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‘रहें मस्त, व्यस्त एवं स्वस्थ‘

 

 

 

महाभारत महाकाव्य में युधिष्ठर-यक्ष का संवाद ज्ञान एवं अनुभव का ऐसा अर्क है जिसकी महत्ता तब भी थी, आज भी है एवं आगे भी अक्षुण्ण रहेगी। क्षर-अक्षर में ज्ञान ही तो अक्षर है, अमृत है। सुअवस्थित बुद्धि ही तो मनुष्य की हर समस्या का समाधान प्रशस्त करती है। इन्हीं यक्ष-प्रश्नों में एक प्रश्न था , युधिष्ठर ! ‘इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या हैं‘ का युधिष्ठर ने क्या खूब उत्तर दिया था कि मनुष्य नित्य अपनों को मरते देखता हैं लेकिन इस सत्य कों हृदयंगम ही नहीं करता कि एक दिन वह भी मरेगा। संपूर्ण जीवन मनुष्य इस महासत्य को मुस्तैदी से झुठलाता रहता है। हाऊ कैन आई डाई‘ का अहंकार उसकी जीवनशैली में एक ऐसी हवश पैदा करता है कि वह बेतहाशा भागता ही रहता है। वह उम्र तो पूरी करता है लेकिन जीवन नहीं जी पाता। अभी कमा लूँ-अभी कमा लूँ करते-करते जीवन उसके हाथ में से मुट्ठी की रेत तरह चला जाता है। माया की इस अंधी दौड़ में वह ‘अमूल्य‘ को खो देता है एवं फिर माया के ढेर पर बैठा ताउम्र उसके लिए सिसकियाँ भरता है जो उसके हाथ से चला गया। इंसान भी क्या चीज है दौलत के लिए सेहत खोता है फिर सेहत पाने के लिए दौलत खोता है। जीता इस दंभ में है जैसे कभी मरना ही नहीं एवं मरता ऐसे है जैसे कभी जिया ही नहीं। अभी कुछ वर्ष पूर्व आई फिल्म ‘थ्री इडियट्स‘ का पोपुलर गीत ‘सारी उम्र मर-मर के हम जीए‘.......... मनुष्य की इस बैकसी का इज़हार है।

 

 

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन‘ अर्थात ‘डबल्यूएचओ‘ निश्चय ही बधाई का पात्र है कि उन्होंने इस वर्ष यानि 2012 को जिंदगी के इसी फलसफे को समर्पित किया है कि हम जब तक जीए सुख से जीए। स्वस्थ रहें, व्यस्त रहें एवं मस्त भी रहें। ‘डबल्युएचओ‘ ने हर उम्र के लोगों को स्वस्थ रहने का आग़ाज किया है। उनका यह स्लोगन कि ‘उम्र में जीवन जोड़े जीवन में उम्र नहीं‘ अर्थात ‘एड लाइफ टू इयर्स ‘ निश्चय ही दिलचस्प भी है एवं गौरतलब भी। ‘डबल्युएचओ‘ अपनी स्थापना वर्ष 1948 से ही हर वर्ष तंदुरूस्ती को दिशा देने के लिए ऐसा ही एक स्लोगन प्रस्तुत करता है जिससे पे्ररित होकर विश्वभर की सरकारें उस और उन्मुख होती है।

 


गत वर्षो में कुछ परिचित लोगों के असामयिक निधन ने मुझे भी इस विषय पर चिंतन कं लिए उद्वेलित किया है। इन मरने वालों में दो-तीन तो मात्र 30-40 उम्र वर्ग से थे। माना कि मृत्यु सर्वथा अनिश्चिित है, मौत के रथ नहीं जुतते एवं यह भी हम देखते आये हैं कि मौत बालक हो, युवा अथवा वृद्ध, राजा हो या रंक किसी की सगी नहीं तथापि गहराई से अनुसंधान करने पर हम पाते हैं कि असामयिक मृत्यु के प्रकरणों में विशेषतः युवा एवं अधेड़ वर्ग में कहीं न कहीं मरने वालों की जीवनशैली भी उत्तरदायी है। मरने वाले की आय की भरपाई तो बीमा इत्यादि से हो जाती है लेकिन ऐसे असामयिक मरने वाले का दंश एवं कमी ताउम्र पीछे जीवित परिवार वाले भुगतते हैं। मैं तो कहता हूँ शरीर के प्रति उपेक्षा का भाव मात्र लापरवाही नहीं अधर्म है। हमारी श्रुतियों ने चीख-चीख कर कहा है‘ ‘शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्‘ यानि शरीर ही वह आधार है जिससे हम धर्म को साध सकते हैं अर्थात हमारे आध्यात्मिक उत्कर्ष का मार्ग भी शरीर से ही है। ऐसे में शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य है। हमारी सर्वकालिक लोकोक्ति ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख है धन और माया‘ इसी महासत्य का उद्घोष है। ऐसे में हमारे स्वास्थ्य के प्रति हम क्यों लापरवाह बनें, जब तक जीए स्वस्थ होकर क्यों न जीए? आखिर हमारा अच्छा स्वास्थ्य हमें ही तो आनन्द देगा। हमारा बुरा स्वास्थ्य हमें तो कष्ट देगा ही, दिन-दिन हमारे परिवार को भी आशंकित करेगा।

 


