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एक नव प्रकल्प के निर्माण का दिन


-आचार्य श्री महाप्रज्ञ-

इस दुनिया में दो तरह के संयम बहुत कठोर हैं-एक आहार का संयम और दूसरा वाणी का संयम। वाणी का भी वर्षीतप होना चाहिए। आदमी छह महिना बोले, छह महीना न बोले और वाणी का एकांतर तप करे। एक दिन बोले, दूसरे दिन मौन रहे। यह वर्षीतप भी एक कठोर वर्षीतप होगा। इस तरह वर्षीतप की भी दो श्रेणियां हो जाएंगी-आहार का वर्षीतप और वाणी का वर्षीतप।
अक्षय तृतीया का दिन एक पवित्र दिन है। किन्तु, एक कमी लग रही है कि हमने आदि तीर्थंकर ऋषभ की तपस्या को तो पकड़ लिया और ऋषभ के समग्र जीवन पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। हमारे सामने ऋषभ ही ऐसे जैन तीर्थंकर हैं, जिनका जीवन समग्र है। ऋषभ ऐसे तीर्थंकर हैं, जिन्होंने समाज के लिए अपना जीवन लगाया और फिर बाद में साधना में भी अपना जीवन खपाया। उनके जीवन में समग्रता है।
यह दिन वर्षीतप के ‘पारणे’ का दिन है, ऐसे ही इसका दूसरा पक्ष ‘अहिंसोन्मुखी समाज व्यवस्था’ का दिन भी होना चाहिए। ‘अहिंसक समाज’-शब्द जचता नहीं है। क्योंकि जहां समाज है, वहां हिंसा तो अनिवार्य हो जाती है। अतः ‘अहिंसोन्मुखी समाज’ नाम दिया जा सकता है, क्योंकि हमारी अभिमुखता सदा अहिंसा की ओर ही है। हिंसा तो चाहे-अनचाहे करनी पड़ती है। भगवान ऋषभ ‘अहिंसोन्मुखी समाज व्यवस्था’ के प्रथम सूत्रधार माने जा सकते हैं।
हम इस बात को न भूलें कि अभाव में आदमी का स्वभाव भी बिगड़ जाता है। अभाव की स्थिति में कोई वैसा नहीं रह जाता, जैसा पहले से रहता आया है। भगवान ऋषभ का समय यौगलिकों का था। उस समय के यौगलिकों का स्वभाव भी बिगड़ गया। बहुत सारे उतार-चढ़ाव आए, बहुत कुछ परिवर्तन हुआ। आखिर यह व्यवस्था की गई कि-‘तुम किसी पर अधिकार मत करो।’-किन्तु, ऐसी व्यवस्था ज्यादा दिन तक नहीं चली।
जब ऋषभ ने अराजकता का दृश्य देखा तो यह समझ लिया कि ऐसे काम नहीं चलेगा। भूख की समस्या हिंसा को जन्म दे रही है, तब ऋषभ ने उनको खेती करना सिखाया। खेती उस समय लोगों के लिए बिल्कुल नया प्रयोग था। कुंभकारों को मृत्तिका से बरतन बनाना सिखाया। बैलगाड़ी की रचना की गई। माना जाता है कि जिस दिन ‘पहिए और धुरी’ का विकास हुआ, विज्ञान की दिशा में वह पहला कदम था। कहा जा सकता है कि विज्ञान का आदि स्रोत पहिया साबित हुआ। विकास का माध्यम है-गति और गति का माध्यम है पहिया। आज आॅटो, यान और अंतरिक्ष-यान तक की रचना हो चुकी है, किन्तु ‘पहिए’ की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई। ‘पहिया इनमें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ‘पहिए’ के रूप में ऋषभ द्वारा किया गया विकास सबसे महत्वपूर्ण विकास था।
ऋषभ का एक अर्थ है-बैल और दूसरा अर्थ है-ऋषभ तीर्थंकर। ऋषभ का जीवन एक समग्र जीवन है। उन्होंने भौतिक जगत का विकास किया, तो अध्यात्म का विकास भी किया। भारतीय संस्कृति में ‘आत्मा’ को सर्वोपरि सत्य माना जाता है। आत्मा की खोज को एक महत्पूर्ण खोज माना जाता है। आत्मा की खोज किसने की? यौगलिक युग में न तो लोग दर्शन को जानते थे, न शास्त्र ही जानते थे। न विज्ञान से उनका कोई परिचय था, न उनके पास कोई विकसित भाषा थी। सब एक वैयक्तिक अवस्था में जी रहे थे। प्रकृति पर आधारित जीवन था। आवश्यकताएं बहुत सीमित थीं। इसलिए व्यवस्था और अनुशासन की कोई जरूरत नहीं थी। न कोई राजा था, न कोई प्रजा। सब पूर्ण स्वतंत्रता का उपभोग कर रहे थे।
जब आवश्यकताएं बढ़ने लगीं और साधन सीमित होने लगे, तो परिवर्तन शुरू हुआ। जब तक कल्पवृक्षों से आवश्यकताएं पूरी होती रही, तब तक शांति से सब कुछ चलता रहा। जैसे ही वृक्ष कम हुए, उनकी क्षमता कम हुई-संघर्ष उभरने लगा। यहीं से राजा और शासक का उद्भव होता है।
ऋषभ का जीवन एक महत्वपूर्ण अध्याय है, पर जैनों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। न समाज व्यवस्था के सूत्रों की ओर ध्यान दिया और न ‘अहिंसोन्मुखी समाज व्यवस्था’ की ओर ध्यान दिया। ‘अहिंसोन्मुखी परमो धर्मः’ का नारा तो बहुत लगाया जाता है, किन्तु जुलूस की समाप्ति के बाद यह नारा भी झंडों, बैनरों की तरह संभाल कर रख दिया जाता है। इस बात पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता कि जिसे परमधर्म कह रहे थे, उसके साथ हमने वही किया जो गर्म कपड़ों के साथ करते हैं। सर्दी गई और उन्हें आगामी एक वर्ष के लिए संभाल कर रख दिया जाता है।
