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अविरल अथाह की पुस्तक समीक्षा----डाक्टर प्रणव भारती

Posted: Tue Sep 18, 2018 3:33 pm
by admin
कविता संग्रह अविरल अथाह की पुस्तक समीक्षा
ये लम्हे होते हैं जब संवेदना उमड़-घुमड़ पड़ती है ,मन की हलचल मस्तिष्क के कोने में शोर मचाती है | कभी गुनगुनाती है ,कभी दिल में तरेड़ डालती है | एक चुभन सी महसूस होती है और संवेदना कलम के माध्यम से कागज़ पर उतरने लगती हैं जैसे कोई अपने आँखों के बहते आँसुओं को समेटने की चेष्टा करते हुए कभी रोक पा रहा हो और कभी उन्हें बह जाने देने के लिए बाध्य हो रहा हो |
मानव-मन बड़ा अप्रत्याशित है ,कभी रूखा-सूखा खा कर भी संतुष्ट है तो कभी छप्पन भोग से भी संतुष्ट नहीं हो पाता | संभवत :यह जितना सरल है ,उतनी ही इसमें गूंचें भी पड़ी रहती हैं | बादलों की छाँह से भी इसे कभी शिकायत है तो कभी जलाती ग्रीष्म से भी यह मुस्कुराकर गले मिलता है | यह सारा का सारा अपने आप होता जाता है ,विशेषकर उसके साथ जिसका मन संवेदनशील है |
परिवर्तन
जीवन सत्य है
कौन इसको रोक पाया ?
'अविरल अथाह' कुछ ऎसी ही संवेदनाओं का सम्मिश्रण है | कुछ खट्टी,कुछ मीठी यादों का लम्हों में सिमटा हुआ कविताओं का एक ऐसा दरिया जिसमें न जाने कितनी कितनी पवित्र नदियों व सरोवरों का जल बह रहा है जिसमें श्रीमती प्रभा परीक ने अपनी परछाईं भी देखी है और अपने मन के मौसम भी बदलते हुए देखे हैं | प्रभा लिखती हैं ;
आज़ादी का अर्थ रहा ,एक-दूसरे पर विश्वास
एक साथी के रूप में प्रभा ने अपने पति की निकटता को महसूस करते हुए उनके सानिध्य को दिल की रिसती पीड़ा पर मलहम लगाया जबकि पुत्र विक्रम ने पिता को खुशमिज़ाज़ पाया तो पुत्र शरद ने पिता की स्मृति अपनी भावाभिव्यक्ति से कुछ इस प्रकार की ;
जीवन की जटिलताओं में जब भी मुस्कुराना चाहते हैं
तब पापा आप बहुत याद आते हैं
बिटिया सी पुत्रवधुएँ अनीता और गुंजन भी पिता सरीखे श्वसुर को कैसे याद न करतीं ?
अश्रु नहीं ये शब्द हैं
'पापा क्या समुन्दर से सीखा था आपने जीना
चुपचाप से बहना और मौज में जीना '

संवेदनशील कवि श्री दिनेश परीक लिखते हैं ;
हम मृगतृष्णा में जी रहे हैं
डॉक्टर प्रणव भारती
वास्तव में इस संसार में मनुष्य मृगतृष्णा में ही तो सांसें ले रहा है ,किसीको यह समझ जल्दी आ जाती है तो किसीको देर में और किसीको यह समझ आती ही नहीं | यह सब मनुष्य की संवेदना पर निर्भर करता है

कविताओं के रंग-बिरंगे पुष्प-गुच्छ समेटे इस पुस्तक में प्रभा के स्व.पति श्री दिनेश परीक जी के द्वारा लिखी गई वे अनुभव व अनुभूतियाँ हैं जो प्रभा के लिए खज़ाने से कम नहीं हैं | श्रीमती प्रभा स्वयं एक संवेदनशील लेखिका हैं अत :स्वाभाविक है कि दिनेश जी के द्वारा लिखी गई कविताओं ने उन्हें रोमांचित किया ,उनकी अनुपस्थिति ने उन्हें और भी अधिक संवेदना से परिपूरित किया और उन्होंने दिनेश जी के द्वारा यत्र-तत्र रखे गए पुष्पों को समेटकर एक सुन्दर गुलदस्ते के रूप में प्रस्तुत किया जो वास्तव में उनका अपने पति के लिए एक भावभीनी श्रद्धांजलि के रूप में सुवासित हुआ|
जीवन का सत्य बहुत कड़वा है लेकिन उसे पीना होता है ,साँसों के हिसाब से जीना भी पड़ता है | अश्रु ढुलकते हैं किन्तु उन्हें समेटना भी पड़ता है ,कवि कहते हैं ;
ऐ अश्रु
आ बाहर अब तू
बोझिल मन
कुछ हल्का हो जाए
मानस मंदिर की वेदना
कुछ तो काम हो जाए