मैं मेरी बातों को स्वयं मुझ पर ही कसूं तो कह सकता हूँ कि आज पचपन पार हूँ एवं अब तक करीब-करीब स्वस्थ रहा हूँ एवं इसका एक मात्र कारण मेरा नित्य कसरत करना है। गत चालीस वर्ष से मैं नित्य 15 मिनट का एक ‘ सूर्य नमस्कार‘ करता हूँ एवं इस छोटी-सी कसरत पर मैं इतना नियमित हूँ कि अगर मुझे शादी, समारोह एवं मौत आदि में भी जाना पड़े तो बंद कमरे में यह 15 मिनट निकाल लेता हूँ। यहा तक कि ट्रेन यात्रा में भी प्लेटफार्म पर उतरकर यह क्रिया कर लेता हूँ। इस छोटी-सी कसरत के अतिरिक्त गत वर्षों में मैंने स्वीमिंग की है, पचास बच्चों को तैरना सिखाया है। मैरी तैनाती में जहाँ तैरना संभव नहीं था वहाँ टीटी, बैडमिंटन आदि खेलों में जो भी बन पड़े मैंने वर्षों खेले हैं। आज भी नित्य शाम रोटरी क्लब में मेरे हमवय मित्रों के साथ टीटी खेलता हूँ एवं मैं यह बताना चाहता हूँ कि इन्हीं आदतों के चलते मेरे हमवय मित्र भी अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ है। मैं मेरे स्वर्गीय पिता का आभारी हूँ जिन्होंने बचपन में ही मुझ में इन गुणों का प्रादुर्भाव कर दिया था। तब घर की हालत माली थी तो हम ऐसे खेल खेला करते थे जिन पर कोई खर्च नहीं आता था जैसे कबड्डी, खो-खो, तैरना, योगा, घूमना, आदि। स्वस्थ एवं मस्त होने के लिए ऐसी भावना चाहिए, धन नहीं।

 

 

स्वस्थ रहने का एक और समीकरण है जीवन में हर हाल में खुश रहने का माद्दा। यह जीवट फकत आपके दृष्टिकोण एवं परिपक्वता पर निर्भर करता है। जीवन में सबके सुख-दु:ख समान ही है, सुख-दुःखों के रूप भिन्न है लेकिन कुछ लोग अकारण डाह में रहते हैं एवं नित्य स्वयं को जलाते रहते हैं। हम कर्म करें, कर्म की ललक भी हो, लेकिन असंतोष को जीवन में प्रविष्ट न होने दें। ‘सेडिस्ट‘ अर्थात परपीड़क एवं ‘मेसाचुईस्ट‘ अर्थात स्वपीड़क स्वयं को तो दुःख देते ही हैं अपने आस-पास के वातावरण को भी तनावग्रस्त कर देते हैं। आप गौर से देखें तो आपके पास भी खुदा की हजार नियामतें हैं। ‘होडाहोड गोडाफोड़‘ में जीवन को तबाह न करें। जो कुछ मिला है उसी में मस्त होनें का प्रयास करें। संसार में आधे लोग तो इसलिए दुःखी है कि उनके पड़ौसी सुखी है। आप ‘मिदास टच‘ से दूर रहें। गाँधी की यह उक्ति गौरतलब है कि ‘ ईश्वर ने हमारी जरूरतों का पेट भरने को बहुत कुछ दिया है लेकिन ईश्वर भी लोभ का पेट नहीं भर सकता।‘ आज ‘ साईकोसोमेटिक डीजिजेस‘ अर्थात मनोजन्य रोग जिस तरह से बढ़ रहे हैं यह नितांत आवश्यक हो गया है कि हम हमारी जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन करें। हृदयरोग, उच्च रक्तचाप, कोंस्टीपेशन, अल्सर, अवसाद एवं अन्य अनेक रोगों का तो मूल कारण ही हमारा दुष्चिंतन है। ‘ पुटिया ‘ पक्षी की तरह हम अकारण दबाव में न रहें। पुटिया आसमान की तरफ पांव करके लेटता है। कहते हैं सदियों पहले उसे भ्रम हो गया था कि आसमान उसी के पांवों पर रूका है अन्यथा नीचे गिर जाएगा। इस पीर का शिकार पुटिया ही नहीं बड़े-बड़े राजनेता, अधिकारी एवं मनस्वीजन तक हैं जो सोचते हैं कि दुनिया उनके दम पर चल रहीं है। दुनिया पहले भी चल रही थी, आज भी चल रही है एवं तब भी चलेगी जब हम नहीं होंगे।

 

 

इन सबसे इतर फिलहाल हम इस शानदार गीत के अंतरे का आनन्द लें जिसमें एक उस्ताद अपने शार्गिद को हसीनाओं को खुश करने के अनेक नुस्खांे में एक नुस्खा ‘नित उठ कसरत करने का‘ भी बताता है। हमारा ‘रोमांटिसिज्म‘ हर पल जिंदा रहे। यह बात हर वय पर लागू होती है। ‘मोहब्बत‘ का ज़ज्बा हर उम्र में बनाये रखें। प्रेम असंख्य रोगों को दूर करने वाला रामबाण रसायन है। बुड्ढे कभी-कभी बुढियों को छेड़ लिया करें। बहरहाल हम वर्ष 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘शार्गिद‘ के इस गीत का मजा लें। यह गीत ‘मजरूह‘ ने लिखा था एवं इसकी धुन लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की थी-

 

 

सबसे पहले सुनो मियाँ, करके वर्जिश बनो जवां
चेहरा पाँलिश किया करो, थोड़ी मालिश किया करो
स्टाईल से उठे कदम, सीना ज्यादा तो पेट कम
एैकिब ला उजले बालों को, रंग डालो बन जाओ गुलफ़ाँम
बड़े मियाँ दिवाने ऐसे न बनो
हसीना क्या चाहती है हम से सुनो.......



लेखक

(हरिप्रकाश राठी)

 

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