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फ्रेण्डशिप दिवस

मित्रता को जीवन में सार्थक रूप में स्थापित करें


- ललित गर्ग -

 


भारतीय संस्कृति और इतिहास में त्योहारों की एक समृद्ध परम्परा है। किसी-न-किसी धर्म और सम्प्रदाय से जुड़कर वर्ष का हर दिन कोई-न-कोई पर्व, त्योहार या दिवस होता है। विगत दो दशक में हमने अनेक नये या आयात किये हुई पर्व एवं दिवसों को हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है। उन्हीं मंे एक महत्वपूर्ण दिवस है फ्रेण्डशिप दिवस, जो हर वर्ष अगस्त माह के पहले रविवार को मनाया जाता है। फ्रेण्डशिप दिवस यानी मित्रता दिवस।
मित्रता शब्द बड़ा व्यापक और मोहक है। कितना प्यारा शब्द है यह। तीन अक्षरों का एक शब्द समूचे संसार को अपने साथ समेट लेने वाला, दूसरों को, अनजान-अपरिचितों को, अपने निकट लाने वाला यह अचूक वशीकरण मंत्र है। मित्रता हमारी संस्कृति है। संपूर्ण मानवीय संबंधों का व्याख्या-सूत्र है।
वास्तव में मित्र उसे ही कहा जाता है, जिसके मन में स्नेह की रसधार हो, स्वार्थ की जगह परमार्थ की भावना हो, ऐसे मित्र संसार में बहुत दुर्लभ हैं। भर्तृहरि से पूछा गया-आप मित्र की इतनी महिमा गाते हैं तो जरा बताइए मित्र कैसा होना चाहिए? मित्र में क्या विशेषता होनी चाहिए?
भर्तृहरि ने मित्र के लक्षण बताते हुए कहा है-जो अपने मित्र को पाप कार्यों से दूर करे। पापाचरण करते हुए रोके, सोचे यदि यह पाप करेगा तो इसकी आत्मा का पतन हो जायेगा। मित्र की आत्मा का उत्थान करने की भावना से पापों में हटाकर कल्याणकारी कार्यों में लगाएं। उसके हित की चिंता करे। मित्र के अवगुणों पर पर्दा डाल दे। कहीं भी मित्र की बुराई देखें, उसे हटाने की कोशिश करें और उसके गुणों को प्रकट करें। मौका मिलते ही मित्र के गुणों की प्रशंसा, उसकी बड़ाई, यश-कीर्ति करता रहे। मित्र को आपत्ति में फंसा देखकर, मित्र पर आयी विपत्ति देखकर उसका साथ नहीं छोड़े, अपितु उसे विपत्ति से बचाने का प्रयास करे और समय पर सहायता करे, अपने प्राण हथेली पर रखकर भी मित्र के प्राणों की, मित्र की कीर्ति और मित्र के हितों की रक्षा करे उसे ही सच्चा मित्र कहा जाता है।
क्षणिक और स्वार्थों पर टिकी मित्रता वास्तव में मित्रता नहीं, केवल एक पहचान मात्र होती हैं ऐसे मित्र कभी-कभी बड़े खतरनाक भी हो जाते हैं। जिनके लिए एक विचारक ने लिखा है- ‘‘पहले हम कहते थे, हे प्रभु! हमें दुश्मनों से बचाना परन्तु अब कहना पड़ता है, हे परमात्मा, हमें दोस्तों से बचाना।’’ दुश्मनों से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं दोस्त। मित्रता दिवस दोस्ती को अभिशाप नहीं, वरदान बनाने का उपक्रम है।
मित्रता दिवस मनाने का मूल हार्द यही है कि दोस्ती में विचार-भेद और मत-भेद भले ही हों मगर मन-भेद नहीं होना चाहिए। क्योंकि विचार-भेद क्रांति लाता है जबकि मन-भेद विद्रोह। क्रांति निर्माण की दस्तक है, विद्रोह बरबादी का संकेत।