ज़िंदगी ठगती है ,लगता है हम मंज़िल के समीप हैं किन्तु ऐसा होता नहीं है ;
सिर्फ़ एक कदम उठा था
राहे शौक में
मंज़िल मुझे मिली थी
पर तमाम उम्र ठगती रही

ज़िंदगी कभी पीड़ा का पिटारा है तो कभी मायूसी का वह दौर जिसमें मन करता है कि अपने दुःख-दर्द किसीके साथ साँझा किए जाएं किन्तु हर बार ऐसा कहाँ हो पाता है ?और ख़ामोशी की चादर ओढ़कर हम बैठे रह जाते हैं | कवि के मन में भी वे दर्द उभरते हैं किन्तु उनकी कलम ठिठक जाती है ,वह उस पीड़ा को उन्हें कागज़ पर उतारने से इंकार कर देती है ;

कुछ ऐसे भी हैं दर्द
कहना ,लिखना मुमकिन नहीं
तभी तो न चाहकर भी हूँ खामोश
ज़्यादा कुछ कहना मुनासिब नहीं
जीवन धूप-छाँह है जो सत्य है ,जो कभी किसी हिंडोले में ऊपर जाता है तो कभी नीचे जाता है | इसीलिए कवि कहते हैं ;

परिवर्तन जीवन सत्य है
कब,कौन ,इसको रोक पाया ?
पल प्रतिपल काल गति को
कब कौन इसको रोक पाया ?

प्रेम के बिना जीवन में कुछ नहीं ,जो कुछ है केवल प्रेम ही तो है | हम सब इस तथ्य से परिचित हैं कि जीवन क्षणभंगुर है उसमें ऐसा कुछ नहीं नज़र आता जो मनुष्य के मन में उत्साह भर सके अत: इन रचनाओं में ढाई आखर प्रेम का भी ज़िक्र हुआ है तो मानस की अशांति का भी ज़िक्र हुआ है |

न आदि न अंत
हम रहते अनभिज्ञ

अपनी लंबी कविता में कवि प्रकृति के,सृष्टि के प्रति चिंतित दिखाई देते हैं,आतुरता से छटपटाते दिखाई देते हैं ;

युगों युगों से अवहेलना झेल
ये शाख पत्ते
वृक्ष और फूल
अबोले मूक थे
करते सर्वस्व दान
पर इनका कौन रखता है ध्यान ?
आज हम जिस स्थिति पर पहुंच गए हैं ,वह मनुष्य की ही करामातें हैं | प्रकृति को किस प्रकार रौंदा जा रहा है कवि इस ओर भी ध्यान दिलाता है | मानव की भटकन से भी कवि संत्रासित है किन्तु वह इन अंधेरों के बीच आशावान भी दिखाई देता है ;

प्रेम बांटूं थोड़ा सा नि :स्वार्थ
आज अँधेरा है कल सवेरा होगा

आसमान के तारों से संवाद करता हुआ कवि कहता है , एक संवेदनशील कवि की छटपटाहट देखें ;
मेरी मंज़िल कहाँ गई
मेरा कहाँ ठिकाना है ?

