहुत प्रसन्न हुआ- विशेषतः इस बात से कि छुट्टियों में विवाह की तिथि पड़़ने के कारण वह लम्बे समय तक विवाहोत्सव का आनंद उठा पायेगा। विवाह बडी़ धूमधाम से सम्पन्न हुआ- सुलोचना के पिता ने बारात को प्रसन्न करने में अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोडी़। दहेज की तय रकम से कुछ उूपर ही दान-दक्षिणा भी दी, जिससे सभी लोग प्रसन्न थे। और जब सुलोचना की मुंह दिखाई हुई तो उसके मनमोहक रूप को देखकर कोई भी उसकी प्रशंसा किये बिना न रह सका। विवाहोपरांत एक सप्ताह तक दिनेश वहीं रहा। यद्यपि सुलोचना उन दिनों लम्बा घूंघट निकालकर रहती थी, परंतु छोटा देवर होने के नाते दिनेश के सामने वह पर्दा नहीं करती थी और दिनेश अपनी भाभी के रूप, स्वभाव और वाणी से इतना सम्मोहित हो गया था कि किसी न किसी बहाने वह पा्रयः उन्हीं के चारों ओर चक्कर लगाता रहता। एक सप्ताह में उसे सुलोचना भाभी से गहन एकात्मकता सी हो गई। सच बात तो यह थी कि सुलोचना ने अपने व्यक्तित्व से घर मंे सभी से ऐसा तादात्म्य स्थापित कर लिया था कि सभी को उससे आत्मीयता की अनुभूति होने लगी थी।


एक सप्ताह बाद सुलोचना को उसका भाई आकर विदा करा ले गया और दिनेश अपने घर चला आया। फिर उमेन्द्र अपनी नौकरी पर चला गया और दिनेश अपनी पढा़ई मे लग गया। अब दिनेश का उमेन्द्र भाईसाहब से मिलना बहुत कम हो गया था क्योंकि उनकी नियुक्ति का स्थान दूर था और उन्हें छुट्टी भी कम ही मिलती थी। सुलोचना से तो वर्षों के अंतराल पर मिलना हो पाता। सुलोचना भाभी से मिलने पर अब उसके स्वयं के व्यवहार में औपचारिकता आ जाती क्योंकि अब वह बडा़ हो रहा था और सुलोचना भाभी से पहले जैसे खुलेपन से मिलने मे झिझकने लगा था। यद्यपि दिनेश से बात करते समय सुलोचना की वाणी मे चहक पूर्ववत रहती थी, तथापि अब वह सयत्न अन्य घरवालों की उपस्थिति में ही उससे मिलती थी। फिर भी सुलोचना के शब्द एवं वाणी दिनेश के मन में प्रसन्नता बिखेर देते थे।
दिनेश के मन में कभी कभी यह आश्चर्य भी जाग्रत होता था कि उमेन्द्र भाईसाहब की मात्र खल्लासी की नौकरी होने की जानकारी होने एवं उनके अत्यंत गिरते स्वास्थ्य को देखकर भी भाभी ने न तो कभी किसी प्रकार के असंतोष का प्रदर्शन किया और न उनकी वाणी मंे कभी कोई क्लेश परिलक्षित हुआ। उसे लगता कि सुलोचना भाभी में भगवान शंकर के समान गरल को निर्विकार रहकर पचा जाने की असीम शक्ति है। उस गरल की तीक्ष्णता का आभास दिनेश को एक दिन तब हुआ, जब वह अपनी माॅ के साथ मौसा के घर गया हुआ था। उन्हीं दिनों उमेन्द्र भी सुलोचना के साथ वहां आया हुआ था। उसके कृशकाय शरीर को देखकर दिनेश की माॅ स्तंभित रह गईं थीं। उससे तो वह कुछ भी नहीं बोलीं थीं परंतु बाद मे चिंतित स्वर में सुलोचना से उन्होने पूछा था,

‘‘लला बहुत कमजो़र हुइ गये हैं। का ठीक सै खात पियत नाईं हैं?’’

सुलोचना पहले तो चुप रही थी और उसने वार्तालाप का विषय बदलने का प्रयत्न किया था, परंतु उसे बात टालते देख दिनेश की माॅ के स्वर में ऐसा भाव आ गया था जैसे दिनेश की इस स्थिति के लिये सुलोचना ही दोषी है। दिनेश की माॅ उसे झिड़कने के स्वर मे कहने लगीं थीं,

‘‘बहू ! पति की देह तौ घरवाली की देखभाल सै ठीक रहत है।’’
तब सुलोचना के घैर्य का बांध टूट गया था और वह फफक कर रो पडी़ थी। फिर भरे गले से बस इतना बोली थी,
‘‘मौसी खइबो पीबो तौ सरीर मै तब लगै, जब सिगरेट और सराब छूटै।’’
सुलोचना के उन शब्दों एवं स्वर में निहित वेदना दिनेश के ह्दय को बींधती चली गई थी। उसे लगा था कि इतनी सुमधुर, सुंदर, सुशील एवं सहनशील भाभी का उमेन्द्र के साथ विवाह करवा के उनके साथ घोर अन्याय किया गया है।