स्वस्थ निमित्तों की शृंखला में मित्रता का भाव बहुत महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति बिना राग-द्वेष निरपेक्ष भाव से सबके साथ मित्रता स्थापित करता है, सबके कल्याण का आकांक्षी रहता है, सबके अभ्युदय में स्वयं को देखता है उसके जीवन में विकास के नए आयाम खुलते रहते हैं।
मित्रता का भाव हमारे आत्म-विकास का सुरक्षा कवच है। आचार्य श्री तुलसी ने इसके लिए सात सूत्रों का निर्देश किया। मित्रता के लिए चाहिए-विश्वास, स्वार्थ-त्याग, अनासक्ति, सहिष्णुता, क्षमा, अभय, समन्वय। यह सप्तपदी साधना जीवन की सार्थकता एवं सफलता की पृष्ठभूमि है। विकास का दिशा-सूचक यंत्र है।
प्रश्न उभरता है, आज मनुष्य-मनुष्य के बीच मैत्री-भाव का इतना अभाव क्यों? क्यों है इतना पारस्परिक दुराव? क्यों है वैचारिक वैमनस्य? क्यों मतभेद के साथ जनमता मनभेद? ज्ञानी, विवेकी, समझदार होने के बाद भी आए दिन मनुष्य लड़ता झगड़ता है। विवादों के बीच उलझा हुआ तनावग्रस्त खड़ा रहता है। न वह विवेक की आंख से देखता है, न तटस्थता और संतुलन के साथ सुनता है, न सापेक्षता से सोचता और निर्णय लेता है। यही वजह है कि वैयक्तिक रचनात्मकता समाप्त हो रही है। पारिवारिक सहयोगिता और सहभागिता की भावनाएं टूट रही हैं। सामाजिक बिखराव सामने आ रहा है। धार्मिक आस्थाएं कमजोर पड़ने लगी हैं। आदमी स्वकृत धारणाओं को पकड़े हुए शब्दों की कैद में स्वार्थों की जंजीरों की कड़ियां गिनता रह गया है।
मित्रता के लिये निस्वार्थ एवं समर्पण भावना जरूरी है। ऐसे परिवेश और परिस्थिति में मित्रता कभी नहीं विकसित हो सकती जहां स्वार्थों की दीवारें समझ से भी ज्यादा ऊंची उठ जाएं। विश्वास संदेहों के घेरे में घुटकर रह जाए। समन्वय और समझौते के बीच अहं आकार खड़ा हो जाए, क्योंकि अहं की उपस्थिति में आग्रह की पकड़ ढ़ीली नहीं होती और बिना आग्रह टूटे सत्य तक पहुंचा नहीं जा सकता। इसलिए जरूरी है मित्र-भाव की प्रगाढ़ता से हम उन कारणों की खोज करें जो इस दिशा में बाधक तत्व हैं।
मित्रता का संबंध धागा टूटता है आपसी समझ के अभाव में। व्यक्ति के बीच जब विश्वास प्रश्नों के घेरे में आ खड़ा होता है तो मन शंकाओं के ऐसे रंग में रंग जाते हैं कि फिर हर दिखने वाली वस्तु उसे रंगीन ही लगती है, भले चाहे वह सफेद ही क्यों न हो। औरों की कही बातों पर व्यक्ति के संदर्भ में धारणाएं बना लेना, अपने नजरिए के पेरामीटर से मापने का आग्रह करना आधा-अधूरी सचाई को पाना है।
मित्रता मानवीय रिश्तों का एक आदर्श एवं प्रायोगिक स्वरूप हैं, इस रिश्ते में द्वैतभाव नहीं रहता। इसलिए वहां न अपने-पराए का भेद है, न प्रतिस्पर्धा, न छोटे-बड़े की सीमा-रेखा। न आपसी खींचातान और न ‘मैं’, ‘तू’ का विग्रह। मित्रता के साथ जिस क्षण आत्मालोचन का उपक्रम जुड़ता है, क्षमा के आदान-प्रदान का विनम्र व्यवहार होता है उसी क्षण हमारी निश्छलता, पापभीरूता, ऋजुता और जागरूकता की उपस्थिति में सारे निषेधात्मक भाव, संस्कार विराम पा लेते हैं। जो विपत्ति के समय भी स्नेह से युक्त रहता है, उसे मित्र कहा जाता है। संत तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में मित्र के विषय में बताया है-
