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होली का पावन त्योहार

 

 

holi

 

 

होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है .इसके एक दिन पहले रात में ‘’होलिका –दहन ‘’किया जाता है .ये दोनों ही दिन प्रेरणा ,उर्जा , उत्साह एवम सामाजिक बुराइयों के विनाश का प्रतीक है .
होली एक सामाजिक पर्व है जिसमे समाज के विभिन्न वर्ग के लोग सामूहिक रूप से एकत्र होकर मनाते है .मानव और प्रकृति दोनों ही अपने –अपने ढंग से रंग भरते है . जिस तरह मनुष्य इस उत्सव में अपने विचार और भावनाओ को मिलाता है उसी तरह प्रकृति चारों ओर रंग- बिरंगे फूलों के द्वारा अपनी सुरभि बिखेरता है .आनंद एवम मस्ती की खुमार सी छाई रहती है .
होली हो या कोई भी त्योहार भारतीय सस्कृति के आवश्यक अंग माने गए है .इन्ही त्योहारों के द्वारा विश्वास ,विचार और धार्मिक आचार –व्यवहारका विस्तार होता है .मन एवम आत्मा एकता के सूत्र में बंधने लगते हैं.अध्यात्मिक ऊर्जा हमारे देश के कण –कण में मौजूद है .सदियों से धार्मिक परम्परा में पर्व – त्योहार इस तरह रचे बसे हैं कि पूरे वर्ष-भर चलती रहती है .

 

वैदिक-ऋषियों और जीवन-दर्शन के निष्णात मनीषियों की मान्यता है कि-----
‘’ सृष्टि आनंद में स्थित है और आनंद में ही प्रवेश करती है. अज्ञान ,दुःख ,भय ,शोक और मोह की निवृति के बाद जिस आनंद की प्राप्ति होती है, वही त्योहार है . भारतीय मानव संस्कृति जीवन के आस्थामय पक्ष को महत्व देती है .मन में उमंग व जीवन में रंग भरने वाली सोच को जन्म देती है ताकि त्योहारों की दस्तक होते ही ऐसा महसूस होने लगे की जीवन स्वयं एक उत्सव है .’’
त्योहारों का उदे्दश्य मनुष्य को सामाजिक बनाना है .आनंद के क्षण तभी सार्थक होंगे जब साथ मिलकर कोई पर्व मनाया जाय .परन्तु समय अत्यधिक कीमती हो गया है .एक दूसरे से मिल नहीं पाते है जिस वजह से मन में ग्रंथियां पड़ जाती है .
पौराणिक काल में भक्त प्रह्लाद के आह्वान पर भगवान नृसिंह प्रकट हुए थे .होलिका को जलाने के लिए प्रह्लाद के संकल्प ने होली के पर्व को महान पर्व का रूप दिया है .कुविचार, दुर्भाव व द्वेष आदि को जलाने के लिए ही होलिकोत्सव मानते है .परन्तु होली की धधकती अग्नि में जलाने के लिए साहस की कमी हो गयी है. अच्छाई के प्रति सम्मान घट रहा है,विकृत अहंकार हावी हो रहा है .भय और आतंक के साये में होली के खुशनुमा रंग बदरंग हो गया है. इस पर्व की दुर्दशा-दुर्गति कर दी गयी है .हानिकारक रंगों का इस्तेमाल होने लगा है .
प्रत्येक वर्ष होली आती है और चली जाती है.होली सभ्य समाज का सुन्दर सा महोत्सव है ,जहाँ सभी अपने भेद-भाव को भुलाकर आपस में गले मिलते है.होली के पावन पर्व में समय के साथ जो भी विकृतियाँ आई है उसे खत्म करने की कोशिश करें .जोश-जज्वा एवम साहस के साथ सरावोर होकर होली का त्योहार मनाएं.

 

एक गुहार है इस होली में
स्व दुर्गुण- द्वेष जलाना है
जोश उमंग साहस के रंग से
मुर्च्छित जन को जगाना है
आस-उल्लास-विश्वास से
सद्गुण को अपनाना है
रोम-रोम में समरसता का
रंग वासंती मिलाना है .

 

 



भारती दास

 

 

 

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