मानिकपुर
दि.25.1.1963
‘‘प्रिय दिनेश,
प्रसन्न रहो।
, अत्र कुशलं तत्रास्तु।
तुम्हारा पत्र काफी़ समय से नहीं मिला। हम सबको चिंता हो रही है। तुम पंद्रह दिन में एक चिट्ठी अवश्य डाल दिया करो। देरी होने पर तुम्हारी माॅ बहुत परेशान होने लगतीं हैं। सुनते हैं कि अमेरिका की पढा़ई्र कठिन होती है और वहां तरह तरह के आकर्षण भी होते हैं। इसलिये तुम्हें अपना ध्यान पढा़ई पर कंेद्रित रखना आवश्यक है। इसीसे तुम्हारा भविष्य बनेगा।
एक विशेष समाचार यह है कि उमेंद्र्र का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया है। वह इटावा के टी. बी. क्लिनिक मे भर्ती है। कभी कभी मुह से खून आने लगा है। डाक्टरों के अनुसार टी. बी. फेफडा़ें मे पूरी तरह फैल चुकी है। हम सब को बडी़ चिंता है। सुलोचना उसकी देखभाल में वहीं रहती है। ईश्वर ही मालिक है।
तुम्हारी माॅ तुम्हें प्यार कहतीं हैं।
शेष भगवत्कृपा,
तुम्हारा पिता,
रामदयाल

दिनेश को जेन के साथ रात में सिनेमा देखकर हौस्टल वापस आने पर पिता का यह पत्र वाचमैन ने दिया था। लखनउू विश्वविद्यालय से एम. एस सी. पास करने के पश्चात दिनेश ने न्यूयार्क स्टेट यूनिवर्सिटी में शोधकार्य हेतु प्रार्थना-पत्र प्रेषित किया था और उसे छात्रवृत्ति के साथ प्रवेश मिल गया था। अमेरिका की स्वच्छंद संस्कृति मंे दिनेश का मन रम गया था, जिसका एक माध्यम जेन भी थी। जेन ने भी कुछ दिवस पूर्व ही शोध कार्य हेतु वहां प्रवेश लिया था और वह दिनेश के ही छात्रावास में उसके बगल के कमरे में रह रही थी। प्रथम दिवस ही जब दिनेश अपने कमरे मंे बैठा एक सर्वथा नवीन वातावरण से उद्भूत अकेलेपन का अनुभव कर रहा था, जेन ने कमरे के बाहर से उसे देखकर अंदर आने की अनुमति मांगी थी। फिर वह हाथ मिलाकर और एक दूसरे का परिचय प्राप्त कर उससे ऐसे घुलमिल कर बात करने लगी थी जैसे पुरानी मित्रता रही हो। यद्यपि प्रारम्भ में दिनेश को उससे इस प्रकार मिलने में झिझक लगी थी, परंतु शनैः शनैः वह दिनेश से अंतरंग हो गई और उसके व्यवहार से ऐसा लगने लगा कि वह दिनेश से विवाह हेतु उत्सुक है। अपने पूर्व जीवन के विषय में बात करते हुये उसने दिनेश को बताया कि वह स्काटलैंड के एक गांव की रहने वाली है और प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियन है। दो वर्ष पूर्व उसने माइकेल नामक एक बैंकर से विवाह किया था। बाइबिल की शिक्षानुसार उसने विवाह पूर्व अपने को कुमारी रखा था। विवाहोपरांत उसे ज्ञात हुआ कि उसका पति उसे रति-सुख की पूर्णता प्राप्त कराने में असमर्थ है। इसी कारण वह सप्रयास पति से दूर न्यूयार्क चली आयी है और उसने विवाह विच्छेद हेतु न्यायालय मे प्रार्थना-पत्र भी दे रखा है। यह सुनते हुये दिनेश जेन के मुख को ध्यान से देख रहा था एवं उसे आश्चर्य हो रहा था कि जेन को यह सब बताने में न कोई झिझक लग रही थी और न किसी प्रकार की आत्मग्लानि का अनुभव हो रहा था।
प्रथम बार भारत से चलते समय दिनेश की सुलोचना भाभी से मिलने की तीव्र इच्छा हुई थी, परंतु व्यस्ततावश दिनेश सुलोचना भाभी से नहीं मिल पाया था। अमेरिका आने पर यदा-कदा एकांत के क्षणों मंे सुलोचना भाभी के हास्य में छिपा उनका दग्ध एवं अतृप्त अंतर्मन दिनेश के मानस-पटल पर उभर आता और उसके हृदय को सालने लगता था। जिस दिन जेन ने अपनी आत्मकथा दिनेश को बतायी, उस रात्रि उसे लगता रहा कि सुलोचना भाभी की कहानी जैसे जेन की कहानी से कुछ कुछ मिलती जुलती है। फिर उसके मन में विचार आया कि सुलोचना भाभी अगर भारत में जन्म न लेकर किसी पश्चिमी देश मे जन्मी होती, तो क्या आज ऐसा कृत्रिम जीवन बिताने को उन्हें बाध्य होना पडत़ा।