निज दुःख गिरि सम, रजकरि जाना,
मित्र का दुःख रज मेरु समाना।।
जो अपने पर्वत समान विशाल दुःख को तो रजकण के समान छोटा समझता है और दूसरे के छोटे से दुःख को पर्वत समान अनुभव करता है, उसे मित्र कहा जाता है।
सुप्रसिद्ध अमेरिकी लेखक डेल कार्नेगी ने मित्र बनाने की कला पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं और वे लाखों, करोड़ों की संख्या में बिकती हैं। उसने एक पुस्तक में लिखा है-‘मेरी सारी संपत्ति लेकर मुझे कोई एक सच्चा मित्र दे दो।’
अमेरिकी धन कुबेर हेनरी फोर्ड का उदाहरण देते हुए उसने लिखा है कि-उससे एक बार पत्रकारों ने पूछा-आपके पास अपार धन संपत्ति है, सभी सुख सुविधाएं मौजूद हैं इतना सब होने पर आप जीवन में किस बात की कमी महसूस करते हैं?’
हेनरी फोर्ड ने कहा-धन संपत्ति के नशे में मैं एक भी सच्चा मित्र नहीं बना सका। फ्रेंडस बहुत मिले परन्तु वह फ्रेंडशिप केवल साथ खाने-पीने, मौज, शौक की ही थी। जो सच्चे दिल से मुझे चाहे और मैं उसे चाहूं, ऐसा एक भी मित्र मुझे नहीं मिला। यह मेरे जीवन की एक बहुत बड़ी रिक्तता एवं कमी है।
मिसरी घोल झूठ की, ऐसे मित्र हजार।
जहर पिलावें सांच का, वे विरले संसार!
संसार में अधिकतर स्वार्थी मित्र मिलते हैं। जैसे सरोवर पर हंस आते हैं, जब तक उसमें पानी रहता है पानी में किलोलें करते हैं, तैरते हैं, पानी सूखने लगा तो हंस भी सरोवर छोड़कर उड़ जाते हैं। फल वाले वृक्षों पर पक्षी चहचहाते हैं, फल खाते हैं, डालियों पर झूमते हैं और फल खत्म होते ही पक्षी वृक्ष को छोड़कर दूसरे फल वृक्ष की डाल पर जाकर बैठ जाते हैं। दुमं जहा खीण फलं व पक्खी-ऐसी स्वार्थी मतलबी मित्रों से तो यह संसार भरा पड़ा है।
रामचरित में प्रसंग आता है। जब विभीषण राम की तरफ से रावण के साथ युद्ध करने आता है तो रावण को बहुत क्रोध आ जाता है। वह कहता है, तू मेरा भाई होकर भी शत्रु की तरफ से लड़ रहा है, तो पहले तुझे ही खत्म करूंगा। क्रोध में अंधा होकर रावण विभीषण पर शक्ति प्रहार करने लगता है, तब पीछे खड़े लक्ष्मण विभीषण के आगे आ जाते हैं- कहते हैं यह शक्ति का प्रहार मैं झेलूंगा। तुम हमारे शरणागत हो, मित्र हो, तुम पर संकट नहीं आना चाहिए। तुम्हारा संकट हम झेलेंगे और आखिर विभीषण को बचाने के लिए लक्ष्मण रावण की शक्ति प्रहार झेल लेते हैं। तो यह है मित्रता। मित्र के प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह नहीं करना।
आज रास्ते चलते मित्र बन जाते हैं, कोई होटल मित्र, क्लब मित्र, कोई बस मित्र और कोई रेल मित्र। घंटा आधी घंटा की मुलाकात होती है। दो चार गप्प-शप्प मारते हैं और दोस्ती हो जाती है। लेकिन क्या यह दोस्ती वास्तविक दोस्ती है? हमें दोस्ती के नये मूल्य-मानक गढ़ने है, मित्रता को जीवन में सार्थक रूप में स्थापित करना है। मित्रता प्रेम का नहीं बल्कि करुणा का पर्याय होनी चाहिए। क्योंकि प्रेम में स्वार्थ है, राग-द्वेष के संस्कार हैं जबकि करुणा परमार्थ का पर्याय बनती है।

 

 

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