अक्षय तृतीया का दिन, वर्षीतप के ‘पारणे’ का दिन है। भगवान ऋषभ की स्मृति के साथ जुड़ा हुआ दिन है। यदि हम गहराई से ऋषभ का अध्ययन करें तो वर्तमान की बहुत सारी समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है। महावीर का जीवन संयम का जीवन है, त्याग का जीवन है, निवृत्ति का जीवन है, उसे हम सर्वांगीण व्यवस्था का जीवन नहीं कह सकते, पर जहां समाज व्यवस्था का जीवन है, वहां तो ऋषभ के जीवन को ही आदर्श के रूप में सामने रखना पड़ेगा। उनके जीवन का एक बड़ा भाग ‘अहिंसोन्मुखी समाज की व्यवस्था’ के प्रथम कर्णधार का जीवन है और उनके जीवन का दूसरा भाग ‘आत्मोन्मुखी साधक’ की उत्कृष्ट साधना का जीवन है।
अगर ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें कि सबसे पहले आत्मा का दर्शन किसने दिया? श्रीमद्भागवत, पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथ एक स्वर से कहते हैं कि आत्मा का ज्ञान ऋषभ को था। उनके सौ पुत्र थे। उनके लिए भी कहा गया-‘आत्मविद्या विशारदा’-वे सौ पुत्र आत्मविद्या विशारद थे।
भारतीय चिंतन दो व्यवस्थाओं में समाहित है। हम केवल पदार्थवादी नहीं हैं, केवल भौतिकवादी नहीं हैं। जीवन की आवश्यकता की पूर्ति में ही दिन-रात लगे रहने वाले कीड़े-मकोड़े नहीं हैं, बल्कि जीवन की आवश्यकता को पूरा इसलिए करते हैं कि जिससे मोक्ष की साधना और आत्मोपलब्धि हो सके। हमारा उद्देश्य आत्मा और उसकी पवित्रता तक पहंुचना है।
साधना कौन कर सकता है? अध्यात्म का विकास कौन कर सकता है? वही व्यक्ति कर सकता है, जिसके सामने रोटी का प्रश्न न हो, न कुटुम्ब पालन की कोई चिंता हो। समाज की व्यवस्था अच्छी हो, तभी कोई साधना के क्षेत्र में उतर सकता है। कठिनाई यह है कि हम एक पक्ष को भुला देते हैं। धर्म करो, साधना करो, नैतिकता का अनुपालन करो-इस पक्ष को तो उजागर कर देते हैं, किन्तु उनमें जो बाधक तत्व हैं-उनकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। अध्यात्म के विकास में चिंतन का यह अधूरापन बहुत बाधक है। अध्यात्म-साधना के क्षेत्र में अधिकतर वे लोग ही आगे बढ़े, जो जीवन में पूर्ण रूप से निश्चिंत हैं।
हम ¬ऋषभ को, उस महापुरुष की स्मृति को सामने रखें, जिसने समाज के सामने पहली बार समग्रता का दर्शन रखा। केवल पदार्थवादी होना जीवन की समग्रता नहीं है। और केवल आत्मवादी होना भी जीवन की समग्रता नहीं। पदार्थ के बिना जीवन का काम नहीं चलता और आत्मा के बिना जीवन पवित्र नहीं बनता। दोनों जब मिलते हैं, तो ही परिपूर्ण बात होती है।
हम भविष्य के लिए कोई ऐसी कल्पना करें कि ऋषभ के सर्वांगीण व्यक्तित्व और उनके ‘अहिंसोन्मुखी समाज व्यवस्था’ पर कोई न कोई विशेष आयोजन हो, जो अहिंसक समाज की रचना और श्रेष्ठ समाज की रचना में सहायक सिद्ध हो। अक्षय तृतीया का दिन वर्षीतप करने वालों के लिए तो ‘पारणे’ का दिन है, पर आज का दिन उपवास का दिन भी होना चाहिए। समाज व्यवस्था के उपवास का दिन और वर्षीतप के ‘पारणे’ का दिन-इन दोनों दिनों की युति हम कर सकें, दोनों का समन्वय कर सकें-तो आज का दिन न केवल तपस्वियों का दिन होगा, बल्कि पूरे समाज का दिन होगा।
आज का दिन किसानों के लिए महत्व का दिन हैं कुंभकारों के लिए बड़े महत्व का दिन है। शिल्पकारों के लिए भी आज बहुत महत्व का दिन है। बैलों के लिए भी बड़े महत्व का दिन है, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले जीवन को चलाने का साधन दिया था। यह ऐसा दिन है, जिसके एक-एक पक्ष पर विचार करना चाहिए।
विचारशील और बौद्धिक व्यक्तियों को मिलकर एक नया प्रकल्प समाज के सामने प्रस्तुत करना चाहिए, जिससे ‘अहिंसोन्मुखी समाज’ के निर्माण का एक ढांचा बनाया जा सके। प्रस्तुतिः ललित गर्ग

प्रेषकः

(ललित गर्ग)

 

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