पिता के पत्र से उमेन्द्र भाईसाहब की गम्भीर स्थिति को जानकर दिनेश के मन में अविलम्ब भारत आने की इच्छा हुई, परंतु छुट्टी मिलने और टिकट आदि के पैसे का प्रबंध होने मे चार माह का समय व्यतीत हो गया। फरवरी माह में उसके पिता के दूसरे पत्र से उमेन्द्र के देहावसान का समाचार भी मिल गया- उसे बचपन मे उमेन्द्र भाईसाहब के साथ बिताये अंतरंग क्षण बार बार याद आते और सुलोचना भाभी को विधवा स्वरूप मे देखने की कल्पना मात्र से उसका हृदय दग्ध हो जाता।


23 मई को जब दिनेश अपने गांव पहुंचा था तो अवसर मिलते ही उसने माॅ से पूछा था,
‘‘ उमेंद्र भाईसाहब वाली भाभी अब कहां रहतीं हैं?’’
‘‘ बा अभागिनी कहां जाय सकत है ? बा के माॅ-बाप तौ हैं नाईं और काट रही है।’’
दो दिन बाद दिनेश मौसा के घर गया। पर उस दिन सुलोचना अपने भैय्या की बीमारी की खबर पाकर अपने माइके चलीं गईं थीं। इसलिये सुलोचना भाभी से मिलने की उसकी लालसा अतृप्त ही रह गई।


हृदय मे चाह होते हुये भी दिनेश दुबारा मौसा के घर न जा सका- एक तो समयाभाव था और दूसरे दुबारा जाने का कोई उचित बहाना भी नहीं था। अमेरिका वापस लौटने के एक दिन पहले उसके मौसा का कोने पर फटा हुआ वह पोस्ट कार्ड आया था। पोस्ट कार्ड पढ़कर दिनेश मार्मिक पीडा़ के आघात से स्तब्ध रह गया था और बिना कुछ बोले उसी मड़हे मे सोने की मुद्रा बनाकर लेट गया था। उसकी मनःस्थििति का अनुमान लगाकर उसकी माॅ भी उसके मड़हे से बाहर चलीं गईं थीं। पर जब कई घंटे तक दिनेश मड़हे से बाहर नहीं निकला, तब माॅ पहले तो एक दो बार उसके कमरे के बाहर ताक झांक करके लौट गईं। फिर जब सांझ ढलने को आई, तो वह चुपचाप आकर दिनेश की बंसखटी पर बैठ गईं और उन्होने अपना हाथ दिनेश के सिर पर रख दिया। दिनेश के द्वारा नेत्र खोलने पर वह धीरे से बोलीं,
‘‘लला, तुम ठीक समझ रहे हौ। अब तुमसै का छिपइबो। हमउूं कौ लगत है कि सुलोचना काउू बीमारी सै नाईं मरी है; बा कौं जहर दै कें किस्सा खतम कर दओ गओ है। लेकिन तुम्हाये मौसा और का करते; बा ने तौ नाक कटाय दई हती। जिज्जी ने एक दांय दबी जुबान सै बताओ हतो कि सुलोचना के लच्छन अच्छे नाईं लगत हैं, सुरेन्द्र /देवर/ सै बहुत हंसत बतियात है। सुनी है कि बा अब दुइ महीना सै पेट सै हती।’’
माॅ की बात सुनकर दिनेश आश्चर्यचकित और हतप्रभ था- क्या सुलोचना भाभी, जिन्होेेने सम्भवतः कभी भी पति-सुख पूर्णता से नहीं प्राप्त किया होगा, का अपराध इतना गम्भीर था कि उन्हें प्राणदंड दे दिया जाये और क्या सुरेन्द्र इतना दोषहीन है कि उस पर आक्षेप भी न लगाया जावे? वह अनायास जेन की स्वतंत्रतापूर्ण जीवन-गाथा से सुलोचना भाभी की जीवन-त्रासदी की तुलना करने लगा, और उसके मन में अपने समाज की नारी को मानवी न मानकर पत्थर की देवी मानने वाली रूढ़ियों से घोर वितृष्णा होने लगी। वह गुमसुम माॅ की ओर देखता रहा और दूसरे दिन चुपचाप अमेरिका वापस चला गया।
Image
Mail your articles to swargvibha@gmail.com or swargvibha@ymail.com

Post Reply