कवि दिनेश परीक एक पारिवारिक व्यक्ति हैं जिनके लिए प्रत्येक संबंध का जुड़ाव दिल से है | अपने साथी के हाथों में हाथ डाले साथ चलने की बात करते हुए कवि कहता है ;

जीएं भी साथ
मरें भी साथ
तमन्ना यही है
दिल में आज

ऐसा प्रतीत होता है कि कवि की संवेदना उसे झंझोड़ती रहती है ,

अंजुली वही ,कागज़ वही
फिर भी लेखनी क्यों रोती है
यह समझकर तू संतोष कर ले
होनी होकर रहती है

इस संतोष के साथ वह जीवन की सच्चाई से भी अवगत हैं जो बड़ी शिद्द्त से लिखते हैं ;

कभी किसीके साथ की आदत मत डालो
कब बिछड़ जाए ज़िंदगी ही तो है

किन्तु फिर भी जीवन की सच्चाई निम्न शब्दों में उनकी कलम से उतर ही जाती है ;

जीव सत्य,जीवन सत्य
जड़ सत्य चेतन सत्य
जन्म सत्य मृत्यु सत्य
मिलन सत्य विछोह सत्य

और

शब्द सीमाओं से
होती है परे
भावनाओं की अभिव्यक्ति
पढ़कर बरबस ही स्व. महाकवि नीरज की चार पंक्तियों का स्मरण हो आता है ;
शीब्द तो शोर है ,तमाशा है
भाव के सिंधु में बताशा है
मर्म की बात मुख से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है

उपरोक्त संवादों के अतिरिक्त कवि आज के परिवेश से भी बहुत द्रवित दिखाई देते हैं,कितनी सत्य व करुणापूर्ण बात वे कह बैठते हैं ;

भूखे बच्चे क्रंदन करते इस ओर
पोषण होता नहीं वादों
सहानुभूति के टुकड़ों से
पोषण तो होगा
मात्र रोटी के चंद टुकड़ों से

कुछ शब्द-चित्र नीचे भी -------

बदलते परिवेश में
सब विपरीत चल रहे
साँप बांबी को छोड़े
आस्तीन में पल रहे

शब्द नि:शब्द हो गए
देख छाती लाल

देश के प्रति कवि की संवेदनाएं कैसे प्रस्फुटित होती हैं ;
भूगोल की बेदी
मानवता बलि हो गई
कितनी राखी सूनी हो गईं
सूनी गोद हो गई
माँ की माँग पर माँगें सूनी हो गईं
देखें ,कवि किस प्रकार से समाज के प्रत्येक पहलू से प्रभावित है ;
शेयर,चारा ,बोफर्स
व तहलका
या अन्य कांड सब चलता है
इन सबके चलते
मंत्रियों का गौरव
अदभुत रूप से खिलता है
पीड़ित है कवि आतंकवाद के साए से ,दुखी है -----
आतंकवाद सदा
उद्देश्यविहीन होता है
आतंकवादी तो
परिणाम विहीन होता है
आतंकवादी तो
पागलपन में लीं होता है


इस द्रवित परिवेश में भी कवि के मन में आस की किरण झाँकती दिखाई देती है ,

खंडित हो यह बर्बर
आतंक का साया
मंडित हो अम्न-चैन
खिले पुष्प अलसाया




कवि को बिछड़ा प्यार भी याद आता है

आज मुद्द्त के बाद
तुम्हारी यद्
बिछड़े प्यार की याद
तड़पा रही है
डाक्टर प्रणव भारती

’’अविरल अथाह ’’ स्वर्गिय दिनेश पारीक की कविताओं का संकलन
पुस्तक अविरल अथाह एक संवेदनशील कवि की कविताओं का संकलन है जिसने आजीवन हँसना, हँसाना ही अपने जीवन का उदेश्य रखा, अचरज है कि इतनी संवेदन शील कविताओं को लिखते समय अपने आप को किस हद तक गंभीर बनाये रखा कि मानविय संवेदनाओं से ओत प्रोत हर कविता उनके जीवन की कविता सी लगती है। पुस्तक ’’अविरल अथाह’’ स्वर्गिय दिनेश पारीक की कविताओं का संग्रह है जो उनके जीवन के उतार चढाव को दर्शाता ंहर कविता में एक संदेश है ’’जीवन से भरी बातें तेरी मजबूर करे जीने के लिये’’ अपने चारों और के वातावरण और पारीवारिक जीवन के विभिन्न पहलूओं को छूती भावविभोर करती कवितायें सोचने को मजबूर करती है। जीवन की इतनी विषमताओं के बावजूद सदा हँसते हँसाते रहना कितना कठिन है यह कवि ह्रदय ने अपनी कविताओं के माध्यम से समझा दिया है। पुस्तक की एक एक कविता संदेश देती है और जीने को मजबूर करती है
लेखक शरद